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गुरमति साहित्य में सामाजिक एकजुटता का संदेश: नरेंद्र मोंगा
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संगोष्ठी में उपस्थित लोग।
लखनऊ। उत्तर प्रदेश पंजाबी अकादमी की ओर से गुरमति साहित्य में मंगलवार को इंदिरा भवन में ब्रज भाषा का प्रभाव विषयक संगोष्ठी हुई। वक्ताओं ने कहा कि गुरमति साहित्य में सामाजिक एकजुटता के लिए पंजाबी और उत्तर भारत की स्थानीय भाषाओं का प्रयोग किया गया।
संगोष्ठी में वरिष्ठ पंजाबी लेखक नरेंद्र सिंह मोंगा ने कहा कि गुरुनानक साहिब ने अपने समय की परिस्थितियों को देखते हुए गुरमति साहित्य की भाषा के लिए सामाजिक एकजुटता के लक्ष्य को ध्यान में रखा। उन्होंने पंजाबी के अलावा उत्तर भारत की स्थानीय भाषाओं ब्रजभाषा, अवधी, खड़ी बोली आदि की मिश्रित भाषा का प्रयोग किया। लिपि के लिए ब्राह्मी लिपि से विकसित लेंहदी लिपि चुनी, जो परिष्कृत होकर गुरुमुखी बन गई।
पंजाबी लेखक दविंदर पाल सिंह बग्गा ने कहा कि गुरुग्रंथ साहिब में वर्णित वाणीकारों में सिख धर्म के छह गुरु साहबान के अलावा 15 भक्तजनों की वाणी भी शामिल है। नवयुग कन्या महाविद्यालय में दर्शनशास्त्र विभाग की अध्यक्ष मेजर डॉ. मनमीत कौर सोढी ने कहा कि गुरमति साहित्य पर ब्रज भाषा का प्रभाव सिख धर्म की समावेशी प्रवृत्ति को दर्शाता है। पंजाबी िवदुषी रनदीप कौर, संयोजक अरविंद नारायण मिश्र, मीना सिंह, अंजू सिंह, महेंद्र वर्मा ने भी विचार रखे।
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संगोष्ठी में वरिष्ठ पंजाबी लेखक नरेंद्र सिंह मोंगा ने कहा कि गुरुनानक साहिब ने अपने समय की परिस्थितियों को देखते हुए गुरमति साहित्य की भाषा के लिए सामाजिक एकजुटता के लक्ष्य को ध्यान में रखा। उन्होंने पंजाबी के अलावा उत्तर भारत की स्थानीय भाषाओं ब्रजभाषा, अवधी, खड़ी बोली आदि की मिश्रित भाषा का प्रयोग किया। लिपि के लिए ब्राह्मी लिपि से विकसित लेंहदी लिपि चुनी, जो परिष्कृत होकर गुरुमुखी बन गई।
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पंजाबी लेखक दविंदर पाल सिंह बग्गा ने कहा कि गुरुग्रंथ साहिब में वर्णित वाणीकारों में सिख धर्म के छह गुरु साहबान के अलावा 15 भक्तजनों की वाणी भी शामिल है। नवयुग कन्या महाविद्यालय में दर्शनशास्त्र विभाग की अध्यक्ष मेजर डॉ. मनमीत कौर सोढी ने कहा कि गुरमति साहित्य पर ब्रज भाषा का प्रभाव सिख धर्म की समावेशी प्रवृत्ति को दर्शाता है। पंजाबी िवदुषी रनदीप कौर, संयोजक अरविंद नारायण मिश्र, मीना सिंह, अंजू सिंह, महेंद्र वर्मा ने भी विचार रखे।
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