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मदर्स-डे पर जरूर जान लीजिए, भारत में क्या है 'मां' का हाल
अमर उजाला ब्यूरो, लखनऊ
Updated Sun, 14 May 2017 02:29 PM IST
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मां (पेंटिंग)
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आज मां का दिन है। जननी दिवस। लेकिन हम इसी जननी को वैसी देखभाल नहीं दे पा रहे जो न केवल उसकी सेहत बल्कि अगली पीढ़ी की सेहत के लिए भी जरूरी है।
नेशनल फैमिली हैल्थ सर्वे 2015 के आंकड़ों में जननी को मिल रही देखभाल के बारे में कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आए हैं। अमर उजाला ने इन्हीं आंकड़ों का विश्लेषण करते हुए यह रिपोर्ट तैयार की, जिसमें संकेत है कि जितना स्नेह हम आज अपनी मां को दिखा रहे हैं, वह केवल बातों में जताते न रह जाएं। बल्कि उतने ही समर्पण से अपने परिवार में मौजूद हर जननी को उचित देखभाल की शपथ लें और उसे पूरा करें।
एनएफएचएस बताता है कि यूपी में सिर्फ 5.9 प्रतिशत गर्भवती को प्रसव से पहले पूर्ण देखभाल मिल रही है। गर्भवती होने के पहले तीन महीने में 45.9 प्रतिशत महिलाएं ही मेडिकल जांच करवा पाती हैं। चिकित्सा मानकों के अनुसार उन्हें प्रसव पूर्व कम से कम चार बार यह चेकअप करवाने होते हैं, लेकिन 26.4 प्रतिशत जननी ही यह न्यूनतम देखभाल पा रही हैं।
बाकी 73.6 प्रतिशत से यह मूल देखभाल आज भी दूर है। इसमें सरकारी स्तर पर जागरुकता और मेडिकल सेवाओं की पहुंच एक प्रमुखवजह है तो यह भी संकेत मिलता है कि परिवारों द्वारा कष्ट उठाकर जननी को यह सेवाएं दिलाने में भी गंभीरता नहीं दिखाई जा रही है।
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नेशनल फैमिली हैल्थ सर्वे 2015 के आंकड़ों में जननी को मिल रही देखभाल के बारे में कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आए हैं। अमर उजाला ने इन्हीं आंकड़ों का विश्लेषण करते हुए यह रिपोर्ट तैयार की, जिसमें संकेत है कि जितना स्नेह हम आज अपनी मां को दिखा रहे हैं, वह केवल बातों में जताते न रह जाएं। बल्कि उतने ही समर्पण से अपने परिवार में मौजूद हर जननी को उचित देखभाल की शपथ लें और उसे पूरा करें।
एनएफएचएस बताता है कि यूपी में सिर्फ 5.9 प्रतिशत गर्भवती को प्रसव से पहले पूर्ण देखभाल मिल रही है। गर्भवती होने के पहले तीन महीने में 45.9 प्रतिशत महिलाएं ही मेडिकल जांच करवा पाती हैं। चिकित्सा मानकों के अनुसार उन्हें प्रसव पूर्व कम से कम चार बार यह चेकअप करवाने होते हैं, लेकिन 26.4 प्रतिशत जननी ही यह न्यूनतम देखभाल पा रही हैं।
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बाकी 73.6 प्रतिशत से यह मूल देखभाल आज भी दूर है। इसमें सरकारी स्तर पर जागरुकता और मेडिकल सेवाओं की पहुंच एक प्रमुखवजह है तो यह भी संकेत मिलता है कि परिवारों द्वारा कष्ट उठाकर जननी को यह सेवाएं दिलाने में भी गंभीरता नहीं दिखाई जा रही है।
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इसलिए ज्यादा देखभाल की जरूरत
मां (डेमो फोटो)
इसलिए ज्यादा देखभाल की जरूरत
1. गर्भावस्था में फॉलिक एसिड की टेबलेट 100 दिन खानी होती है ताकि कमजोरी और आयरन की कमी दूर हो। यूपी की केवल 12.9 प्रतिशत महिलाएं ऐसा कर पा रही हैं।
2. प्रसव के दो दिन के भीतर 46 प्रतिशत महिलाओं को डॉक्टर, नर्स, एएनएम या किसी अन्य स्वास्थ्य कार्यकर्ता की देखभाल नहीं मिल पा रही है।
3. एक गर्भवती के स्वास्थ्य पर यूपी में औसतन 1,956 रुपये आउट ऑफ पॉकेट खर्च हो रहा है। जबकि देश का औसत 3,198 रुपये है।
4. 100 में चार बच्चे, आज भी घरों में जन्म ले रहे हैं।
5. 13.4 प्रतिशत गर्भवती महिलाओं को नियोनेटल टिटनस से भी सुरक्षा नहीं मिल पा रही है।
कम उम्र में मां बनने वाली ज्यादा
इन्हीं आंकड़ों ने यह बात भी सामने आई है कि यूपी में 21.2 प्रतिशत लड़कियों की शादी 18 वर्ष से कम उम्र में कर दी गईं। ग्रामीण क्षेत्रों में 24.9 प्रतिशत और शहरों में 11.3 प्रतिशत लड़कियां 18 साल की होने से पहले ही ब्याह दी गईं। इससे उनकी सेहत को नुकसान होगा। दूसरे ओर टोटल फर्टिलिटी रेट (टीएफआर) भी देखना होगा।
टीएफआर यानी एक महिला अपने जीवन काल में औसतन कितने बच्चों को जन्म देगी? यूपी में टीएफआर 2.7 है तो देश का 2.2। यह 0.5 अंकों का अंतर यूपी की आबादी के तेजी से बढ़ने की अब भी वजह बना हुआ है।
यूपी राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग की अध्यक्ष जूही सिंह बताती हैं कि नाबालिग बच्चियों की शादियों पर रोक लगाने पर न केवल उनके स्वास्थ्य, बल्कि प्रदेश की आबादी को भी नियंत्रित किया जा सकता है। कम उम्र में शादी का यह मतलब है कि अगर वह जल्दी मां बनेंगी, तो इसमें उसका निर्णय महत्व नहीं रखेगा।
1. गर्भावस्था में फॉलिक एसिड की टेबलेट 100 दिन खानी होती है ताकि कमजोरी और आयरन की कमी दूर हो। यूपी की केवल 12.9 प्रतिशत महिलाएं ऐसा कर पा रही हैं।
2. प्रसव के दो दिन के भीतर 46 प्रतिशत महिलाओं को डॉक्टर, नर्स, एएनएम या किसी अन्य स्वास्थ्य कार्यकर्ता की देखभाल नहीं मिल पा रही है।
3. एक गर्भवती के स्वास्थ्य पर यूपी में औसतन 1,956 रुपये आउट ऑफ पॉकेट खर्च हो रहा है। जबकि देश का औसत 3,198 रुपये है।
4. 100 में चार बच्चे, आज भी घरों में जन्म ले रहे हैं।
5. 13.4 प्रतिशत गर्भवती महिलाओं को नियोनेटल टिटनस से भी सुरक्षा नहीं मिल पा रही है।
कम उम्र में मां बनने वाली ज्यादा
इन्हीं आंकड़ों ने यह बात भी सामने आई है कि यूपी में 21.2 प्रतिशत लड़कियों की शादी 18 वर्ष से कम उम्र में कर दी गईं। ग्रामीण क्षेत्रों में 24.9 प्रतिशत और शहरों में 11.3 प्रतिशत लड़कियां 18 साल की होने से पहले ही ब्याह दी गईं। इससे उनकी सेहत को नुकसान होगा। दूसरे ओर टोटल फर्टिलिटी रेट (टीएफआर) भी देखना होगा।
टीएफआर यानी एक महिला अपने जीवन काल में औसतन कितने बच्चों को जन्म देगी? यूपी में टीएफआर 2.7 है तो देश का 2.2। यह 0.5 अंकों का अंतर यूपी की आबादी के तेजी से बढ़ने की अब भी वजह बना हुआ है।
यूपी राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग की अध्यक्ष जूही सिंह बताती हैं कि नाबालिग बच्चियों की शादियों पर रोक लगाने पर न केवल उनके स्वास्थ्य, बल्कि प्रदेश की आबादी को भी नियंत्रित किया जा सकता है। कम उम्र में शादी का यह मतलब है कि अगर वह जल्दी मां बनेंगी, तो इसमें उसका निर्णय महत्व नहीं रखेगा।