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मैं लखनऊ का था, हूं और लखनऊ का ही रहूंगा... : अटल

Fri, 17 Aug 2018 08:14 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ Updated Fri, 17 Aug 2018 08:14 AM IST
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memories of atal bihari related to lucknow.
लखनऊ में एक जनसभा के दौरान अटल बिहारी वाजपेयी। - फोटो : amar ujala

अटल विहारी वाजपेयी लखनऊ में जब कभी किसी कार्यक्रम में अतिथि बनाए जाते थे तो उनकी बात यहीं से शुरू होती थी, ‘मैं लखनऊ का था, हूं और लखनऊ का ही रहूंगा।’ यह कहते हुए वह मेहमान के बजाय मेजबान के रूप में अपनी भूमिका तय कर लेते थे। यह अकारण नहीं था। आखिर जिस शहर ने कविता करने वाले अटल के संघ के स्वयंसेवक, संपादक, पत्रकार और फिर राजनीतिक कार्यकर्ता से राजनेता बनने तक का सफर देखा हो, वहां के लिए वह अतिथि हो भी कैसे सकते थे।

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शायद यही वजह रही कि अटल की खराब सेहत की खबर ने लखनऊ को बुधवार देर रात से ही चिंतित कर रखा था। शायद ही कोई घर या कार्यालय ऐसा रहा हो जहां अटल की सेहत जानने की जिज्ञासा न दिखी हो। लोग दिल को ढांढस देने की कोशिश कर रहे थे, पर किसी अनहोनी की आशंका सभी को परेशान किए हुए थी।
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आखिर,  शाम 5.05 पर वह मनहूस खबर आ गई जिसे लखनऊ वाले नहीं सुनना चाहते थे। टी.वी. स्क्रीन पर अटल की मृत्यु की खबर फ्लैश हुई, लखनऊ सन्नाटे में आ गया। लोगों के मुंह से यही निकला, ‘अलविदा अटल! हमारे लिए अमर रहोगे।’
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गुलरुखों से गुलिस्तां है, कूचा हाए लखनऊ।
क्यों न दिल मानिंद बुलबुल, हो फिदा-ए लखनऊ।।


राजा नवाब अली खां की यह पंक्तियां लखनऊ के बारे में थोड़े में बहुत कुछ कह देती है। पर, बात जब अटल विहारी वाजपेयी की हो तो इन पंक्तियों का अर्थ बदल जाता है। कवि, साहित्यकार, पत्रकार, लेखक, राजनेता, कूटनीतिज्ञ और कार्यकर्ता के रूप दुनिया के पटल पर छा जाने वाले अटल वह शख्स थे जिन्होंने जन्म भले ही लखनऊ में न लिया हो लेकिन वे यहां की मिट्टी में ऐसा रचे-बसे कि जिस लखनऊ पर सब फिदा हुआ करते थे लेकिन वह शहर और इस शहर के लोग उन पर फिदा होकर रह गए।

अटल और लखनऊ वैसे ही हैं जैसे दो शरीर एक जान। लखनऊ ने उन्हें तमाम खट्टे-मीठे अनुभव कराए। हराया, छकाया और थकाने की कोशिश की। परंतु तो अटल तो अटल थे। प्रचारक, पत्रकार व पॉलिटीशियन के रूप में अटल का लोगों से परिचय कराने वाले लखनऊ ने ही उन्हें बाद में अपना सांसद चुना। सिर्फ सांसद नहीं बल्कि सबसे लोकप्रिय सांसद, जो प्रधानमंत्री बना। हाल ही में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लखनऊ को यूं ही विकास की प्रयोगशाला नहीं कहा। अटलजी ने विकास के सभी मॉडलों का लखनऊ में प्रयोग किया और यहां के बाद उन्हें देश के स्तर पर लागू किया।

‘लखनऊ मेरा घर है, मुझसे पीछा नहीं छुड़ा पाओगे’

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अटल विहारी वाजपेयी - फोटो : amar ujala

लखनऊ से लोकसभा के 1954, 1957 और 1962 का चुनाव हारने के बाद वह 1991 तक यहां से चुनाव नहीं लड़े। पर, लखनऊ बराबर आते-जाते रहे। वह 1991 में जब लोकसभा चुनाव के यहां से उम्मीदवार हुए तो बोले, ‘आप लोगों ने क्या सोचा था, मुझसे पीछा छूट जाएगा तो यह होने वाला नहीं। मेरो मन अनत कहां सुख पावे, लखनऊ मेरा घर है। इतनी आसानी से मुझसे रिश्ता नहीं तोड़ सकते। मेरा नाम भी अटल है। देखता हूं कि कब तक मुझे सांसद नहीं बनाओगे।’ अटल सांसद चुन लिए गए।
लोकसभा में विपक्ष का नेता होने के नाते व्यस्तता के बावजूद वह लखनऊ में एक सांसद के रूप में काफी सक्रिय रहे। लखनऊ ने उन्हें पांच बार सांसद चुना। तमाम उतार-चढ़ाव आए लेकिन लखनऊ वालों का अटल से और अटल का लखनऊ वालों से रिश्ता कायम रहा।

सामुदायिक केंद्र से कन्वेंशन सेंटर

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बड़े राजनेता होने के बावजूद बतौर सांसद वह अपने क्षेत्र के सरोकारों को लेकर कितने सक्रिय और सचेत थे, इसका पता उनके बतौर सांसद यहां शुरू कराए गए कामों से मिलता है। पहले उन्होंने सांसद के तौर पर यहां प्रयोग किया और फिर सफल रहने पर उसे देश भर में लागू किया। पूर्व नगर विकास मंत्री लाल जी टंडन बताते हैं, ‘एक दिन अटल जी और हम बैठे थे। उन्होंने कहा, ‘देखता हूं कि यहां मध्यम और गरीब तबके के लोगों के लिए कोई ऐसी जगह नहीं सुलभ है जहां पर वह अपने बेटे-बेटी का विवाह संस्कार कर सकें।’

इसी के बाद लखनऊ में सामुदायिक केंद्र बनाने का काम शुरू हुआ। इसके बाद कल्याण मंडप की कल्पना बनी। सामुदायिक केंद्र गरीबों का आज भी बड़ा सहारा हैं जहां पर उन्हें बरतन तक मिलते हैं। कल्याण मंडपों की लोकप्रियता भी किसी से छिपी नहीं है।’

कहा जाए कि गरीबों के लिए रैन बसेरा, बड़े बौद्धिक जुटानों के लिए साइंटिफिक कन्वेंशन सेंटर, लखनऊ की सड़कों का चौड़ीकरण, संसदीय क्षेत्र में आने वाले विधानसभा के महोना क्षेत्र के गांवों को जोड़ने के लिए रास्तों का निर्माण, अस्पतालों में रोगियों के तीमारदारों के लिए रहने को बसेरों का निर्माण, गरीबों के लिए पांच, दस और पंद्रह रुपये रोज पर मकान जैसे प्रयोगों ने आगे चलकर गरीबों के लिए वाल्मीकि-आंबेडकर आवास योजना, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना, गांवों तक सामुदायिक केंद्रों का निर्माण, देश में अच्छी और चौड़ी सड़कों के निर्माण जैसी योजनाओं को जन्म दिया जाए तो अतिश्योक्ति न होगी। मध्यम दर्जे के लिए सस्ते ब्याज पर ऋण और वाहनों के लिए सरलता से ऋण तो किसानों के लिए किसान क्रैडिट कार्ड जैसी क्रांतिकारी योजनाओं ने लोगों का जीवन बदल दिया, इसे स्वीकार करने में शायद ही कोई परहेज करे।

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