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घूसखोरी मामला: कंपनियों तक बिचौलिये पहुंचाते थे टेंडर के गोपनीय दस्तावेज, तय होता था कमीशन; बड़ा खुलासा
Mon, 23 Feb 2026 07:43 AM IST
भूपेन्द्र सिंह
सूरज शुक्ला, अमर उजाला ब्यूरो, लखनऊ
सूरज शुक्ला, अमर उजाला ब्यूरो, लखनऊ
Published by: भूपेन्द्र सिंह
Updated Mon, 23 Feb 2026 07:43 AM IST
सार
सीबीआई ने 10 लाख की रिश्वत लेते वापकोस के प्रोजेक्ट मैनेजर समेत पांच आरोपियों को गिरफ्तार किया है। मामले में हैरान करने वाले खुलासे हुए हैं। कंपनियों तक बिचौलिये टेंडर के गोपनीय दस्तावेज पहुंचाते थे। इनका कमीशन पहले से तय होता था। टेंडर प्रक्रिया सिर्फ औपचारिकता होती थी। आगे पढ़ें पूरी खबर...
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घूसखोरी (सांकेतिक तस्वीर)।
- फोटो : अमर उजाला नेटवर्क
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विस्तार
10 लाख की रिश्वतखोरी के मामले में लखनऊ में सीबीआई की तफ्तीश में बड़ा खुलासा हुआ है। वाटर एंड पावर कंसल्टेंसी सर्विसेज लिमिटेड (वापकोस) के आरोपी अफसर टेंडर की गोपनीय जानकारी व दस्तावेज बिचौलिये को देते थे। बिचौलिओं के जरिये डील होने के बाद ये अहम जानकारी ठेका लेने वाली कंपनियों को दी जाती थी। इसके बाद टेंडर प्रक्रिया में सिर्फ औपचारिकता होती थी।
सीबीआई ने शनिवार को वापकोस के प्रोजेक्टर मैनेजर पंकज दुबे, इकाना इंटरप्राइज के प्रोपराइटर बबलू सिंह यादव, बिचौलिये राहुल वर्मा व बबलू के अलावा पंकज के ड्राइवर शुभम पाल को गिरफ्तार किया था।
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गोपाल उन कंपनियों से संपर्क करता था, जो टेंडर के लिए इच्छुक होती थीं। जो कंपनी टेंडर की अपेक्षा 6-10 प्रतिशत रिश्वत देने को तैयार होती थी, उनसे वह डील फाइनल करता था। फिर उससे टेंडर संबंधी पूरी जानकारी साझा करता था। कंपनी उसी आधार पर टेंडर प्रक्रिया में शामिल होती थी। इससे उसको टेंडर मिल जाता था। इकाना इंटरप्राइज को मिले टेंडर में भी इसी तरह का खेल हुआ।
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सीबीआई ने शनिवार को वापकोस के प्रोजेक्टर मैनेजर पंकज दुबे, इकाना इंटरप्राइज के प्रोपराइटर बबलू सिंह यादव, बिचौलिये राहुल वर्मा व बबलू के अलावा पंकज के ड्राइवर शुभम पाल को गिरफ्तार किया था।
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इस तरह पूरा रैकेट करता था काम
उड़ीसा में इमली प्रसंस्करण इकाई का 11.81 करोड़ रुपये का ठेका देने के एवज में बबलू बिचौलिओं के जरिये रिश्वत की किस्त की ये रकम पंकज को पहुंचा रहा था। एफआईआर में एक और बिचौलिया गोपाल मिश्रा भी नामजद है। जांच में सामने आया कि जो भी टेंडर निकलते थे, उसकी पूरी गोपनीय जानकारी पंकज, गोपाल को देता था।
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गोपाल उन कंपनियों से संपर्क करता था, जो टेंडर के लिए इच्छुक होती थीं। जो कंपनी टेंडर की अपेक्षा 6-10 प्रतिशत रिश्वत देने को तैयार होती थी, उनसे वह डील फाइनल करता था। फिर उससे टेंडर संबंधी पूरी जानकारी साझा करता था। कंपनी उसी आधार पर टेंडर प्रक्रिया में शामिल होती थी। इससे उसको टेंडर मिल जाता था। इकाना इंटरप्राइज को मिले टेंडर में भी इसी तरह का खेल हुआ।