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लखनऊ: आजादी के संघर्षों का गवाह है 167 साल पुराना इमली का पेड़, क्रांतिकारियों को दी गई थी कच्ची फांसी
Thu, 15 Aug 2024 03:37 PM IST
रोहित मिश्र
मोहम्मद इरफान, अमर उजाला, लखनऊ
मोहम्मद इरफान, अमर उजाला, लखनऊ
Published by: रोहित मिश्र
Updated Thu, 15 Aug 2024 03:37 PM IST
सार
167 year old tamarind tree: लखनऊ की टेली वाली मस्जिद में स्थित इमली का यह पेड़ आजादी के संघर्षों का गवाह हैं। यहां करीब 80 क्रांतिकारियों को कच्ची फांसी दी गई थी।
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इमली का पेड़ आजादी की जंग का गवाह।
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
शहीदों के मजारों पर जुड़ेंगे हर बरस मेले, वतन पे मरने वालों का यही बाकी निशां होगा। टीले वाली मस्जिद में लगा इमली का दरख्त हिन्दुस्तान की पहली जंगे आजादी का गवाह है। हालांकि इस दरख्त के इर्दगिर्द न तो शहीदों की कोई मजार है और न ही यहां पर मेले ही जुड़ते हैं। वतन की आजादी के लिए अपनी हर शाख पर लटके एक-एक शहीद के दर्द और तकलीफ की यादों के निशान इमली का ये दरख्त खामोशी से 167 साल से अपने सीने में महफूज रखे है।
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गंगा-जमुनी तहजीब के मरकज नवाबों का शहर की रेजीडेंसी, दिलकुशा कोठी सहित कई ऐतिहासिक इमारतें वर्ष 1857 में हुई हिन्दुस्तान की पहली जंगे आजादी की गवाही दे रही हैं। शहर की ऐतिहासिक टीले वाली मस्जिद भी स्वतंत्रता संग्राम की गवाह है। मस्जिद परिसर में लगे इमली के दरख्त पर करीब 40 से 80 क्रांतिकारियों को कच्ची फांसी दी गई थी। कच्ची फांसी का अर्थ यह है कि इसमें व्यक्ति को लटका दिया जाता है। धीमे-धीमे वह व्यक्ति कई दिनों के बाद कमजोर होता-होता आखिरकार मर जाता है। अवध में बेगम हजरत महल की अगुवाई में आजादी की पहली जंग लड़ी गई थी। क्रांतिकारियों ने अंग्रेजी हुकूमत की नींव हिलाकर रख दी। आखिर में ब्रिटिश हुकूमत ने मौलवी रसूल बक्श, हाफिज अब्दुल समद, मीर अब्बास, मीर कासिम अली और मम्मू खान सहित जंगे आजादी के कई सिपाहियों को पकड़ लिया था। पकड़े गए तमाम गुमनाम क्रांतिकारियों को इमली के पेड़ से लटका कर शहीद कर दिया गया।
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80 दिन के बाद मस्जिद में घुसी थी अंग्रेजी सेना
अवध में क्रांतिकारियों के हौसले इतने बुलंद थे कि उन्होंने लखनऊ की रेजीडेंसी पर हमला बोल दिया। इस हमले में हेनरी लॉरेंस की गोली लगने से मौत हो गई। टीले वाली मस्जिद के पूर्व सह मुतवल्ली एवं खानकाह आलिया वारसिया हसनिया टीले वाली मस्जिद के सज्जादानशीन सैयद शाह वासिफ हसन वाएजी बताते हैं कि हेनरी लारेंस की मौत की सूचना जब हेनरी हेवलॉक को मिली, तो वह जेम्स आउट्रम के साथ रेजीडेंसी में कैद अंग्रेजों की सहायता के लिए पूरी सेना को लेकर कानपुर के रास्ते लखनऊ पहुंचा। तब तक रेजीडेंसी पर क्रांतिकारियों का कब्जा हो चुका था। सेना ने रेजीडेंसी में घेर लिया लेकिन क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों के घेरे को तोड़ते हुए रेजीडेंसी से निकलकर टीले वाली मस्जिद में पनाह ली। उन्होंने बताया कि उस जमाने में मस्जिद परिसर में मदरसा मदरसतुल आरफीन संचालित होता था। उन्होंने मदरसे में करीब 700 छात्र और शिक्षक थे। क्रान्तिकारियों को पकड़ने के लिए अंग्रेज सेना ने मस्जिद के बाहर करीब 80 दिन तक घेरा डाले रखा। उन्होंने 80 दिन का घेरा डालने के बाद 30 जून 1857 में अंग्रेजी सेना मस्जिद परिसर में घुस गई। उन्होंने बताया कि इस घटना का जिक्र बहरे जक्खार पुस्तक में दिया गया है।
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इमली के पेड़ की हर शाख पर लटके थे क्रांतिकारी
वासिफ ने बताया कि अंग्रेजी सेना के मस्जिद परिसर में घुसने के बाद लड़ाई में करीब 200 से 250 लोग शहीद हुए। जिंदा पकड़े गए 70 से 80 लोगों को मस्जिद परिसर लगे इमली पेड़ पर लटका कच्ची फांसी दी गई। उन्होंने बताया कि उस इमली के दरख्त की कोई शाख ऐसी नही थी जिस पर क्रांतिकारी न लटकाया गया हो। उन्होंने बताया कि कच्ची फांसी में रस्सी गर्दन में नही बांधी जाती बल्कि ऐसे ही लटका कर मरने के लिए छोड़ दिया जाता है।