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भाजपा के लिए पहेली बनी सीएम योगी और मंत्रियों की सदस्यता, सपा-कांग्रेस दे सकते हैं चुनौती

Tue, 13 Jun 2017 01:53 AM IST
अखिलेश वाजपेयी/अमर उजाला, लखनऊ
अखिलेश वाजपेयी/अमर उजाला, लखनऊ Updated Tue, 13 Jun 2017 01:53 AM IST
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 membership of UP chief minister and ministers become puzzle.
सीएम योगी आदित्यनाथ, डिप्टी सीएम केशव प्रसाद व दिनेश शर्मा - फोटो : amar ujala

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सहित दो उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य व डॉ. दिनेश शर्मा, राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) स्वतंत्र देव सिंह व राज्यमंत्री मोहसिन रजा विधानसभा या विधान परिषद के किस सदन की सदस्यता लेंगे, यह पहेली बन गया है।

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विधान परिषद में मई-2018 के पहले इतने लोगों के भाजपा से समायोजन की गुंजाइश नहीं दिख रही है। इस समय स्थानीय प्राधिकारी क्षेत्र कोटे की सिर्फ एक सीट बदायूं की रिक्त है, लेकिन इस पर इनमें से किसी के लड़ने की संभावना दूर-दूर तक नहीं दिखाई देती।
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परिषद की दूसरी सीटें खाली कराने का भाजपा के पास ज्यादा विकल्प नहीं है। ऐसे में इनमें ज्यादातर के विधानसभा उपचुनाव लड़ने की ही संभावना है। इस पर चर्चा को देखते हुए प्रदेश में नए राजनीतिक समीकरण देखने को मिल सकते हैं। साथ ही, राष्ट्रपति चुनाव के बाद प्रदेश में गैर भाजपा दलों में सियासी उलटफेर भी दिखाई दे सकता है।
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मुख्यमंत्री योगी सहित मंत्रिपरिषद में ये पांच ऐसे लोग हैं जो प्रदेश विधानमंडल के किसी सदन, विधानसभा या विधान परिषद के सदस्य नहीं हैं। योगी और केशव मौर्य सांसद हैं व डॉ. दिनेश शर्मा, स्वतंत्र देव सिंह और मोहसिन रजा अभी किसी सदन के सदस्य नहीं हैं। नियमानुसार, इन सबके मंत्री बने रहने के लिए 19 सितंबर से पहले विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य बनना जरूरी है। विधानसभा में इस समय कोई स्थान रिक्त नहीं है।

सौ सदस्यों वाली विधान परिषद में स्थानीय प्राधिकारी कोटे की एक सीट बदायूं रिक्त है। यहां से निर्वाचित बनवारी यादव का पिछले वर्ष निधन हो गया था। पर, सपा का गढ़ और स्थानीय प्राधिकारी कोटे की सीट होने के कारण लगता नहीं कि भाजपा किसी को इस सीट से चुनाव लड़ाएगी।

विधान परिषद से ज्यादा संभावना नहीं, ये है भाजपा की स्थिति

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परिषद में इस समय भाजपा के आठ सदस्य हैं। इनमें तीन विधानसभा कोटे व शेष स्नातक कोटे की सीटों के हैं। स्नातक कोटे की सीटों से किसी से त्यागपत्र दिलाना मुश्किल है। कारण, चुनाव में इस सीट पर जीत की गारंटी नहीं मानी जा सकती।

विधानसभा कोटे अर्थात विधायकों द्वारा चुने गए भाजपा के तीन सदस्यों में डॉ. महेंद्र सिंह और भूपेंद्र चौधरी खुद मंत्री हैं। इनका त्यागपत्र नहीं होना है। बची एक सीट, जिस पर वाराणसी क्षेत्र के भाजपा अध्यक्ष लक्ष्मण आचार्य हैं।

एक तो प्रधानमंत्री मोदी का क्षेत्र और ऊपर से जातीय समीकरण को देखते हुए भाजपा का आचार्य से त्यागपत्र दिलाकर सीट खाली कराना भी मुश्किल है। फिर, अगर आचार्य सीट खाली भी कर दें तो सिर्फ एक समायोजन हो सकता है जबकि, भाजपा को मुख्यमंत्री, उप मुख्यमंत्री और दोनों मंत्रियों के लिए परिषद से पांच सीटों की जरूरत पड़ेगी।

इसकी गुंजाइश मई-2018 में ही दिखाई देती है तब 13 सदस्य अवकाश ग्रहण करेंगे। इनमें 10-11 सीटों पर भाजपा अपने लोगों को भेज सकेगी।

उप चुनाव में मुश्किलें भी, सपा-कांग्रेस उतार सकते हैं साझा उम्मीदवार

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एक स्थिति यह भी दिखाई दे रही है कि पांच विधायक त्यागपत्र दें और उनकी जगह इन नेताओं को लड़ने का मौका मिल जाए। पर, भाजपा के भीतर योगी और मौर्य को छोड़कर शेष को विधानसभा चुनाव लड़ाने पर असमंजस है।

भाजपा के रणनीतिकारों को आशंका है कि सपा, बसपा और कांग्रेस उपचुनाव में इनके खिलाफ साझा उम्मीदवार उतार सकती है। जिससे चुनाव जीतने की राह में मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं।

अगर एक भी मंत्री चुनाव हार गया तो उस स्थिति में पार्टी की बड़ी किरकिरी होगी। एक तो पार्टी के विधायक भी कम हो जाएंगे और ऊपर से हारने वाले का मंत्री पद भी चला जाएगा। विपक्ष को यह कहने का मौका अलग हाथ लग जाएगा कि छह महीने के भीतर ही भाजपा का ग्राफ गिरने लगा है। भाजपा के रणनीतिकार ऐसा नहीं चाहते।

दूसरी पार्टी के नेताओं से खाली कराई जा सकती है सीट

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ऐसे में भाजपा इन मंत्रियों को पदों पर बरकरार रखने के लिए क्या रास्ता अपनाएगी, इसका उत्तर तो भविष्य के गर्भ में छिपा है। पर, संभावना ज्यादातर के विधानसभा चुनाव लड़ने की ही दिख रही है। मुख्यमंत्री और उप मुख्यमंत्रियों के लिए कई विधायक जिस तरह सीट छोड़ने की पेशकश कर चुके हैं, उससे भी इसकी संभावना दिख रही है।

चर्चा है कि भाजपा के रणनीतिकार अपनी पार्टी के विधायकों से तो सिर्फ मुख्यमंत्री के लिए ही सीट खाली कराएंगे। जिसका भविष्य में विधान परिषद या अन्य किसी तरह से समायोजन किया जाएगा। शेष के लिए दूसरी पार्टियों के विधायकों से सीट खाली कराकर विपक्ष पर मनोवैज्ञानिक बढ़त बनाने की रणनीति पर आगे बढ़ेंगे।

इसकी संभावना इसलिए भी दिखाई देती है क्योंकि भाजपा सरकार बनने के बाद सियासी गलियारों में यह चर्चा गूंजती भी रही है कि विपक्षी पार्टियों के कई विधायक भाजपा के रणनीतिकारों के संपर्क में हैं। बेहतर समायोजन की उम्मीद में सीट छोड़ने को तैयार हैं। जिन्हें राष्ट्रपति चुनाव तक रुकने को कहा गया है।

भाजपा के रणनीतिकार इस विकल्प को बेहतर मानकर आगे बढ़ रहे हैं। इनका मानना है कि इससे भाजपा को यह कहने का मौका मिलेगा कि विपक्ष में बिखराव है। पर, भाजपा सभी पांचों लोगों को विधानसभा उप चुनाव लड़ाएगी, यह नहीं कहा जा सकता।

पहले इस तरह रास्ता अपनाते रहे हैं राजनीतिक दल

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पहले ऐसी स्थिति में सत्तारूढ़ दल संबंधित मंत्रियों से त्यागपत्र दिलाकर फिर उनकी पुनर्नियुक्ति की राह पर भी चलते रहे हैं। जिससे उन्हें छह महीने का और मौका मिल गया और फिर उनका विधान परिषद का सदस्य बनाकर मंत्री बने रहने की राह आसान कर दी गई। पर, नैतिकता को देखते हुए भाजपा शायद ही इस राह पर चले।

संविधान विशेषज्ञ डॉ. सुभाष कश्यप के मुताबिक, सर्वोच्च न्यायालय भी राजनीतिक दलों से ऐसा न करने की अपेक्षा कर चुका है। त्यागपत्र दिलाकर फिर संबंधित मंत्री की नियुक्ति अनैतिक और औचित्य के विरुद्ध है। जो काम प्रत्यक्ष तौर पर अनुचित है वह अप्रत्यक्ष तौर पर भी करने पर अनुचित ही रहेगा। फिर भाजपा अगर एक-दो मंत्रियों के लिए इस राह पर आगे बढ़ भी जाए तो भी कठिनाई यह है कि पुनर्नियुक्ति वाले मंत्रियों को फिर 19 मार्च से पहले किसी सदन का सदस्य बनना होगा।

उस समय भी विधान परिषद का विकल्प भाजपा के सामने नहीं होगा। जो भी हो मुख्यमंत्री सहित मंत्रियों की सदस्यता न सिर्फ पहेली बन गई है बल्कि इसके पीछे कई नए सियासी समीकरण बनने की संभावना भी दिखाई देने लगी है।

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