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Lucknow : समाज कल्याण विभाग के तबादलों में हुई जमकर मनमानी, शासन ने पूछा- जिम्मेदार कौन, क्या किया

Sat, 08 Apr 2023 06:09 AM IST
दुष्यंत शर्मा अजित बिसारिया, लखनऊ
अजित बिसारिया, लखनऊ Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Sat, 08 Apr 2023 06:09 AM IST
सार

अमर उजाला में इस बाबत छपी खबर की शासन ने अपनी रिपोर्ट में पुष्टि की है। साथ ही निदेशालय से पूछा है कि स्थानांतरण नीति एवं इस संबंध में कार्मिक विभाग के शासनादेश के उल्लंघन और अनियमितता के लिए कौन जिम्मेदार है। उनके खिलाफ क्या कार्रवाई प्रस्तावित है।

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Lucknow : There was a lot of arbitrariness in transfers in the Social Welfare Department
यूपी सचिवालय

विस्तार

समाज कल्याण विभाग में पिछले साल बाबुओं के तबादलों में जमकर मनमानी की गई। अमर उजाला में इस बाबत छपी खबर की शासन ने अपनी रिपोर्ट में पुष्टि की है। साथ ही निदेशालय से पूछा है कि स्थानांतरण नीति एवं इस संबंध में कार्मिक विभाग के शासनादेश के उल्लंघन और अनियमितता के लिए कौन जिम्मेदार है। उनके खिलाफ क्या कार्रवाई प्रस्तावित है।

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अमर उजाला ने 2 अगस्त 2022 के अंक में इस समस्या को प्रमुखता से प्रकाशित किया था। मुख्यमंत्री कार्यालय से शासन को जांच के आदेश दिए गए। स्थानांतरण वर्ष 2022-23 के तहत लिपिक संवर्ग के कर्मियों के स्थानांतरण की जांच और परीक्षण में पाया गया कि समाज कल्याण विभाग में 3 वर्ष से अधिक अवधि से कार्यरत लिपिकों की कुल संख्या 253 थी, जिनमें से 52 कार्मिक विभिन्न श्रेणियों के अंतर्गत स्थानांतरण से मुक्त थे। ये श्रेणियां हैं-दिव्यांगता, दाम्पत्य, गंभीर बीमारी, 2 वर्ष के भीतर सेवानिवृत्ति और उर्दू अनुवादक।
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शासन की रिपोर्ट में कहा गया है कि शेष 201 कर्मी स्थानांतरण नीति की परिधि में थे, जिनमें से कुल 43 कर्मियों का स्थानांतरण किया गया। ये 43 कर्मी भिन्न-भिन्न अवधियों से तैनात थे। यहां तक कि स्थानांतरण परिधि में न आने वाले 4 कर्मियों का भी स्थानांतरण किया गया। यहां पर विभाग के स्तर से यह अपेक्षित था कि सर्वाधिक अवधियों यानी 20 वर्ष, 15 वर्ष या 10 वर्ष से तैनात कर्मियों को स्थानांतरण में वरीयता दी जाती, जोकि नहीं किया गया।
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अगर स्थानांतरण का 10 प्रतिशत निर्धारित कोटा समाप्त हो गया था और 3 वर्ष से अधिक अवधि से तैनात कर्मियों का स्थानांतरण निदेशालय स्तर से संभव नहीं था तो प्रस्ताव मंत्री के अनुमोदन के लिए उपलब्ध कराया जाना चाहिए था, जोकि नहीं कराया गया। विशिष्ट आवश्यकता के मद्देनजर स्थानांतरण नीति से विचलन के लिए कोई प्रस्ताव मुख्यमंत्री के अनुमोदन के लिए भी उपलब्ध नहीं कराया गया। इस तरह विभाग ने स्थानांतरण नीति की मूल भावना को ध्यान में नहीं रखा।

इससे स्थानांतरण नीति-2022 और कार्मिक विभाग के संबंधित शासनादेश का उल्लंघन और विचलन स्वतः स्पष्ट है। रिपोर्ट में आगे कहा गया है-दैनिक समाचार पत्र अमर उजाला के लखनऊ संस्करण में छपे समाचार ''20-20 साल से एक ही जिले में जमे हैं समाज कल्याण के बाबू'' की पुष्टि होती है।

क्या संबंधित पत्रावली पर नीति का लिया गया संज्ञान
शासन ने इस संबंध में निदेशक समाज कल्याण को पत्र भेजा है। इसमें पूछा है कि स्थानांतरण नीति 2022-23 और कार्मिक विभाग के शासनादेश से विचलन, उल्लंघन एवं अनियमितता के लिए निदेशालय स्तर से कौन जिम्मेदार है। उनके विरुद्ध क्या-क्या कार्रवाई किया जाना प्रस्तावित है। क्या स्थानांतरण करते समय स्थानांतरण नीति एवं कार्मिक विभाग के शासनादेश का संज्ञान संबंधित पत्रावली पर लिया गया है।


सामने आ चुके हैं बड़े घपले
समाज कल्याण विभाग के सूत्रों का कहना है कि तबादले के इस खेल के पीछे की मुख्य वजह भ्रष्टाचार है। अगर गहनता से जांच हो तो हर साल होने वाले इस भ्रष्टाचार की तह तक पहुंचा जा सकता है। पिछले साल तत्कालीन प्रमुख सचिव ने मामले से संबंधित एक कार्मिक के निलंबन के लिए भी लिखा था, पर इस पर अमल नहीं हुआ। यहां बता दें कि विगत वर्षों में समाज कल्याण विभाग की छात्रवृत्ति, पारिवारिक कल्याण लाभ और शादी अनुदान समेत तमाम योजनाओं में बड़े घपले सामने आ चुके हैं। इन घपलों में 20-20 साल से जमे इन बाबुओं की मिलीभगत भी सामने आती रही है।

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