सिर्फ नाम नहीं काम की भी हैं ये गलियां
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पारचे वाली गली, टकसाल वाली गली, फूलों वाली गली, मेवे वाली गली, घडिय़ाली वाली गली, चावल वाली गली, रोटी वाली गली।
चौक इलाके की ये वो गलियां हैं, जिनकी शान कभी अलग हुआ करती थी। लखनऊ पर लिखी हुई किताबें हों या फिर शायरों की जुबां हर जगह इनका जिक्र है लेकिन आज बदले हुए दौर ने इनकी रंगत को भी बदल दिया है।
संकरी गलियों में गंदगी है, सड़क खस्ताहाल है और जाम का जंजाल है। बदलते हुए दौर ने भले ही इनकी सूरत बदल दी हो, लेकिन न इनकी पहचान आज भी वैसी ही है।
कंघी वाली गली
कंघी वाली गली सुनने वालों को यह नाम अजीब लग सकता है, लेकिन आज भी यहां कारीगर बैठकर कंघी बनाते हैं। पुराने कारीगर वकार कहते हैं कि हमने तो वो दौर देखा है जब दिन रात यहां लोग काम करते थे। सींग की कंघियां बनाया करते थे, लेकिन अब तो वक्त बदल गया है। ज्यादातर कारीगर खत्म हो गये हैं। लेकिन जब बात सींघ की बनी कंघियों की आती है, तो खरीदार यहीं आते हैं।
टक्साल वाली गली
कभी सिक्कों की ढलाई जिस गली में हुआ करती थी वो टक्साल वाली के नाम से जानी जाती है। अब कोई टक्साल तो नहीं, लेकिन यहां अब भी चांदी और सोने के वर्क का काम होता है सो इसे उसी नाम से जाना जाता है।
मेवे वाली गली
मेवे वाली गली भी कम मशहूर थोड़ी है। गली के बाहर पान की गुमटी लगाने वाले सगीर अहमद कहते हैं कि कभी अंग्रेजों के वक्त में इस गली से मेवे जाया करते थे। तभी से इस गली का नाम मेवे वाली गली पड़ गया।
रोटी वाली गली
इन गलियों में आज भी नाम के अनुसार काम होता है इसका अंदाजा रोटी वाली गली के अंदर जाते ही लगाया जा सकता है। थोड़ी-थोड़ी दूरी पर लाइन से दुकानों पर तंदूर गड़े हुए। कहीं शीरमाल के कारीगर शीरमाल तैयार करते नजर आएंगे तो कहीं नान रोटी तो खमीरी रोटी। कहीं उलटे तवे पर कागज से हलकी चपाती तैयार की जा रही होगी तो कहीं तंदूरी पराठा।
फूलों वाली गली
वहीं एक गली में गुलाब और बेले की महक यह बता देती है कि यही है फूलों वाली गली। चौक की इस गली से रोज लाखों रुपए के फूलों का कारोबार होता है। पिछले 60 साल से चिकन की टोपियां और कुर्ते का काम करने वाले मोहम्मद नासिर कहते हैं कि यहां कभी नीचे मार्केट और ऊपर तवायफों के कोठे हुआ करते थे।
बेशक वक्त के साथ इन गलियों की रौनक कम होती गई लेकिन कुछ तो हैं इनमें, जो आज भी लोग यहां खिंचे चले आते हैं।