आजाद समेत कई क्रांतिकारियों की पनाहगाह थे लविवि छात्रावास
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लखनऊ विश्वविद्यालय के परिसर और छात्रावासों से क्रांतिकारी गतिविधियों का संचालन हुआ और ये बड़ी घटनाओं के साक्षी भी बने। महान क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद के साथी सुखदेव राज यहां के तिलक छात्रावास (जो उस समय मेस्टन हॉस्टल के नाम से जाना जाता था) में रहकर पढ़ाई करते थे।
चंद्रशेखर आजाद अक्सर उनसे मिलने आया करते थे। श्रीकृष्ण सरल की पुस्तक ‘इंडियन रेवोलुशनरीज’ में इसका वर्णन किया गया है। सुखदेव राज वर्ष 1930 में लखनऊ विवि में बीए के विद्यार्थी थे। विवि के मेस्टन छात्रावास में वे पंजाब के क्रांतिकारी साथी जगदीशचन्द्र राय के साथ रहते थे।
वे चंद्रशेखर आजाद के प्रमुख साथियों में थे। इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में जब मुठभेड़ हुई, जिसमें आजाद शहीद हुए, उनके साथ सुखदेव राज भी थे। इंडियन रेवोलुशनरीज पुस्तक के अनुसार मेस्टन छात्रावास में आजाद उनसे मुलाकात के लिए आया करते थे। इस बात की भनक अंग्रेजी हुकूमत को भी लग गई थी। आजाद और भगत सिंह के शहीद होने के बाद सुखदेव राज अकेले हो गए थे।
संगठन और कोई योजना न होने की वजह से वे बाकी साथियों के साथ छिप गए थे। बाद में पुलिस को उनके लाहौर में उनके होने की भनक लग गई और उन्हें पकड़ लिया गया। जबकि उनके साथी जगदीशचन्द्र राय की गोली मारकर हत्या कर दी गई।
प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने लगाई छात्रावास में चौपाल
कैलाश छात्रावास में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने छात्राओं के साथ चौपाल लगाई थी। इस कार्यक्रम में मौजूद रहीं लविवि के अंग्रेजी विभाग की पूर्व शिक्षक प्रो. मोहिनी मांगलिक बताती हैं कि प्रधानमंत्री बिना किसी तामझाम के इस तरह छात्राओं से बात कर सकती हैं, उन्होंने सोचा ही नहीं था।
यह दिसंबर 1974 की बात है। विवि में छात्रों के साथ उस समय जय प्रकाश नारायण काफी सक्रिय थे। छात्रों के बीच इंदिरा गांधी का काफी विरोध था। इस बीच इंदिरा जी कैलाश छात्रावास पहुंचीं। भाषण देने बजाय करीब डेढ़ घंटे बातचीत की। एक छात्रा ने उनसे सवाल किया कि आखिर छात्रावास में इतनी सख्ती क्यों होती है। इस पर इंदिरा जी ने कहा यहां आकर मुझे तो वे ऐसा बिल्कुल नहीं लगा।
आजादी के बाद बदले छात्रावास के नाम
लविवि में शुरुआती छात्रावासों के नाम अंग्रेजों के नाम पर रखे गए थे। सबसे पहले हीवेट, मेस्टन और बटलर छात्रावास थे। इसके अलावा महमूदाबाद और हबीबुल्लाह छात्रावास भी स्थापित किए गए। आजादी के बाद अंग्रेजों के नाम के बजाय भारतीयों के नाम पर छात्रावासों का नामकरण करने के लिए एक समिति भी बनाई।
इसके बाद हीवेट का नाम सुभाष, मेस्टन का तिलक और बटलर का नाम बदलकर गोल्डेन जुबिली छात्रावास रखा गया।