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यूपी: किसानों के सहारे सियासी संजीवनी की तलाश में विपक्ष, 'अजगर' व 'मजगर' फॉर्मूले पर हो सकता है अमल

Tue, 09 Feb 2021 10:41 AM IST
ishwar ashish न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ Published by: ishwar ashish Updated Tue, 09 Feb 2021 10:41 AM IST
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Opposition plans for 2022 Uttar Pradesh assembly election.
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, अखिलेश यादव व जयंत चौधरी। - फोटो : amar ujala

राजनीतिक दलों की किसानों के सहारे सियासी संजीवनी तलाशने की कोशिश लगातार तेज होती जा रही है। विपक्ष की कोशिशों से साफ हैं कि वह किसानों के सहारे प्रदेश में 2013 से पूर्व के सामाजिक सियासी समीकरणों से 2022 की चुनावी नैया पार लगाने का तानाबाना बुन रहा है।

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रालोद नेता जयंत चौधरी के पश्चिमी यूपी के जिलों के दौरे और सपा की ओर से किसानों के प्रति सोशल मीडिया से लेकर संवेदनाओं के सरोकारों पर बढ़ी सक्रियता यही बता रही है। विपक्ष अपने मकसद में कितना सफल होगा यह तो भविष्य बताएगा लेकिन किसान आंदोलन के बदले रुख ने उसे उम्मीद की किरण जरूर दिखा दी है।
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खासतौर से पश्चिमी उत्तर प्रदेश के पुराने आंकड़ों और राजनीतिक समीकरणों पर नजर दौड़ाएं तो मतलब ठीक से समझा जा सकता है। दरअसल, गैर कांग्रेस और गैर भाजपा दलों के लिए चौधरी चरण सिंह का ‘अजगर’ व ‘मजगर’ फार्मूला कारगर रहा है। ‘अजगर’ मतलब अहीर अर्थात यादव, जाट, गुर्जर, और राजपूत तथा ‘मजगर’ मतलब मुसलमान, जाट, गुर्जर और राजपूत है।

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शुरू में यह फॉर्मूला खूब चला फिर मुलायम से अनबन के बाद लगा झटका

शुरू में यह फॉर्मूला खूब चला, लेकिन अजित सिंह से मुलायम सिंह यादव की अनबन के बाद सपा के गठन से इसे झटका लगा और 2013 के मुजफ्फरनगर दंगे से जाट व मुसलमान समीकरण टूटने से पूरी तरह बिखर गया। हिंदू-मुसलमान समीकरण टूटने से जाटों की ज्यादातर आबादी भाजपा के साथ लामबंद हो गई। गुर्जर व राजपूत तो भाजपा के साथ आ ही चुका था। मुसलमान एक तरह से सपा और बसपा की तरफ मुड़ गया।

इस समीकरण से सबसे ज्यादा नुकसान चौधरी चरण सिंह के वारिस अजित सिंह और पौत्र जयंत चौधरी का हुआ। कृषि कानूनों पर संघर्ष ने जिस तरह मोड़ लिया है उसमें गैर भाजपा दलों खासतौर से रालोद और सपा का पश्चिमी उत्तर प्रदेश में फिर से अपनी पकड़ व पहुंच मजबूत बनाने की उम्मीद बांधना तथा सियासी संजीवनी तलाशना स्वाभाविक है।

हालांकि सक्रिय तो आम आदमी पार्टी (आप) और कांग्रेस भी हैं लेकिन मौजूदा समीकरण में फिलहाल 2022 में भाजपा से मुख्य मुकाबले में सपा और बसपा ही खड़े दिखाई दे रहे हैं। यदि कोई चमत्कारिक परिवर्तन न हुआ तो।

जयंत चौधरी ने ‘चलो गांव की ओर’ अभियान शुरू किया

चौ. चरण सिंह के पौत्र और राष्ट्रीय लोकदल के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष जयंत चौधरी ने ‘चलो गांव की ओर’ अभियान शुरू किया है। इससे पहले उनका पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हो रही पंचायतों में शामिल होना, सपा नेताओं का रामपुर के बिलासपुर के डिबडिबा गांव जाकर 26 जनवरी को दिल्ली में ट्रैक्टर रैली में जान गंवाने वाले नवरीत के अंतिम अरदास व भोग में हिस्सा लेना इसका उदाहरण हैं।

जयंत ने अभियान के लिए शामली के भैंसवाल से लेकर 18 फरवरी को मथुरा के बल्देव तक जिन स्थानों पर कार्यक्रम तय किए हैं, उन स्थानों के सामाजिक समीकरण रालोद की मंशा बताने के लिए पर्याप्त हैं।

सपा को भी लाभ: सभी को पता है कि पिछले वर्ष अक्तूबर-नवंबर में प्रदेश में विधानसभा की सात सीटों के उपचुनाव में सपा और रालोद मिलकर चुनाव लड़े थे। सपा ने समझौते में एक सीट रालोद को दी थी। हालांकि इस गठजोड़ का दोनों को कोई लाभ नहीं हुआ लेकिन किसान आंदोलन को लेकर राकेश टिकैत के यू टर्न और जाटों की खाप के रुख से रालोद और सपा नेताओं के भीतर 2022 को लेकर बेहतरी की आस जगना स्वाभाविक है। चूंकि सपा और रालोद का गठबंधन एक तरह से वजूद में है। इसलिए दोनों का नए राजनीतिक समीकरण में अपना रास्ता तलाशना आश्चर्य की बात नहीं है। इसी कड़ी में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जयंत ने बागडोर संभाली है।

पर, विपक्ष की राह आसान नहीं

हालांकि राज्यसभा में सोमवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कही गई बातों और समीकरणों के मद्देनजर विपक्ष के लिए उम्मीदों को हकीकत में बदलना बहुत आसान नहीं है। डॉ. शकुंतला मिश्रा राष्ट्रीय पुनर्वास विश्वविद्यालय से सेवानिवृत्त प्रो. ए. पी. तिवारी का तर्क है कि विपक्ष की जातीय गणित के साथ मुस्लिम समीकरणों से राजनीतिक पुनर्वास का तानाबाना बुनने की कोशिश भाजपा को नुकसान के बजाय लाभ ही पहुंचाएगी।

भले ही किसानों ने शुरू में इस आंदोलन से राजनीतिक दलों को दूर रहने को कहा हो लेकिन जिस तरह यह दल किसानों की हमदर्दी के सहारे राजनीतिक समीकरण दुरुस्त करने के लिए सक्रिय हुए हैं, उससे भाजपा की चिंता कम हुई होगी, क्योंकि उसे अब उन आरोपों को साबित करने में आसानी हो गई है जो मोदी के खिलाफ माहौल बनाने के लिए तैयार किए गए हैं।

प्रधानमंत्री ने राज्यसभा में आंदोलन को आंदोलनजीवियों से बचाने का आह्वान करते हुए इसके संकेत भी दे दिए हैं। भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष विजय बहादुर पाठक कहते भी हैं कि प्रधानमंत्री ने राज्यसभा में एमएसपी लागू रहने की घोषणा करने के साथ किसानों की सारी आशंकाओं का समाधान कर उन्हें आश्वस्त करने की कोशिश की है।

प्रधानमंत्री की विश्वसनीयता पर कोई सवाल नहीं खड़ा कर सकता। कोरोना काल में प्रधानमंत्री के एक आह्वान पर गरीब से अमीर तक ने जिस तरह दिए जलाने से लेकर ताली और थाली बजाईं उससे यह साबित हो चुका है। किसानों के सहारे राजनीति चमकाने की कोशिश में विपक्ष एक बार फिर विफल होगा।

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