कमल खिला पाएगा मोदी का आखिरी दांव?
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राजधानी में रविवार को होने जा रही मोदी की विजय शंखनाद महारैली में भाजपा यूपी में अपने चुनावी एजेंडे पर से परदा उठाएगी।
इससे पता चलेगा कि मोदी या भाजपा लोकसभा की सबसे ज्यादा सीटों वाले और सबसे कठिन चुनौती वाले इस राज्य में बाजी जीतने को किस राह चलने की तैयारी कर रहे हैं।
इसके लिए उन्होंने अपने किन-किन हथियारों को इस्तेमाल करने की योजना बनाई है। उत्तर प्रदेश में मोदी की यह अंतिम रैली है। इसके बाद उनके यहां रैली नहीं बल्कि संसदीय क्षेत्र में सभाएं करने की ही संभावना है।
फिर नहीं होगा सीधा संवाद
दरअसल, लखनऊ की महारैली के बाद मोदी को उत्तर प्रदेश के लोगों से सीधे संवाद को दूसरा कोई और मौका नहीं होगा। इसलिए स्वाभाविक है कि मोदी यहां जो कुछ बोलेंगे, उसके पीछे उनकी बाकायदा राजनीतिक व रणनीतिक योजना ही होगी।
इसलिए जाहिर है कि यह महारैली यूपी में भाजपा का चुनावी एजेंडा ही नहीं सेट करेगी बल्कि नेताओं की पकड़ व पहुंच तथा कौशल की कसौटी की झलक दिखाने का भी काम करेगी।
हालांकि, मोदी यूपी की सभी रैलियों में वक्त के हिसाब से विरोधी दलों पर निशाना साधते रहे हैं। रैली की इस रेस में वे मुलायम और राहुल से कहीं आगे निकलते भी दिखाई दिए हैं। देखना ये है कि इस रैली में वो क्या गुल खिलाते हैं।
कुछ सवाल लेकर भी आई महारैली
मोदी की लखनऊ में होने जा रही महारैली कुछ सवाल लेकर भी आई है। साथ ही इर महारैली को लेकर कई जिज्ञासाएं भी हैं।
लोगों की निगाहें इस बात पर ज्यादा टिकी हुई हैं कि पार्टी के शीर्ष पुरुष अटल विहारी वाजपेयी के संसदीय व कर्मक्षेत्र में मोदी क्या कुछ बोलते हैं?
हिंदुत्व व राममंदिर जैसे खास मुद्दों पर वह अपने पत्ते खोलते हैं या इसपर परदा ही डाले रखते हैं।
यह देखना भी दिलचस्प होगा कि दूसरों से अलग पार्टी होने का दावा करने वाली पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार मोदी के मंच पर दूसरी पार्टियों की तरह दलबदलुओं को जगह दी जाती है या अपनी पहचान को बरकरार रखते हुए इनसे दूरी रखी जाती है।
ये है पिछली सात रैलियों का साराशं
लखनऊ महारैली के पहले मोदी प्रदेश में सात विजय शंखनाद रैलियों को संबोधित कर चुके हैं। हालांकि, उन्होंने कानपुर से लेकर मेरठ तक की रैलियों की यात्रा में भाजपा के पहचान वाले मुद्दों पर या तो चुप्पी साधे रखी है अथवा घुमा-फिराकर बोले हैं।
उन्होंने सातों रैलियों में न तो हिंदुत्व को धार देने की कोशिश की और न राम मंदिर पर जुबान खोली। मोदी ने उत्तर प्रदेश में रैलियों की यात्रा कानपुर से उस समय प्रारंभ की थी जब सूबे का ज्यादातर हिस्सा मुजफ्फरनगर दंगे की आग की आंच से परेशान था।
पर, उन्होंने न तब मुजफ्फरनगर पर कोई बात की और न जब मेरठ पहुंचे तो भी इसका सीधे-सीधे जिक्र किया। सिर्फ संकेतों में पीड़ितों से सहानुभूति जताकर आगे बढ़ गए।
जब सुनाने लगे एक जुलाहे की व्यथा-कथा
वाराणसी में उन्होंने काशी-विश्वनाथ मंदिर में पूजा-अर्चना तो की और संकट मोचन मंदिर में भी माथा टेंका।
हालांकि, जब मोदी रैली को संबोधित करने पहुंचे तो उन्होंने अपने भाषण में एक जुलाहे की व्यथा-कथा कहकर यह संदेश देने की कोशिश की कि उनके दिल में हिंदू-मुस्लिम नहीं बल्कि आम हिंदुस्तानी की पीड़ा है।
हिंदुत्व के एजेंडे पर जिज्ञासा और इसलिए भी बढ़ गई है क्योंकि राजनाथ सिंह के माफीनामे पर खासी सियासी गर्मी बढ़ी हुई है।
अटल को लेकर भी सवाल बरकरार
भगवा टोली की तरफ से अटल के विकल्प के तौर पर नेतृत्व के लिए उतारे गए मोदी के भाषण में अब तक अटल विहारी वाजपेयी पर फोकस कम ही रहा है।
सात विजय शंखनाद रैलियों में उन्होंने अब तक अटल का दो या तीन बार ही जिक्र किया है। इसलिए देखने वाली बात यह है कि अटल की कर्मभूमि पर मोदी उनको लेकर क्या कहते हैं।
एक सवाल यह भी अब तक मरा नहीं है कि मोदी चुनाव कहां से लड़ेंगे। पिछले दिनों वाराणसी से चुनाव लड़ने की कयास पर काफी गहमागहमी रही, लेकिन सच तो यह है कि यूपी में लखनऊ, फैजाबाद, वाराणसी के साथ-साथ इलाहाबाद से भी मोदी के चुनाव लड़ने की अटकलबाजी होती रही है।
दागी और दलबदलू भी बड़ा सवाल
जिस तरह इस समय भाजपा में आने वालों की सिलसिला जारी है। कुछ आ चुके हैं और कुछ के आने की चर्चा है।
उसको देखते हुए यह जिज्ञासा भी महारैली के साथ जुड़ गई है कि क्या लखनऊ में महारैली में सिर्फ अटल की विरासत और मोदी की मजबूती के जरिये लोगों को भविष्य में स्थिर सरकार देने के संदेश दिया जाएगा।
या फिर उदितराज और योगी आदित्यनाथ जैसे दो धुर विरोधी पहचान वाले चेहरों के एक साथ मंच पर जगह देकर जोड़तोड़ व सत्ता के लिए सिद्धांतों की नई परिभाषा गढ़ने का कौशल दोहराने की कोशिश होगी।
रैली में भीड़ की ताकत का भी रिकॉर्ड
भाजपा ने दावा भले ही 15 लाख लोगों को जुटाने का किया हो लेकिन महारैली के लिए उसे जो मैदान चुना गया है उसकी क्षमता 4.80 लाख लोगों की ही है।
लेकिन भीड़ से भाजपा का कोई मिशन पूरा होता तो वर्ष 2006 में उस समय के बड़े मैदान अंबेडकर मैदान को ओवरफ्लो कर देने वाली रैली के बाद भाजपा उत्तर प्रदेश विधानसभा में 88 सीटों से सिमटकर 51 पर न आ जाती।
इतना ही नहीं, 2009 के लोकसभा चुनाव में भी नतीजे उसे झटका देने वाले न होते। हालांकि, हर चुनाव पिछले चुनाव से अलग होता है, तो क्या पता मोदी की भीड़ का जादू इस बार भाजपा के लिए वरदान साबित ही हो जाए।