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तीन माह में दोबारा कोरोना जांच कराने की जरूरत नहीं
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तीन माह में दोबारा कोरोना जांच कराने की जरूरत नहीं
यदि आप कोरोना की चपेट में आ चुके हैं तो तीन माह तक दोबारा जांच कराने की जरूरत नहीं है। ऐसा कराने पर रिपोर्ट पॉजिटिव आ सकती है, लेकिन यह फॉल्स पॉजिटिव मानी जाएगी।
इसकी बड़ी वजह यह है कि शरीर में वायरस का मृत आरएनए है तो भी आरटीपीसीआर मशीन पॉजिटिव बताती है। स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से तीन माह तक दोबारा जांच की जरूरत नहीं बताई गई है।
एसजीपीजीआई के ट्रांसफ्यूजन मेडिसिन विभाग के डॉ. अनुपम वर्मा बताते हैं कि अभी तक दुनियाभर में सिर्फ एक मरीज में दोबारा संक्रमण की पुष्टि हुई है वह भी चार माह बाद।
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हांगकांग का यह मरीज दूसरे देश पहुंचा था, जहां जांच में पॉजिटिव मिला। हालांकि, यह वायरस हॉगकांग के वायरस के नेचर से अलग था। यहां इस तरह के केस नहीं मिले हैं।
डॉ. वर्मा ने बताया कि दोबारा पॉजिटिव आने की दूसरी वजह फॉल्स रिपोर्टिंग हो सकती है। जब मरीज को निगेटिव घोषित किया गया, कहीं उसमें तो चूक नहीं हुई।
अभी तक यही माना जाता है कि 90 दिन बाद बीटाकोरोना वायरस हो सकता है। केजीएमयू ट्रांसफ्जून मेडिसिन विभागाध्यक्ष डॉ. तूलिका चंद्रा बताती हैं कि दोबारा जांच की जरूरत ही नहीं है।
यही वजह है कि बिना लक्षण वाले मरीजों को तीन दिन तक बुखार न आने पर 10वें दिन बिना जांच के डिस्चार्ज करने और 14 दिन तक होम आइसोलेशन में रहने का निर्देश है। 24 दिन का समय पूरा कर लेने वालों से दूसरे में संक्रमण का खतरा नहीं पाया जाता है।
यहां हो चुके हैं अध्ययन
दक्षिण कोरिया में हुए अध्ययन में कहा गया कि शरीर में मृत वायरस की मौजूदगी से इन मरीजों के टेस्ट पॉजिटिव आते हैं, लेकिन वे किसी को भी संक्रमित नहीं कर सकते हैं। इसमें इन मरीजों में वायरस के खिलाफ एंटी-बॉडीज मौजूद होने की संभावना भी जताई गई है। अध्ययन में पाया गया कि दोबारा पॉजिटिव पाए लोग किसी भी तरह का संक्रमण फैलाने में नाकाम थे। यह बात भी सामने आई कि आरटीपीसीआर जांच में मृत और जिंदा वायरस में अंतर नहीं हो पाता है।
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यदि आप कोरोना की चपेट में आ चुके हैं तो तीन माह तक दोबारा जांच कराने की जरूरत नहीं है। ऐसा कराने पर रिपोर्ट पॉजिटिव आ सकती है, लेकिन यह फॉल्स पॉजिटिव मानी जाएगी।
इसकी बड़ी वजह यह है कि शरीर में वायरस का मृत आरएनए है तो भी आरटीपीसीआर मशीन पॉजिटिव बताती है। स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से तीन माह तक दोबारा जांच की जरूरत नहीं बताई गई है।
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एसजीपीजीआई के ट्रांसफ्यूजन मेडिसिन विभाग के डॉ. अनुपम वर्मा बताते हैं कि अभी तक दुनियाभर में सिर्फ एक मरीज में दोबारा संक्रमण की पुष्टि हुई है वह भी चार माह बाद।
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हांगकांग का यह मरीज दूसरे देश पहुंचा था, जहां जांच में पॉजिटिव मिला। हालांकि, यह वायरस हॉगकांग के वायरस के नेचर से अलग था। यहां इस तरह के केस नहीं मिले हैं।
डॉ. वर्मा ने बताया कि दोबारा पॉजिटिव आने की दूसरी वजह फॉल्स रिपोर्टिंग हो सकती है। जब मरीज को निगेटिव घोषित किया गया, कहीं उसमें तो चूक नहीं हुई।
अभी तक यही माना जाता है कि 90 दिन बाद बीटाकोरोना वायरस हो सकता है। केजीएमयू ट्रांसफ्जून मेडिसिन विभागाध्यक्ष डॉ. तूलिका चंद्रा बताती हैं कि दोबारा जांच की जरूरत ही नहीं है।
यही वजह है कि बिना लक्षण वाले मरीजों को तीन दिन तक बुखार न आने पर 10वें दिन बिना जांच के डिस्चार्ज करने और 14 दिन तक होम आइसोलेशन में रहने का निर्देश है। 24 दिन का समय पूरा कर लेने वालों से दूसरे में संक्रमण का खतरा नहीं पाया जाता है।
यहां हो चुके हैं अध्ययन
दक्षिण कोरिया में हुए अध्ययन में कहा गया कि शरीर में मृत वायरस की मौजूदगी से इन मरीजों के टेस्ट पॉजिटिव आते हैं, लेकिन वे किसी को भी संक्रमित नहीं कर सकते हैं। इसमें इन मरीजों में वायरस के खिलाफ एंटी-बॉडीज मौजूद होने की संभावना भी जताई गई है। अध्ययन में पाया गया कि दोबारा पॉजिटिव पाए लोग किसी भी तरह का संक्रमण फैलाने में नाकाम थे। यह बात भी सामने आई कि आरटीपीसीआर जांच में मृत और जिंदा वायरस में अंतर नहीं हो पाता है।