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दूसरे दलों से आने वाले नेताओं ने बढ़ाई भाजपाइयों की धुकधुकी, 'हक' मारे जाने का डर

Thu, 10 Aug 2017 02:24 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ Updated Thu, 10 Aug 2017 02:24 AM IST
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 Other party leaders who are joining BJP create worries for party's own activists.

यूपी चुनाव के दौरान जिस भाजपा को पानी पी-पी कर कोस रहे थे आज उसी का दामन थामने की होड़ सी लगी है। विधायकी छोड़-छोड़ कर भगवा खेमे में जा रहे हैं। पर, इस सबने भाजपाइयों की धुकधुकी बढ़ा दी है। उन्हें डर सता रहा है कि भाजपा के सत्ता में रहने पर मलाई काटने और वनवास में साथ छोड़ने वालों की ये भीड़ कहीं उनका हक न मार ले।

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लगभग 14 साल के वनवास के बाद सत्ता में लौटी पार्टी से जुड़े युवा और बुजुर्ग सभी की आकांक्षा है कि सत्तासुख का कुछ हिस्सा उनके भी हिस्से आए। इनमें वे तो हैं ही जो पिछले कुछ वर्षों से पार्टी में लगातार सक्रिय हैं तो वे भी हैं जो अतीत में पार्टी की रीतिनीति तय करते रहे हैं। जिन्होंने संघर्ष के दिनों में भाजपा का साथ दिया है।
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इनकी वरिष्ठता और पार्टी की जड़ें जमाने के लिए की गई मेहनत को देखते हुए कोई भी इनकी पद-प्रतिष्ठा पाने की दावेदारी या आकांक्षा पर सवालिया निशान भी नहीं लगा सकता। इन सबके साथ वह भी कुछ न कुछ पाने के लिए दौड़भाग में जुटे हैं जो पार्टी के सत्ता में आने के बाद आए हैं या वापस लौटे हैं।

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शाह के समझाने के बाद भी नहीं निकला डर

 Other party leaders who are joining BJP create worries for party's own activists.
भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह - फोटो : social media

दूसरे दलों से आने वालों को लेकर किस कदर चिंता है यह पिछले दिनों यहां राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की मौजूदगी में प्रदेश, क्षेत्र पदाधिकारियों और जिलाध्यक्षों की बैठक में दिखी। कइयों ने शाह से गुहार लगाई कि ऐसे लोग भाजपा के सत्ता में होने का फायदा उठाने के लिए आ रहे हैं। इस पर रोक न लगी तो पार्टी का पुराना कार्यकर्ता हतोत्साहित होगा।

हालांकि शाह ने यह कहते हुए उन्हें समझाने की कोशिश की कि-‘विस्तार का लक्ष्य लेकर चल रही भाजपा दूसरे दलों से आने वालों पर रोक नहीं लगा सकती पर, इस बात पर जरूर नजर रखेगी कि वह सत्ता का दुरुपयोग न कर सकें।’

इसके बाद भी भाजपाई अपनी आशंका को दिल और दिमाग से निकाल नहीं पा रहे हैं। यह आशंका यूं ही नहीं है। पिछले दिनों भाजपा में वापस लौटे नेताओं में कुछ ऐसे भी हैं जो पार्टी के सत्ता से हटने पर दल छोड़ गए थे।

कहीं यह वजह तो नहीं

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भले ही शाह के लखनऊ आगमन के वक्त सपा के यशवंत सिंह, बुक्कल नवाब और बसपा के ठाकुर जयवीर सिंह का विधान परिषद सदस्यता (एमएलसी) व पार्टी की सदस्यता से इस्तीफा भगवा टोली की सुनियोजित रणनीति का हिस्सा रहा हो।

उसके बाद सपा के ही दो और एमएलसी डॉ. सरोजनी अग्रवाल व डॉ. अशोक वाजपेयी का त्यागपत्र भी भाजपा की तरफ से सपा और बसपा में बिखराव व भगदड़ दिखाने के तय किए ऑपरेशन का अंग रहा हो। पर, भाजपा के लोगों को लगता है कि जो आ रहे वे भाजपा से कुछ न कुछ उम्मीद तो जरूर करेंगे।

चूंकि ये विधान परिषद की सदस्यता छोड़कर आ रहे हैं। सभी राजनीति में ठीक तरह से स्थापित हो चुके चेहरे हैं। इसलिए स्वाभाविक रूप से भाजपा को भी भविष्य में इन्हें और इनके समर्थकों को कुछ न कुछ तो देना ही पड़ेगा। जो दिया जाएगा वह भाजपा के किसी कार्यकर्ता या वरिष्ठ व्यक्ति का हिस्सा होगा।

अनदेखी नहीं हो सकती इन दावेदारों की

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भाजपा के सरकार में होने के नाते आयोगों, निगमों, बोर्डों सहित अन्य कई सरकारी संस्थाओं में अध्यक्ष, उपाध्यक्ष या भविष्य में खाली होने वाली राज्यसभा व विधान परिषद की सीटों के लिए पार्टी के कनिष्ठ कार्यकर्ताओं के साथ जो कई वरिष्ठ नेता भी मैदान में हैं, उनमें पार्टी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष से लेकर पूर्व मंत्री और वरिष्ठ पदाधिकारी शामिल हैं।

इनकी वरिष्ठता और पार्टी में योगदान को देखते हुए इनकी दावेदारी की अनदेखी भी नहीं की जा सकती। इनमें पार्टी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष डॉ. लक्ष्मीकांत वाजपेयी, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष डॉ. रमापति राम त्रिपाठी, पूर्व सांसद सत्यदेव सिंह, पूर्व क्षेत्रीय अध्यक्ष व क्षेत्र संगठन मंत्री जयप्रकाश चतुर्वेदी, पूर्व विधान परिषद सदस्य और पार्टी के पूर्व कोषाध्यक्ष अशोक धवन, पूर्व एमएलसी अशोक दुबे, पूर्व मंत्री रविकांत गर्ग, रवींद्र शुक्ल, हरद्वार दुबे जैसे नेता शामिल हैं।

ये सभी न सिर्फ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से निकलकर राजनीति में आए हैं बल्कि लंबे समय तक संगठन में भी सक्रिय भूमिका निभाते रहे हैं। इसी तरह विद्यासागर सोनकर व दिवाकर सेठ जैसे दलित वर्ग के चेहरों और महिला नेताओं बेबीरानी मौर्य, लज्जारानी गर्ग की दावेदारी भी काफी मजबूत मानी जा रही है।

महज 12 दिनों में बुक्कल नवाब, ठाकुर जयवीर सिंह, यशवंत सिंह, डॉ. सरोजनी अग्रवाल बीजेपी जॉइन कर चुके हैं। अंबिका चौधरी भले ही अपने को बसपा में खुश बता रहे हों पर जिस तरह उन्होंने चुनाव पहले पाला बदला उससे उनका रुख भी भाजपा की ओर हो सकता है। वहीं डॉ. अशोक वाजपेयी ने भले ही पत्ते न खोले हों पर विकल्प खुला रखा है।

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