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Lucknow News: पारंपरिक वाद्यों से निकला कर्णप्रिय संगीत
Wed, 20 Nov 2024 03:20 AM IST
लखनऊ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, लखनऊ
संवाद न्यूज एजेंसी, लखनऊ
Updated Wed, 20 Nov 2024 03:20 AM IST
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भागीदारी उत्सव में वाद्ययंत्र की प्रस्तुति देते कलाकार।
लखनऊ। अंतरराष्ट्रीय भागीदारी उत्सव के पांचवें दिन मंगलवार को पारंपरिक वाद्यों का शो दर्शकों के लिए आकर्षण का केंद्र रहा। असम, छत्तीसगढ़, पंजाब, राजस्थान, झारखंड व अन्य राज्यों के कलाकारों ने प्रस्तुतियां दीं। राजस्थान के तेजपाल दल ने कच्छी घोड़ी नृत्य का प्रभावी प्रदर्शन किया। उड़ीसा का घुड़का नृत्य वासुदेव के निर्देशन में किया गया।
छत्तीसगढ़ के कलाकारों ने भुंजिया आदिवासी नृत्य पेश किया। भुंजिया लोग तेंदू के पत्ते, महुआ के फूलों से शृंगार करते हैं। सभी तरह के मांगलिक अवसरों पर यह नृत्य किया जाता है। इसमें पुरुष, धनुष-बाण और महिलाएं डलिया लेकर एक साथ घेरे में नृत्य करते हैं। असम के दल ने पारंपरिक बर्दोई शिखला नृत्य किया। इसमें महिलाओं ने लाल पीले रंग की वेशभूषा धारण की हुई थी। ड्रम की तरह खम, बांसुरी की भांति सिंफू, वायलिन की तरह के वाद्य सिरजा के साथ यह सुंदर नृत्य किया गया। महिला कलाकारों के हाथों में एक तरह के झुनझुने जैसा पारंपरिक वाद्य जाबखिन भी था। पंजाब का शम्मी नृत्य सतवीर कौर बग्गा के निर्देशन में किया गया।
सांस्कृतिक जन जागृति से देश बनेगा विश्व गुरु
सांस्कृतिक कार्यक्रम से पहले जनजाति विरासत संरक्षण एवं संवर्धन विषय पर संगोष्ठी का आयोजन हुआ। वरिष्ठ कथक नृत्यांगना डॉ. पूर्णिमा पाण्डेय ने कहा कि सांस्कृतिक जनजागृति के माध्यम से देश दोबारा विश्व गुरु बन सकता है। समाज कल्याण विभाग के प्रमुख सचिव डॉ. हरिओम ने बताया कि समय की मांग है कि भारतीय संस्कृति और पर्यावरण का संरक्षण करने वाले भारत के वास्तविक दूतों और उनकी संस्कृति को पुस्तक, कॉफी टेबल बुक आदि के माध्यम से विश्व के समक्ष लाया जाए। इस दिशा में जल्द ही गोंड जनजाति पर एक कॉफी टेबल बुक प्रकाशित की जा रही है। आकाशवाणी के प्रमुख कार्यक्रम अधिशासी अजीत चतुर्वेदी ने बताया कि देश की बोलियों को संरक्षण देने की बहुत आवश्यकता है।
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छत्तीसगढ़ के कलाकारों ने भुंजिया आदिवासी नृत्य पेश किया। भुंजिया लोग तेंदू के पत्ते, महुआ के फूलों से शृंगार करते हैं। सभी तरह के मांगलिक अवसरों पर यह नृत्य किया जाता है। इसमें पुरुष, धनुष-बाण और महिलाएं डलिया लेकर एक साथ घेरे में नृत्य करते हैं। असम के दल ने पारंपरिक बर्दोई शिखला नृत्य किया। इसमें महिलाओं ने लाल पीले रंग की वेशभूषा धारण की हुई थी। ड्रम की तरह खम, बांसुरी की भांति सिंफू, वायलिन की तरह के वाद्य सिरजा के साथ यह सुंदर नृत्य किया गया। महिला कलाकारों के हाथों में एक तरह के झुनझुने जैसा पारंपरिक वाद्य जाबखिन भी था। पंजाब का शम्मी नृत्य सतवीर कौर बग्गा के निर्देशन में किया गया।
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सांस्कृतिक जन जागृति से देश बनेगा विश्व गुरु
सांस्कृतिक कार्यक्रम से पहले जनजाति विरासत संरक्षण एवं संवर्धन विषय पर संगोष्ठी का आयोजन हुआ। वरिष्ठ कथक नृत्यांगना डॉ. पूर्णिमा पाण्डेय ने कहा कि सांस्कृतिक जनजागृति के माध्यम से देश दोबारा विश्व गुरु बन सकता है। समाज कल्याण विभाग के प्रमुख सचिव डॉ. हरिओम ने बताया कि समय की मांग है कि भारतीय संस्कृति और पर्यावरण का संरक्षण करने वाले भारत के वास्तविक दूतों और उनकी संस्कृति को पुस्तक, कॉफी टेबल बुक आदि के माध्यम से विश्व के समक्ष लाया जाए। इस दिशा में जल्द ही गोंड जनजाति पर एक कॉफी टेबल बुक प्रकाशित की जा रही है। आकाशवाणी के प्रमुख कार्यक्रम अधिशासी अजीत चतुर्वेदी ने बताया कि देश की बोलियों को संरक्षण देने की बहुत आवश्यकता है।
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