मलेरिया की एकमात्र दवा होने वाली है बेअसर
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मलेरिया (प्लामोडियम फेल्सीपेरम) के नियंत्रण के लिए नई दवा खोजनी होगी। पांच-छह साल में इस बीमारी के इलाज के लिए उपलब्ध एक मात्र दवा ‘अर्टिसिनेट लुमेफेंटरिन’ के प्रति रजिस्टेंस पैदा हो जाएगा।
थाईलैंड, कंबोडिया, म्यांमार आदि देशों में मरीजों पर ये दवा बेअसर हो रही है। कुछ सालों में नार्थ ईस्ट और फिर पूरे देश में इस दवा के प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर चुके मरीज सामने आने लगेंगे। संजय गांधी पीजीआई के टेलीमेडिसिन सभागार में आयोजित ‘इमरजिंग पैरासिटिक डिजीज’ विषय पर आयोजित दो दिवसीय कार्यशाला में ये जानकारी डॉ. पीके महापात्रा ने दी।
आईसीएमआर के रीजनल मेडिकल रिसर्च सेंटर डिब्रूगढ़ से आए डॉ. पीके महापात्रा ने बताया कि बीते 60 सालों में मलेरिया बीमारी और उसके इलाज के दौरान जो तथ्य सामने आए हैं उससे यही निष्कर्ष निकल रहा है।
240 साल पुरानी हो चुकी है कुनैल
इसलिए आने वाले कुछ सालों में मलेरिया की नई दवा विकसित करना बहुत जरूरी है। डॉ. महापात्रा ने बताया कि मलेरिया की अभी तक मौजूद दवाएं कुनैन व अर्टिसिनेट हर्बल हैं।
इनमें से कुनैल लगभग 240 साल और अर्टिसिनेट 35 साल से बाजार में है। इसलिए कोशिश है कि मलेरिया के लिए अगली दवा भी हर्बल ही हो। इसके लिए आईसीएमआर, सीएसआईआर, देश के कई बड़े चिकित्सा संस्थान और विश्वविद्यालय लगातार अनुसंधान में जुटे हैं।
डॉ. महापात्रा ने बताया कि मलेरिया परजीवी की चार प्रजातियां हैं। वाइवैक्स, प्लाज्मोडियम फेल्सीपेरम, मेलेरी और ओबेल। इसमें से प्लाजमोडियम फेल्सीपेरम सबसे जानलेवा है। इसी के प्रति दवाएं बेअसर हो रही हैं।
मेडिकल साइंस के लिए ये बड़ी चुनौती
‘आर्टिसिनेट’ को बचाना ही चिकित्सा जगत के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। इसीलिए भारत सरकार ने इस दवा को अकेली दवा के रूप में (मोनोथेरेपी) मरीज को देने पर रोक लगा दी और 2008 से इस दवा को कॉम्बिनेशन के साथ देने का आदेश जारी किया था।
उस दौरान सल्फाडिक्सन एंड पाइरीमिथानिन के साथ आर्टिसिनेट कॉम्बिनेशन बनाया गया था। शुरुआत में इस कॉम्बिनेशन का मलेरिया के रोगियों में फायदा मिला लेकिन बाद में ये दवा भी बेअसर होने लगी।
इसके बाद अक्टूबर 2013 ये आर्टिसिनेट के साथ लुमेफेंटरिन का कॉम्बिेनशन दिया जा रहा है। जिससे आर्टिसेनट के प्रति प्र्रतिरोधक क्षमता न विकसित हो।