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लखनऊ: स्त्री के अधिकारों पर चर्चा, वक्ताओं ने कहा- न्याय पाने की लड़ाई में अकेले पड़ जाती हैं महिलाएं

Sat, 19 Jul 2025 11:36 PM IST
रोहित मिश्र अमर उजाला, सिटी रिपोर्टर, लखनऊ
अमर उजाला, सिटी रिपोर्टर, लखनऊ Published by: रोहित मिश्र Updated Sat, 19 Jul 2025 11:36 PM IST
सार

Mera Rang Foundation: मेरा रंग द्वारा आयोजित संगोष्ठी में वक्ताओं ने स्त्री के संवैधानिक अधिकारों की चर्चा की। वक्ताओं ने स्त्रियों के सामने आने वाली समस्याओं का वर्णन किया। 

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Lucknow: Women's rights were discussed in the seminar, speakers said- women get tired of getting justice
कार्यक्रम को संबोधित करतीं प्रोफेसर रुपरेखा वर्मा। - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

मेरा रंग फाउंडेशन द्वारा आयोजित संगोष्ठी 'स्त्रियों के संवैधानिक अधिकार और राज्य की भूमिका'  लखनऊ के कैफ़ी आज़मी सभागार में संपन्न हुई। कार्यक्रम की प्रमुख वक्ता पूर्व कुलपति और जानी-मानी सोशल एक्टिविस्ट प्रो. रूपरेखा वर्मा ने कहा कि “कानून तो बहुत हैं, और सख्त भी हैं, मगर उनका पालन नहीं होता। स्त्री से जुड़े मामलों में इतनी देरी होती है कि वह थक जाती है। मायके जाना नहीं चाहती, ससुराल में पिटती है और अपने लिए न्याय हासिल करने में अकेली पड़ जाती है।” कार्यक्रम का सामाजिक कार्यकर्ता मीना सिंह ने किया। 

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इससे पहले संगोष्ठी में विभिन्न क्षेत्रों से आई वक्ताओं ने स्त्रियों के संवैधानिक अधिकारों और ज़मीनी सच्चाइयों पर अपने विचार रखे। मंजरी उपाध्याय ने कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न (POSH) कानून की आवश्यकता और इसके बनने में हुई देरी पर बात करते हुए कहा कि “यह स्त्री की गरिमा से जुड़ा मौलिक अधिकार है, लेकिन इसके बावजूद इसे लागू करने में दशकों लग गए। आज भी POSH कानून के बारे में जागरूकता की भारी कमी है।”
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लखनऊ विश्वविद्यालय की प्रोफेसर रीता चौधरी ने भारतीय इतिहास के उदाहरण देते हुए कहा कि “आज़ादी से पहले और बाद में भी महिलाओं को बुनियादी कानूनी अधिकार दिलाने के लिए लम्बा संघर्ष करना पड़ा। बाल विवाह जैसी कुप्रथा को खत्म करने के लिए भी उस दौर के पढ़े-लिखे तबके ने संस्कृति के नाम पर विरोध किया।” 
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सामाजिक कार्यकर्ता मधु गर्ग ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा, “आज भी महिलाएँ अपने श्रम का बुनियादी मूल्य नहीं पा रही हैं। घर से लेकर खेत और फैक्ट्री तक उनके काम को न तो बराबरी का दर्जा मिलता है, न ही सम्मानजनक भुगतान।”

पत्रकार नईश हसन ने राज्य और समाज की भूमिका की तीखी आलोचना करते हुए कहा कि “राज्य महिलाओं को संवैधानिक अधिकार देना तो दूर, कई बार दमनकारी भूमिका निभाता है। हम ऐसा समाज बना रहे हैं जहाँ महिलाओं पर उत्पीड़न और बलात्कार करने वालों को भी सम्मानित किया जा रहा है, जबकि पीड़िताओं को न्याय के लिए लड़ते-लड़ते थक जाना पड़ता है।”


संगोष्ठी में वक्ताओं ने इस बात पर सहमति जताई कि महिलाओं को उनके संवैधानिक अधिकार दिलाने के लिए केवल कानून बनाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनके क्रियान्वयन और सामाजिक चेतना को बदलने पर ज़ोर देना होगा। उन्होने कहा कि यह कार्यक्रम महिला अधिकारों, समाज और राज्य की भूमिका को लेकर सार्थक संवाद की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम रहा। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में छात्र-छात्राओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं और जागरूक नागरिकों ने हिस्सा लिया। कार्यक्रम का संचालन मीना सिंह ने किया। 

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