मुलायम ने बताया, कैसे पास हुए अंग्रेजी में...
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सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव ने कहा कि वे अंग्रेजी को मिटाना नहीं चाहते हैं,लेकिन अंग्रेजी अनिवार्य हो,यह वह बिल्कुल नहीं चाहते। सरकारी कामकाज में भी अंग्रेजी की अनिवार्यता नहीं होनी चाहिए।
जितने भी देशों ने तरक्की की है चाहे वह अमेरिका हो,जापान हो या फिर रूस,सभी ने अपनी क्षेत्रीय भाषा में ही की है। आज पूरे देश में मुश्किल से दो-तीन फीसदी लोग ही अच्छी अंग्रेजी बोल व लिख सकते हैं। जो भाव मातृभाषा में बोल व लिखकर आता है,वह कभी भी अंग्रेजी में नहीं आ सकता।
मुलायम शनिवार को एक होटल में भाषा विभाग की ओर से आयोजित विख्यात कवि गोपाल दास नीरज व उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के अध्यक्ष डॉ.उदय प्रताप सिंह के सम्मान समारोह में बोल रहे थे। कहा, हम यह नहीं कह रहे कि अंग्रेजी या फिर विदेशी भाषा लोग न पढ़ें।
जो पढ़ना चाहते हैं वे जरूर पढ़ें,हमने अपनी सरकार में विदेशी भाषा पढ़वाने में मदद भी की थी। देश में बहुत सारे लोग ऐसे हैं जिन्हें अंग्रेजी नहीं आती। कई बार गांव वालों को अंग्रेजी न आने के कारण न्याय नहीं मिल पाता।
सफलता के लिए तीन मंत्र आवश्यक हैं-इच्छाशक्ति,संकल्प व साहस। ये तीनों ही जिनके अंदर होंगे वे सफल होंगे। मुलायम ने वो भी बातें बताई जब वह अपने छात्र जीवन में एक बार अंग्रेजी में फेल हो गए थे।
मुलायम ने इस तरह पास की अंग्रेजी की परीक्षा
मुलायम ने बताया,डॉ.उदय प्रताप सिंह मेरे अंग्रेजी के शिक्षक थे। एक बार अंग्रेजी में मैं फेल हो गया। डॉ.उदय प्रताप ने खूब फटकार लगाई। कहा,कुश्ती में चैम्पियन हो जाओगे तो कोई नहीं पूछेगा लेकिन फेल हो गए तो सभी कहेंगे मुलायम सिंह फेल हो गया। यही बात चुभ गई।
इसके बाद मैंने अंग्रेजी को रट्टू तोते की तरह खूब पढ़ा। चांस की बात है जो रटा था वही परीक्षा में आ गया। फिर क्या था कॉमा व फुलस्टॉप सब एकदम सही जगह पर लगे। बाद में डॉ.उदय प्रताप ने मेरी तारीफ करते हुए कॉपी पूरे स्कूल में दिखाई थी।
नेताजी ने संसद में अंग्रेजी न बोलने की दी थी हिदायत
हिंदी संस्थान के अध्यक्ष डॉ.उदय प्रताप सिंह ने कहा,नेताजी को मैंने अंग्रेजी पढ़ाई थी। उन्होंने मुझे सांसद का टिकट दिया। जब जीत गया तो उन्होंने कहा कि संसद में कभी अंग्रेजी में मत बोलना। जिस भाषा में लोगों से वोट मांगा है उसी भाषा में संसद में बात रखना।
इसके बाद पूरे कार्यकाल के दौरान मैंने केवल हिंदी में ही संसद में अपनी बात रखी। सपा सरकार ने साहित्यकारों व कलाकारों का काफी सम्मान किया है। पहले भी कई सम्मान मिल चुके हैं। उन्होंने चुटकी लेते हुए कहा,यश भारती उन लोगों को पहले मिल चुका है। जब यह सम्मान मिला था तब यह कमजोर था। आज उसकी पूर्ति हो गई है।
साहित्य शिरोमणि को दिया गया 21-21 लाख का सम्मान
इससे पहले कवि गोपाल दास नीरज व डॉ.उदय प्रताप सिंह को सरकार ने साहित्य शिरोमणि सम्मान दिया। इसके तहत उन्हें 21-21 लाख रुपये,प्रशस्ति पत्र व स्मृति चिह्न दिए गए। वहीं, श्रीमद्भगवद्गीता कंपटीशन जीतने वाली मुंबई की मरियम सिद्दीकी को भी मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने 11 लाख रुपये का चेक देकर सम्मानित किया।
मुख्यमंत्री ने कहा,नीरज व उदय प्रताप ने समाज के लोगों को दिशा दी है। ये दोनों ही हीरे नेताजी ने ढूंढे हैं। हिंदी को आगे बढ़ाने में दोनों का बहुत योगदान है। नेताजी ने भी हिंदी के लिए संघर्ष किया। पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम कहते हैं कि नेताजी ने जितनी हिंदी सिखा दी उससे ज्यादा वे आज तक नहीं सीख पाए।
कार्यक्रम में मरियम सिद्दीकी ने अपनी जेब खर्च से बचाए हुए 11-11 हजार रुपये के दो ड्राफ्ट मुख्यमंत्री को सौंपे। उसने कहा, यह पैसा गरीब बच्चों की पढ़ाई में लगाया जाए क्योंकि उसके अभिभावक तो पढ़ाने-लिखाने में सक्षम हैं। इस मौके पर डॉ.उदय प्रताप की पुस्तक ‘तुम्हें सोचता रहा’, हास्य कवि सर्वेश अस्थाना की पुस्तक ‘साहित्य गंधा’ व रवींद्रनाथ टैगोर की गीतांजलि का हिंदी में अनुवाद की हुई पुस्तक का विमोचन किया गया।
यह अनुवाद शेरजंग गर्ग ने किया है। कार्यक्रम की शुरुआत में नीरज के गीत ‘आदमी हूं आदमी से प्यार करता हूं’ व उदय प्रताप के गीत ‘ख्वाहिशों का सिलसिला...’ को मिथलेश लखनवी ने अपनी मधुर आवाज में पेश किया। इस मौके पर कैबिनेट मंत्री अंबिका चौधरी, राजेंद्र चौधरी व गायत्री प्रजापति भी उपस्थित थे।
यमुना में फेंके पैसे उठाते थे नीरज
मुलायम सिंह यादव ने कहा कि सुप्रसिद्ध कवि डॉ.गोपाल दास नीरज बहुत ही साधारण परिवार से आते हैं। इटावा में ही यमुना के किनारे एक छोटा सा गांव है। नीरज जब छोटे थे तो जैसे ही कोई यमुना में सिक्का फेंकता,नीरज तुरंत नदी में कूदकर उसे खोजने लगते थे। आज उन्होंने यूपी ही नहीं पूरे देश का नाम रोशन किया है।
ऑस्कर व नोबेल के बराबर है यह पुरस्कार: नीरज
कवि गोपाल दास नीरज ने कहा,‘यह पुरस्कार ऑस्कर व नोबेल पुरस्कार के बराबर है। 1941 से मैंने लिखना शुरू किया था। 73 साल हो गए। इस बीच बहुत से पुरस्कार व सम्मान मिले, लेकिन इससे बढ़कर कोई सम्मान नहीं है’। अंत में उन्होंने अपनी कविता ‘अब तो मजहब कोई ऐसा चलाया जाए...जिसमें इंसान को इंसान बनाया जाए...’ की चंद पंक्तियां भी सुनाईं।