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लविवि : कला संकाय ने भी कॉमन मिनिमम सिलेबस को नकारा, बैठक में शिक्षकों ने बताया जल्दबाजी में उठाया गया कदम
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लखनऊ। लखनऊ विश्वविद्यालय में कला संकाय की फैकल्टी बोर्ड ने भी कॉमन मिनिमम सिलेबस (सीएमएस) को नकार दिया है। बोर्ड की शुक्रवार को हुई बैठक में सभी सदस्यों ने एक सिरे से इसे राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) की अवधारणा के विपरीत बताते हुए खारिज कर दिया। पूर्व में साइंस फैकल्टी बोर्ड भी सीएमएस को खारिज कर चुका है।
डीन आर्ट्स प्रो. अरविंद अवस्थी की अध्यक्षता में आयोजित बैठक में शिक्षकों ने एक स्वर में कहा कि सीएमएस में पर्याप्त कंटेंट नहीं हैं। इसके स्ट्रक्चर में भी तारतम्यता नहीं है। यह लखनऊ विश्वविद्यालय के लिहाज से परिपूर्ण नहीं है। जबकि विवि में पढ़ाया जा रहा पहले का सिलेबस इससे ज्यादा अपडेट और अपग्रेड है। शिक्षकों ने कहा कि इस तरह 30% सिलेबस थोपना विवि की शैक्षिक गुणवत्ता व स्वायत्ता पर प्रहार है। शिक्षकों ने यह भी कहा कि कॉमन सिलेबस बनाने के लिए विशेषज्ञों के चयन का क्या आधार था। लविवि के एक भी शिक्षक को इसमें शामिल नहीं किया गया। लविवि में कोई सिलेबस 8 क्रेडिट का है तो कहीं 6 क्रेडिट का है। शिक्षकों ने यह भी मुद्दा उठाया कि अभी कुछ दिन पहले ही पीजी का सिलेबस बदला गया है। अभी फिर यूजी बदला जाएगा तो उसके अनुसार फिर पीजी का सिलेबस बदलना होगा। हम ग्लोबल लेवल की पढ़ाई की बात करते हैं और सीएमएस हमें स्टेट लेवल का बना देगा। सीएमएस एनईपी के उद्देश्य को पूरा नहीं करती है। लविवि में अन्य प्रदेशों के स्टूडेंट्स भी आते हैं। अगर उनकी जरूरत पूरी नहीं करते हैं तो फिर कैसे पढ़ा पाएंगे। इसलिए इसे सर्वसम्मति से खारिज किया जाता है। इसे विवि प्रशासन को सूचित कर दिया जाएगा।
विवि-कॉलेज का इंफ्रास्ट्रक्चर एक जैसा नहीं
बैठक में शिक्षकों ने यह भी कहा कि इंफ्रास्ट्रक्चर कॉलेज में यूनिवर्सिटी जैसा नहीं है। इसलिए इसे कॉलेजों में लागू करने में ज्यादा दिक्कत आएगी। विवि से संबद्ध कॉलेज व विद्यार्थियों की संख्या भी अपने यहां काफी है। इतना ही नहीं इसमें क्रेडिट ट्रांसफर में भी दिक्कत आएगी। सिलेबस में जो फर्स्ट में पढ़ा रहे हैं वो थर्ड में आया है। जो थर्ड में पढ़ना है वो फर्स्ट में ला रहे हैं। इसलिए इसे कैसे स्वीकार किया जाए।
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लखनऊ विश्वविद्यालय शिक्षक संघ के अध्यक्ष डॉ. विनीत वर्मा का कहना है कि लूटा मांग करती है कि सरकार कॉमन मिनिमम सिलेबस को वापस ले। यह छात्रों तथा उच्च शिक्षा के हित में नहीं है। कॉमन मिनिमम सिलेबस की अवधारणा राष्ट्रीय शिक्षा नीति के उद्देश्यों के विपरीत है। इसको लागू करने का मतलब है कि हम राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 को नहीं मानते।
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डीन आर्ट्स प्रो. अरविंद अवस्थी की अध्यक्षता में आयोजित बैठक में शिक्षकों ने एक स्वर में कहा कि सीएमएस में पर्याप्त कंटेंट नहीं हैं। इसके स्ट्रक्चर में भी तारतम्यता नहीं है। यह लखनऊ विश्वविद्यालय के लिहाज से परिपूर्ण नहीं है। जबकि विवि में पढ़ाया जा रहा पहले का सिलेबस इससे ज्यादा अपडेट और अपग्रेड है। शिक्षकों ने कहा कि इस तरह 30% सिलेबस थोपना विवि की शैक्षिक गुणवत्ता व स्वायत्ता पर प्रहार है। शिक्षकों ने यह भी कहा कि कॉमन सिलेबस बनाने के लिए विशेषज्ञों के चयन का क्या आधार था। लविवि के एक भी शिक्षक को इसमें शामिल नहीं किया गया। लविवि में कोई सिलेबस 8 क्रेडिट का है तो कहीं 6 क्रेडिट का है। शिक्षकों ने यह भी मुद्दा उठाया कि अभी कुछ दिन पहले ही पीजी का सिलेबस बदला गया है। अभी फिर यूजी बदला जाएगा तो उसके अनुसार फिर पीजी का सिलेबस बदलना होगा। हम ग्लोबल लेवल की पढ़ाई की बात करते हैं और सीएमएस हमें स्टेट लेवल का बना देगा। सीएमएस एनईपी के उद्देश्य को पूरा नहीं करती है। लविवि में अन्य प्रदेशों के स्टूडेंट्स भी आते हैं। अगर उनकी जरूरत पूरी नहीं करते हैं तो फिर कैसे पढ़ा पाएंगे। इसलिए इसे सर्वसम्मति से खारिज किया जाता है। इसे विवि प्रशासन को सूचित कर दिया जाएगा।
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विवि-कॉलेज का इंफ्रास्ट्रक्चर एक जैसा नहीं
बैठक में शिक्षकों ने यह भी कहा कि इंफ्रास्ट्रक्चर कॉलेज में यूनिवर्सिटी जैसा नहीं है। इसलिए इसे कॉलेजों में लागू करने में ज्यादा दिक्कत आएगी। विवि से संबद्ध कॉलेज व विद्यार्थियों की संख्या भी अपने यहां काफी है। इतना ही नहीं इसमें क्रेडिट ट्रांसफर में भी दिक्कत आएगी। सिलेबस में जो फर्स्ट में पढ़ा रहे हैं वो थर्ड में आया है। जो थर्ड में पढ़ना है वो फर्स्ट में ला रहे हैं। इसलिए इसे कैसे स्वीकार किया जाए।
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लखनऊ विश्वविद्यालय शिक्षक संघ के अध्यक्ष डॉ. विनीत वर्मा का कहना है कि लूटा मांग करती है कि सरकार कॉमन मिनिमम सिलेबस को वापस ले। यह छात्रों तथा उच्च शिक्षा के हित में नहीं है। कॉमन मिनिमम सिलेबस की अवधारणा राष्ट्रीय शिक्षा नीति के उद्देश्यों के विपरीत है। इसको लागू करने का मतलब है कि हम राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 को नहीं मानते।