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क्या वाकई नरेंद्र मोदी से डरते हैं मुसलमान?
मनोज श्रीवास्तव/लखनऊ
Updated Sat, 19 Oct 2013 05:52 PM IST
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गुजरात दंगों को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आए नरेंद्र मोदी की प्रधानमंत्री पद पर सशक्त दावेदारी के बाद मुस्लिम मन में उथल-पुथल है।
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किसी का मानना है कि प्रधानमंत्री बनने के साथ मोदी अपनी पुरानी छवि से पिंड छुड़ाना चाहेंगे तो किसी को आशंका है कि पूरे देश में गुजरात के दोहराने का खतरा बढ़ जाएगा।
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कुछ तो ऐसी तस्वीर पेश करने की कोशिश कर रहे हैं कि इस देश में मुसलमानों की इस्लामी पहचान पर ही संकट खड़ा हो सकता है।
छिटपुट चेहरे छोड़ दें तो शायद ही कोई भी मुसलमान मोदी की वकालत करता मिले। वहीं दूसरी ओर तथाकथित सेकुलर दल मोदी विरोध की धुरी बन कर मुस्लिम वोटों को अपने पाले में खींचने की जुगत में जुटे हैं।
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मोदी का खौफ जगाकर मुसलमानों के वोट झटकने की भी कवायद हो रही है। जमीयत उलमा हिंद के नेता सैयद महमूद मदनी ने इस ओर इशारा भी किया है।
उन्होंने सीधे कांग्रेस को कठघरे में खड़ा करते हुए कहा कि उसकी ओर से ऐसी कोशिश हो रही है पर मुसलमानों को डरने की जरूरत नहीं। अब सवाल उठता है कि क्या मुसलमान सचमुच डरे हुए हैं।
मुस्लिम समाज इस डर को स्वीकार करने को तैयार नहीं। उसके मुताबिक यह सच नहीं है। जमीनी हकीकत कुछ और है। मुस्लिम मन बदला हुआ दिख रहा है।
उसका मोदी विरोध नफरत की हद तक साफ दिखता है पर अभी किसी एक दल के पाले में जाने से झिझक रहा है।
मुस्लिम राजनीति का मर्म समझने वालों का कहना है कि मुसलमानों ने पिछले सालों में सेकुलर दलों की असलियत भी देख ली है, इसलिए मोदी के विरोध में मुस्लिम वोट किसी एक दल को नहीं जाएंगे।
मुस्लिम वोटों की सबसे बड़ी दावेदार सपा से मुस्लिमों का मन मुजफ्फरनगर दंगों के बाद कुछ उखड़ा हुआ है तो रामपुर व अलीगढ़ में राहुल की सभाओं ने कांग्रेस से उनकी तटस्थता को जगजाहिर कर दिया है।
बसपा से भी मन मिलने के कोई संकेत अभी तक नहीं मिले हैं। माना यही जा रहा है कि हर लोकसभा क्षेत्र में मुसलमानों के वोट देने के कारण और समीकरण अलग हो सकते हैं।
जाहिर है ऐसी स्थिति चुनाव तक बरकरार रही तो मोदी विरोध का तत्व भी मोदी की राह आसान करता दिखेगा।
मोदी का हौव्वा बनाम सेकुलर दल
कांग्रेस के एक नेता दबी जुबान यह कहने से नहीं हिचकते कि मोदी के कारण उनकी पार्टी प्रदेश में शर्मनाक पराजय से बच जाएगी।
दरअसल इन लोगों का मानना है कि मोदी का हौव्वा खड़ा कर देने से मुस्लिम वोट एकमुश्त उनकी झोली में आ जाएगा और राजनीतिक तौर से दिवालिया होने से बच जाएंगे।
मुजफ्फनगर दंगों के कारण सपा से मुस्लिम मन के थोड़ा बिदकने से भी इनकी बांछें खिली हुई हैं, पर मुस्लिम वोटों पर एकाधिकार जताने से वे फिलहाल बचते दिख रहे हैं।
महमूद मदनी की चेतावनी का कितना असर होगा, यह कह पाना फिलहाल मुश्किल है। वैसे मदनी की बातों को कोई सेकुलर दल गंभीरता से लेता नहीं दिख रहा।
इसका एक बड़ा कारण यह है कि मुसलमान आजादी के बाद से जज्बातों के आधार पर वोट देता आया है, रेशनल हुआ ही नहीं।
कभी कांग्रेस के सेकुलरिज्म के नाम पर तो कभी अयोध्या विवाद के कारण सपा का दीवाना हुआ। मुस्लिम राजनीति के एक बड़े जानकार कहते हैं कि कमी मुस्लिम मिजाज की है।
अगर वह जज्बातों में न आकर काम के आधार पर वोट का फैसला करे तो किसी राजनीतिक दल की क्या बिसात कि वह चुनाव के समय हमारे जज्बात जगाकर वोट ले ले और फिर पांच साल के लिए भूल जाए।
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