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Lucknow News: न पंजीकरण न पूरे मानक, नशे से छुटकारे में खाली होती जेब

Wed, 23 Sep 2026 02:41 AM IST
Lucknow Bureau लखनऊ ब्यूरो
Updated Wed, 23 Sep 2026 02:41 AM IST
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Neither registration nor adherence to standards pockets drained in the bid to break free from addiction.
लखनऊ। नशे से निजात दिलाने के नाम पर मनमानी का खेल चल रहा है। कई नशामुक्ति केंद्रों के पंजीकरण का पता नहीं और ज्यादातर में मानक अधूरे हैं। मरीजों से मनमाना शुल्क वसूला जा रहा है। कहीं 12 तो किसी केंद्र में 25 से 35 हजार रुपये तक लिए जा रहे हैं। क्षेत्रीय मद्य निषेध अधिकारी भी बिना पंजीकरण केंद्रों के संचालन की बात को स्वीकारते हैं। मगर जांच और कार्रवाई में टाल-मटोल जारी है।
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बेसमेंट में नशामुक्ति की ओपीडी, शुल्क है 25 हजार
गोमतीनगर में एक नशामुक्ति केंद्र का संचालन बेसमेंट में हो रहा है, जबकि अस्पताल व अन्य व्यवस्थाओं के बेसमेंट में संचालन पर रोक है। केंद्र में मरीजों की ओपीडी यहीं होती है। बताया कि ऊपर तल पर मरीज भर्ती किए जाते हैं। एक मरीज से प्रति माह 25 हजार रुपये लिए जाते हैं। इसी में रहना-खाना भी शामिल है। संचालक ने अन्य जानकारी देने से इन्कार कर दिया। मंगलवार की दोपहर बेसमेंट के सामने तीन गैस सिलिंडर भी रखे नजर आए। आग से बचाव के इंतजाम भी आधे-अधूरे दिखे।
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सरोजनीनगर क्षेत्र में संचालित केंद्र पर भी करीब 25 हजार रुपये फीस ली जा रही है।

पांच माह चलेगा इलाज, खर्च होंगे करीब दो लाख
गोमतीनगर विस्तार में भी एक नशा मुक्ति केंद्र संचालित है। यहां की फीस व्यवस्था भी मनमाने तरीके से तय की गई है। जनरल वार्ड में पांच से छह बेड रहते हैं। मरीज को 16 हजार रुपये शुल्क, डॉक्टर की प्रति विजिट एक हजार और जांच का अलग से देना होता है। इस तरह प्रति माह करीब 22 हजार रुपये का खर्च आता है। एसी वार्ड का खर्च प्रतिमाह 35 से 40 हजार रुपये आता है। सूखा नशा करने वाले मरीज का इलाज पांच से छह महीने चलता है।
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ये हैं नशामुक्ति केंद्र के मानक
- नशामुक्ति केंद्र का पंजीकरण होना चाहिए।
- एक एमबीबीएस चिकित्सक और काउंसलर अनिवार्य है।
- प्रशिक्षित नर्सिंग स्टाफ की तैनाती हो। देखरेख करने वाले भी रहें।
- रसोई की व्यवस्था हो। साफ-सफाई का ध्यान रखा जाए।
- भवन की स्थिति बेहतर हो। महिला-पुरुष के लिए अलग-अलग ठहरने की व्यवस्था रहे।

Iकुछ महीने पहले अभियान चलाकर नशामुक्ति केंद्रों को चिह्नित किया गया था। जिन केंद्रों के कागज कार्यालय आ जाते हैं, उनकी नियमित जांच होती रहती है। कई संचालक सूचना ही नहीं देते।I
I- रमेश कुमार, क्षेत्रीय मद्य निषेध अधिकारी, लखनऊI
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