खुद के बच्चों के लिए टिकट नहीं दिला पा रहे भाजपा के पूर्व दिग्गज
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कभी जिनके बिना भाजपा में कोई फैसला नहीं हो पाता था। जिनके हाथों से पार्टी में पद तो चुनाव में टिकट दिलाने का फैसला हुआ करता था। जो चेहरे पार्टी की रीति-नीति तय करने वालों में शुमार होते थे। जिनके बिना भाजपा में फैसलों की कल्पना नहीं की जाती थी। उनमें कल्याण सिंह को छोड़कर ज्यादातर आज याचक वाली कतार में हैं।
किसी को खुद के लिए टिकट चाहिए तो किसी की चिंता अपने बेटे या बेटी के लिए टिकट की है। इसके लिए ये नेता दिल्ली और लखनऊ एक किए हैं। कहने को तो इनमें से कई प्रदेश की चुनाव समिति के सदस्य भी हैं, फिर भी टिकट को लेकर आश्वस्त नहीं हो पा रहे हैं।
सबसे पहले बात भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्षों की। राजनाथ सिंह प्रदेश अध्यक्ष के साथ ही राष्ट्रीय अध्यक्ष भी रहे। उनके पुत्र पंकज सिंह भी चुनाव लड़ना चाहते हैं।
जानकारी के मुताबिक, उनकी इच्छा पश्चिमी यूपी से लड़ने की है। पर, नेतृत्व अभी तक चुप्पी साधे है। कभी पार्टी के कोर ग्रुप में रहे ओमप्रकाश सिंह दूसरों के टिकट तय किया करते थे।
'चुनाव समिति में होने के बावजूद बेटे को टिकट नहीं'
मिर्जापुर की चुनार सीट से छह बार विधायक रहे ओमप्रकाश कहने को तो आज भी प्रदेश की चुनाव समिति में हैं, लेकिन बेटे अनुराग को टिकट दिलाने की जद्दोजहद से जूझ रहे हैं।
जानकारी के मुताबिक, पार्टी नेतृत्व चाहता है कि ओमप्रकाश खुद चुनाव लड़ें। सूर्यप्रताप शाही भी न सिर्फ प्रदेश अध्यक्ष रह चुके हैं बल्कि 2012 के विधानसभा चुनाव में उनके ही दस्तखत से पार्टी प्रत्याशी तय किए गए थे।
इस बार देवरिया के पथरदेवा से टिकट के लिए वे लगातार दौड़भाग कर रहे हैं, पर अभी तक बात बन नहीं पाई है।
कटियार व टंडन भी नेपथ्य में
2014 के लोकसभा चुनाव से पहले की बात करें तो विनय कटियार की गिनती स्टार प्रचारकों में होती थी। उनका आश्वासन टिकट की गारंटी माना जाता था। प्रदेश की चुनाव समिति में तो वे इस बार भी हैं, पर एक तरह से नेपथ्य में ही हैं।
प्रेमलता कटियार भी 2012 तक भाजपा के निर्णायक ग्रुप में हुआ करती थीं। खासतौर से कल्याण सिंह के जमाने में तो उनकी तूती बोला करती थी। वह भी अपनी पुत्री नीलिमा कटियार को कानपुर के कल्याणपुर से चुनाव लड़ाना चाहती हैं। इसके लिए वह लखनऊ से दिल्ली तक दौड़भाग कर रही हैं।
पर, पार्टी सूत्रों की मानें तो उन्हें भी हरी झंडी नहीं मिल पाई है। लालजी टंडन किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं, पर भाजपा उम्मीदवारों की पहली सूची में दल के ज्यादातर विधायकों को चुनाव लड़ने की हरी झंडी देने के बावजूद उनके पुत्र गोपाल टंडन के टिकट पर परदा डाले रखना दल में उनकी बदली हैसियत की गवाही देता है।
इन नेताओं की भी हैसियत बदली
कैराना से सांसद हुकुम सिंह न सिर्फ पार्टी के महत्वपूर्ण नेताओं में शुमार हुआ करते थे, बल्कि विधानसभा में वे भाजपा विधायक दल के नेता भी रहे। पर, बदले वक्त में उनकी स्थिति भी बदल गई। वह भी अपनी पुत्री को कैराना से भाजपा उम्मीदवार बनाना चाहते हैं।
कैराना सीट का चुनाव पहले चरण में है। बावजूद इसके पार्टी नेतृत्व ने अभी तक इस सीट के उम्मीदवार की घोषणा नहीं की है। इससे साबित होता है कि सिंह को भी पुत्री के टिकट के लिए जबर्दस्त जद्दोजहद करनी पड़ रही है।
किसी जमाने में सत्यदेव सिंह की जुबान भाजपा में फैसलों का पर्याय मानी जाती थी। गोंडा व बलरामपुर से अलग-अलग चार बार भाजपा सांसद रह चुके सत्यदंव भी अपने पुत्र को चुनाव लड़ाना चाहते हैं। पार्टी सूत्रों की मानें तो अभी तक उन्हें भी नेतृत्व से कोई आश्वासन नहीं मिल पाया है।