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अब चीर न फाड़, डीसीई-एमआरआई बता देगी कैंसर पर कौन सी दवा करेगी काम

Wed, 06 Oct 2021 01:39 AM IST
Lucknow Bureau लखनऊ ब्यूरो
Updated Wed, 06 Oct 2021 01:39 AM IST
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new research on cancer treatment in kgmu
लखनऊ। कैंसर के मरीजों पर सभी दवाएं असर नहीं करती हैं। उल्टा कुछ दवाएं नुकसान भी पहुंचा सकती हैं। केजीएमयू में अब बिना चीर-फाड़ किए ही यह पता लगाया जा सकेगा कि किस मरीज पर कौन सी दवा असर करने वाली है। डायनेमिक कंट्रास्ट इनहैंस्ड मैग्नेटिक रेजोनेंस (डीसीई-एमआरआई) की मदद से यह हो सकेगा। केजीएमयू के रेडियो डायग्नोसिस विभाग में तीन साल तक हुए शोध में यह निष्कर्ष निकला है। इस शोध को अंतर्राष्ट्रीय स्तर के प्रतिष्ठित क्लीनिकल कैंसर रिसर्च जर्नल में मान्यता दी गई है।
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केजीएमयू के रेडियो डायग्नोसिस विभाग के शिक्षक डॉ. दुर्गेश द्विवेदी ने वर्ष 2016 से 2019 के बीच यह शोध किया है। अब इसे जर्नल ने मान्यता देते हुए छापने का फैसला किया है। डॉ. दुर्गेश ने बताया कि किडनी के कैंसर से पीड़ित मरीजों के लिए फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन ने 13 दवाओं को मान्यता दी है। इन दवाओं को तीन समूह में बांटा गया है। इसके बावजूद अभी भी यह बता पाना मुश्किल है कि किस मरीज पर कौन सी दसा असर करेगी। कई बार मरीज को दी जा रही दवा फायदा करने के बजाय नुकसान कर देती है। यह स्थिति कैंसर के मरीज के लिए और भी घातक होती है। किडनी मेें मौजूद ट्यूमर की जांच ऑपरेशन कर उसे बाहर निकालने के बाद ही संभव हो पाती थी। ऐसे में दवाओं से उनका इलाज करना काफी चुनौती भरा काम होता है। इसको देखते हुए विभाग में डीसीई-एमआरआई का उपयोग कर रेडियोजिनोमिक्स विधा विकसित की। यह इमेजिंग, रेडियोमिक्स तथा जिनोमिक्स का मिश्रण है।
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चिकित्सा प्रणाली का हो सकेगा चयन
डॉ. दुर्गेश ने बताया कि इस शोध के लिए 49 मरीजों के 80 नमूने लिए गए। ये मरीज एंजीयोजेनिक तथा इम्यूनोथेरेपी ले रहे थे। डीसीई-एमआरआई विश्लेषण से पता चला कि एक ही ट्यूमर में एंजियोजेनेसिस और एंफ्लामेटरी विभिन्न तरीकों से बढ़ रहे थे। कैंसर में कोशिकाएं अपनी खुद की ब्लड सप्लाई विकसित कर लेती हैं। इस शोध के बाद ऐसी कोशिकाओं की पहचान की जा सकेगी तथा बेहतर दवा दी जा सकेगी। इस प्रणाली का उपयोग अब केजीएमयू में भी हो सकेगा। विवि के कुलपति ले. जनरल डॉ. बिपिन पुरी ने रेडियोडायग्नोसिस विभाग को बधाई देते हुए विभागाध्यक्ष प्रो. नीरा कोहली तथा अन्य संकाय सदस्यों को सुझाव दिया कि इस अध्ययन को रोगियों के हित में लाभकारी बनाया जाए। इसके बाद अब इसे लागू करने की तैयारी हो रही है।
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