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KGMU News : अब चाय पीते-पीते भी इलेक्ट्रिक शॉक से इलाज संभव, एनेस्थीसिया की जरूरत भी नहीं पड़ती

Mon, 22 Aug 2022 07:36 PM IST
पंकज श्रीवास्‍तव रोली खन्ना, अमर उजाला, लखनऊ
रोली खन्ना, अमर उजाला, लखनऊ Published by: पंकज श्रीवास्‍तव Updated Mon, 22 Aug 2022 07:36 PM IST
सार

डॉ. सुजीत बताते हैं कि पहले इलेक्ट्रिक शॉक में उच्च स्तर का करंट दिया जाता था। इसमें झटका या दौरा आता था। कुछ समय के लिए याददाश्त पर भी असर होता था और एक या दो घंटे बाद मरीज सामान्य हो पाता था। वहीं, उसे एनेस्थीसिया देना जरूरी होता था।

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Now even while drinking tea, treatment with electric shock is possible, anesthesia is not even needed
डॉ. सुजीत कार - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

मानसिक रोगों के इलाज में कई बार इलेक्ट्रिक शॉक रामबाण का काम करता है। इसके बावजूद मरीज व तीमारदार इसे आसानी से नहीं स्वीकारते हैं। कारण, इसमें होने वाली तकलीफ होती है। ऐसे में कई बार की लंबी काउंसिलिंग के बाद इन्हें तैयार किया जाता है। इसे देखते हुए केजीएमयू के मानसिक रोग विभाग ने जर्मन तकनीक से इलाज के लिए पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया है। इसमें मरीज को किसी प्रकार का दर्द नहीं होता है। वहीं, शॉक देने के लिए एनेस्थीसिया की जरूरत नहीं पड़ती, चाय पीते और अखबार या किताब पढ़ते-पढ़ते भी शॉक दे दिया जाता है और मरीज को इसका पता भी नहीं चलता। प्रोजेक्ट के माध्यम से इलेक्ट्रिक शॉक से इलाज को लेकर डर, मिथक को भी दूर किया जा रहा है। इस तकनीक के सकारात्मक नतीजे आने लगे हैं।

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परियोजना के नोडल अधिकारी व वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. सुजीत कार बताते हैं कि अप्रैल 2021 में ट्रांसस्क्रैनिअल डायरेक्ट करंट स्टिुमलेशन (टीडीसीएस) के जरिये डिप्रेशन ऑब्सेसिव कंपल्सिव डिसऑर्डर (ओसीडी) और अल्कोहलिक डिसऑर्डर के मरीजों का इस विधि से इलाज शुरू किया गया था। इसमें अवसाद ग्रसित 28 मरीजों का इलाज पूरा हो गया है, दो का जारी है। ओसीडी व नशे के लती 47 मरीजों के इलाज में भी इस तकनीक का इस्तेमाल हुआ।
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पहले और अब की तकनीक में अंतर
डॉ. सुजीत बताते हैं कि पहले इलेक्ट्रिक शॉक में उच्च स्तर का करंट दिया जाता था। इसमें झटका या दौरा आता था। कुछ समय के लिए याददाश्त पर भी असर होता था और एक या दो घंटे बाद मरीज सामान्य हो पाता था। वहीं, उसे एनेस्थीसिया देना जरूरी होता था। आधुनिक तकनीक में न तो दर्द होता है और न ही एनेस्थीसिया देने की जरूरत होती है। इसका अन्य कोई साइड इफेक्ट भी नहीं होता है। बताया कि शॉक देने के लिए ईयरफोन जैसे उपकरण या इलेक्ट्रोड का इस्तेमाल होता है। पहले करंट की तीव्रता यदि 100 होती थी तो अब एक होती है। इसका कारण यह है कि पहले पूरे मस्तिष्क के लिए शॉक देते थे, नई तकनीक में टारगेट एरिया या प्रभावित हिस्से को ही चिह्नित कर शॉक दिया जाता है।
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मरीजों ने दिया सकारात्मक फीडबैक
पहले ओसीडी मरीज व उसके तीमारदार इलेक्ट्रिक शॉक के नाम से ही डर गए। काउंसिलिंग के बाद इन्हें राजी किया गया। ओसीडी से ग्रसित 45 साल की महिला को बार-बार आत्महत्या का विचार आ रहा था। टीडीसीएस तकनीक से इलाज के बाद वह स्वस्थ होकर चली गई। लौटने पर उसने कहा कि बीच में दवाइयां समय से न लेने से उसकी तबीयत बिगड़ी है। यह भी माना कि टीडीसीएस से शॉक देने से फायदा हुआ, दोबारा उसका उपचार शुरू कर दिया जाए।


नवंबर तक तैयार होगी अंतिम रिपोर्ट
प्रथम दृष्टया तकनीक के सकारात्मक नतीजे हैं। हमारे लिए मरीजों-तीमारदारों का फीडबैक अहम होता है। अभी तक जितने लोगों पर इसका इस्तेमाल किया गया, उनमें सुधार मिला है। कोई साइड इफेक्ट नहीं मिला। हालांकि, अंतिम रिपोर्ट नवंबर तक तैयार होगी। तब आंकड़ों के विश्लेषण से बता सकेंगे कि तकनीक इलाज में कितना असरकारक है।
डॉ. सुजीत कार, वरिष्ठ मनोचिकित्सक व परियोजना के नोडल अधिकारी

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