मुलायम सिंह की कसकः आज कोई नहीं करता, शायद मरने के बाद ही मिले सम्मान
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वरिष्ठ समाजवादी नेता भगवती सिंह के 86वें जन्मदिन समारोह में शनिवार को सपा के पूर्व अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव की टीस उभर आई। उन्होंने कहा, आज हमारा कोई सम्मान नहीं करता, लेकिन मेरे मरने के बाद शायद करें। डॉ. राम मनोहर लोहिया के साथ भी ऐसा ही हुआ। डॉ. लोहिया कहा करते थे जिंदा रहते कोई सम्मान नहीं करता है।
गांधी भवन में हुए कार्यक्रम में समाजवादी आंदोलन के 65 साल के सफर पर हुई संगोष्ठी में बतौर मुख्य अतिथि शामिल हुए मुलायम ने भगवती के साथ संस्मरणों को साझा किया। कहा, वे पुराने समाजवादी साथी हैं। संघर्ष के दौर में जब समय पर खाना भी नहीं मिलता था, उस समय वे लइया-चना खाकर पेट भरते थे। उनके साथ कई दशकों का साथ है।
मुलायम ने पुराने दौर को याद करते हुए कहा कि हमारे लोग नहीं चाहते थे कि भाजपा नेता, सपा में शामिल हों। उनका इशारा कल्याण सिंह की तरफ था। इसके बावजूद हमने उन्हें पार्टी जॅाइन कराई। उनके पार्टी से जाने के बाद हमने अपने लोगों से माफी मांगी।
मुलायम ने कहा, इनमें भाजपा के कई बड़े नेता हैं, उनका नाम नहीं लूंगा। वे मुख्यमंत्री रहे हैं, आज गवर्नर हैं। इससे पहले लड्डू का केक काटकर भगवती सिंह का जन्मदिन मनाया गया।
'पहले अलग विचारधारा होने के बावजूद एक-दूसरे का सम्मान था'
मुलायम ने कहा कि स्वतंत्रता आंदोलन में दो दल सक्रिय थे। एक कांग्रेस पार्टी और दूसरी कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी। समाजवादी धारा के लोग आजादी के आंदोलन से ही सक्रिय थे। इनमें आचार्य नरेंद्र देव विद्वान थे। वे 38 भाषाओं के जानकार थे। आचार्य नरेंद्र देव और मौलाना अबुल कलाम आजाद जहां भाषण देते थे वहां क्रांति होती थी।
उन्होंने कहा कि पहले अलग विचारधारा होने के बावजूद एक-दूसरे का सम्मान था। गांधीजी का सुभाष चंद्र बोस बहुत आदर करते थे, जबकि दोनों की विचारधारा अलग थी लेकिन उद्देश्य एक था। गांधीजी ने सपना देखा था कि आजादी के बाद भेदभाव मिटेगा, गरीबी-अमीरी की खाई पटेगी। लेकिन आजाद भारत में यह अब तक अधूरा है।
लोहिया को मिला था कांग्रेस में आने का निमंत्रण
पूर्व सपा अध्यक्ष ने कहा कि आजादी के बाद पं. जवाहल लाल नेहरू ने समाजवादी नेता डॉ. राम मनोहर लोहिया को कांग्रेस में शामिल होने का निमंत्रण दिया था। इस पर लोहिया ने उनके सामने 14 सूत्री प्रस्ताव रखा था। आचार्य नरेन्द्र देव ने लोहिया से कहा था कि नेहरू उनके प्रस्तावों से सहमत नहीं होंगे और हुआ भी यही। डॉ. लोहिया की अगुवाई में आजादी के बाद भी आंदोलन हुए। मुझे भी उनमें जेल जाना पड़ा।