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सुल्तानपुर : दूसरी बार एक ही चेहरे को चुनने से कतराते हैं सुल्तानपुर के मतदाता, बाबू केदारनाथ का रिकॉर्ड अटूट
Sun, 14 Apr 2024 04:51 PM IST
ishwar ashish
श्रीनारायण मिश्र , अमर उजाला, सुल्तानपुर
श्रीनारायण मिश्र , अमर उजाला, सुल्तानपुर
Published by: ishwar ashish
Updated Sun, 14 Apr 2024 04:51 PM IST
सार
सुल्तानपुर सीट पर बाबू केदारनाथ सर्वाधिक समय तक सांसद रहे हैं। वहीं, डीबी राय दो बार में महज तीन साल ही सांसद रह चुके हैं। यहां के मतदाताओं ने दो सांसदों को ही दो बार जिताया है।
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प्रतीकात्मक तस्वीर
- फोटो : प्रतीकात्मक
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विस्तार
कांग्रेस से लेकर भाजपा तक के लिए प्रयोगशाला रही सुल्तानपुर संसदीय सीट के मतदाताओं का मिजाज अनूठा है। वे घरेलू प्रत्याशियों के मुकाबले बाहरियों को चुनने से गुरेज नहीं करते। यह बात तो जगजाहिर है, लेकिन एक ही चेहरे को दोबारा चुनने में भी ज्यादा रुचि नहीं दिखाते। संसदीय सीट पर हुए 20 चुनावों में अब तक उन्होंने दो बार ही सिटिंग सांसद को चुनने में रुचि दिखाई है। यही वजह है कि अब तक इस सीट पर लगातार सर्वाधिक समय सांसद रहने का रिकॉर्ड बाबू केदारनाथ सिंह के ही नाम है।
इस सीट के मतदाताओं का मूड देखते हुए राष्ट्रीय दलों ने भी यहां खूब प्रयोग किए। कांग्रेस ने बाहरी प्रत्याशियों को उतारने की परंपरा शुरू की तो भाजपा आज तक उसका पालन कर रही है। यही नहीं, भाजपा और कांग्रेस लगातार अपने प्रत्याशी बदलते भी रहे हैं। कांग्रेस के बाबू केदारनाथ सिंह और भाजपा के डीबी राय को छोड़ दिया जाए तो जिसे भी किसी राजनीतिक दल ने दोबारा टिकट दिया उसे जनता ने नकार दिया। सबसे पहले यहां से निरंतर दो बार चुनाव जीतने का काम बाबू केदारनाथ सिंह ने ही शुरू किया।
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एक ही वर्ष में दो-दो उपचुनाव
1967 के आम चुनाव में सुल्तानपुर से कांग्रेस के टिकट पर गनपत सहाय सांसद चुने गए थे। कार्यकाल के दौरान ही उनका निधन हो गया तो 1969 में उपचुनाव हुआ और इसमें भारतीय क्रांति दल से श्रीपति मिश्र सांसद चुने गए। यही वह संसदीय कार्यकाल था जब लगातार दो बार उपचुनाव हुए। हुआ यूं कि प्रदेश में कांग्रेस और भारतीय क्रांति दल की सरकार बन गई। श्रीपति मिश्र प्रदेश में कैबिनेट मंत्री बना दिए गए। ऐसे में उन्होंने लोकसभा से इस्तीफा दिया और 1970 में दूसरा उपचुनाव हुआ। इस चुनाव में कांग्रेस के बाबू केदार नाथ सिंह ने जीत हासिल की और उन्हें ही पार्टी ने 1971 के आम चुनावों में टिकट दिया। इस चुनाव में भी वे जीते और 1977 तक सांसद रहे।
दो बार जीतकर भी तीन ही साल सांसद रहे डीबी राय
रामलहर से उफान पर आने वाली भाजपा ने 1996 में सिटिंग सांसद विश्वनाथ शास्त्री का टिकट काटकर अयोध्या में एसएसपी रह चुके डीबी राय को चुनाव लड़ाया। वे आसानी से चुनाव जीते। 1998 में फिर आम चुनाव हुए और वे फिर जीते, लेकिन सरकार कार्यकाल पूरा नहीं कर पाई और 1999 में दोबारा चुनाव हुए। इसमें भाजपा ने डीबी राय का टिकट काटकर सत्यदेव सिंह को दिया, जो दुर्भाग्यवश समय से नामांकन ही नहीं कर पाए। इस चुनाव में भाजपा बिना लड़े ही बाहर हो गई थी। इस तरह दो बार जीतकर भी डीबी राय का कार्यकाल महज तीन साल का रहा।
यह चेहरे दोबारा टिकट पाकर हारे
-1984 में कांग्रेस की लहर पर सुल्तानपुर से कांग्रेस के सांसद चुने गए राजकरण सिंह को पार्टी ने 1989 में भी टिकट दिया। किंतु वे जनता दल के रामसिंह से चुनाव हार गए। पार्टी ने उन्हें 1991 में टिकट दिया तो वे महज 43614 वोट पाकर पांचवें स्थान पर फिसल गए।
- जनता दल की लहर में 1989 में जनता दल से चुने गए रामसिंह को जब पार्टी ने 1991 में उतारा वे तो भाजपा के विश्वनाथ शास्त्री से हार गए।
- 2004 में बसपा से ताहिर खान चुनाव जीते। किंतु जब 2009 में वे दोबारा बसपा से चुनाव मैदान में उतरे तो कांग्रेस के संजय सिंह के हाथों सीट गंवा बैठे।
- 2009 में कांग्रेस से जीते डॉ. संजय सिंह की पत्नी अमीता सिंह को कांग्रेस ने 2014 में टिकट दिया तो वे 41,983 वोट पाकर चौथे स्थान पर चली गईं। 2019 में संजय सिंह खुद कांग्रेस से उतरे तो महज 46681 वोटर पाकर तीसरे स्थान पर रहे।
1952 -- एम ए काजमी -- कांग्रेस
1957 -- गोविंद मालवीय -- कांग्रेस
1961 -- (उपचुनाव) गनपत सहाय -- निर्दलीय
1962 -- कुंवर कृष्ण वर्मा -- कांग्रेस
1967 -- गनपत सहाय -- कांग्रेस
1969 -- (उपचुनाव) श्रीपति मिश्र -- भारतीय क्रांति दल
1970 -- (उपचुनाव) केदार नाथ सिंह -- कांग्रेस
1971 -- केदार नाथ सिंह -- कांग्रेस
1977 -- जुल्फिकार उल्ला -- जनता पार्टी
1980 -- गिरिराज सिंह -- कांग्रेस
1984 -- राज करन सिंह -- कांग्रेस
1989 -- राम सिंह -- जनता दल
1991 -- विश्वनाथ दास शास्त्री -- भाजपा
1996 -- देवेंद्र बहादुर राय -- भाजपा
1998 -- देवेंद्र बहादुर राय -- भाजपा
1999 -- जयभद्र सिंह -- बसपा
2004 -- मोहम्मद ताहिर -- बसपा
2009 -- डॉ. संजय सिंह -- कांग्रेस
2014 -- वरुण गांधी -- भाजपा
2019 -- मेनका गांधी -- भाजपा
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इस सीट के मतदाताओं का मूड देखते हुए राष्ट्रीय दलों ने भी यहां खूब प्रयोग किए। कांग्रेस ने बाहरी प्रत्याशियों को उतारने की परंपरा शुरू की तो भाजपा आज तक उसका पालन कर रही है। यही नहीं, भाजपा और कांग्रेस लगातार अपने प्रत्याशी बदलते भी रहे हैं। कांग्रेस के बाबू केदारनाथ सिंह और भाजपा के डीबी राय को छोड़ दिया जाए तो जिसे भी किसी राजनीतिक दल ने दोबारा टिकट दिया उसे जनता ने नकार दिया। सबसे पहले यहां से निरंतर दो बार चुनाव जीतने का काम बाबू केदारनाथ सिंह ने ही शुरू किया।
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एक ही वर्ष में दो-दो उपचुनाव
1967 के आम चुनाव में सुल्तानपुर से कांग्रेस के टिकट पर गनपत सहाय सांसद चुने गए थे। कार्यकाल के दौरान ही उनका निधन हो गया तो 1969 में उपचुनाव हुआ और इसमें भारतीय क्रांति दल से श्रीपति मिश्र सांसद चुने गए। यही वह संसदीय कार्यकाल था जब लगातार दो बार उपचुनाव हुए। हुआ यूं कि प्रदेश में कांग्रेस और भारतीय क्रांति दल की सरकार बन गई। श्रीपति मिश्र प्रदेश में कैबिनेट मंत्री बना दिए गए। ऐसे में उन्होंने लोकसभा से इस्तीफा दिया और 1970 में दूसरा उपचुनाव हुआ। इस चुनाव में कांग्रेस के बाबू केदार नाथ सिंह ने जीत हासिल की और उन्हें ही पार्टी ने 1971 के आम चुनावों में टिकट दिया। इस चुनाव में भी वे जीते और 1977 तक सांसद रहे।
दो बार जीतकर भी तीन ही साल सांसद रहे डीबी राय
रामलहर से उफान पर आने वाली भाजपा ने 1996 में सिटिंग सांसद विश्वनाथ शास्त्री का टिकट काटकर अयोध्या में एसएसपी रह चुके डीबी राय को चुनाव लड़ाया। वे आसानी से चुनाव जीते। 1998 में फिर आम चुनाव हुए और वे फिर जीते, लेकिन सरकार कार्यकाल पूरा नहीं कर पाई और 1999 में दोबारा चुनाव हुए। इसमें भाजपा ने डीबी राय का टिकट काटकर सत्यदेव सिंह को दिया, जो दुर्भाग्यवश समय से नामांकन ही नहीं कर पाए। इस चुनाव में भाजपा बिना लड़े ही बाहर हो गई थी। इस तरह दो बार जीतकर भी डीबी राय का कार्यकाल महज तीन साल का रहा।
यह चेहरे दोबारा टिकट पाकर हारे
-1984 में कांग्रेस की लहर पर सुल्तानपुर से कांग्रेस के सांसद चुने गए राजकरण सिंह को पार्टी ने 1989 में भी टिकट दिया। किंतु वे जनता दल के रामसिंह से चुनाव हार गए। पार्टी ने उन्हें 1991 में टिकट दिया तो वे महज 43614 वोट पाकर पांचवें स्थान पर फिसल गए।
- जनता दल की लहर में 1989 में जनता दल से चुने गए रामसिंह को जब पार्टी ने 1991 में उतारा वे तो भाजपा के विश्वनाथ शास्त्री से हार गए।
- 2004 में बसपा से ताहिर खान चुनाव जीते। किंतु जब 2009 में वे दोबारा बसपा से चुनाव मैदान में उतरे तो कांग्रेस के संजय सिंह के हाथों सीट गंवा बैठे।
- 2009 में कांग्रेस से जीते डॉ. संजय सिंह की पत्नी अमीता सिंह को कांग्रेस ने 2014 में टिकट दिया तो वे 41,983 वोट पाकर चौथे स्थान पर चली गईं। 2019 में संजय सिंह खुद कांग्रेस से उतरे तो महज 46681 वोटर पाकर तीसरे स्थान पर रहे।
1952 -- एम ए काजमी -- कांग्रेस
1957 -- गोविंद मालवीय -- कांग्रेस
1961 -- (उपचुनाव) गनपत सहाय -- निर्दलीय
1962 -- कुंवर कृष्ण वर्मा -- कांग्रेस
1967 -- गनपत सहाय -- कांग्रेस
1969 -- (उपचुनाव) श्रीपति मिश्र -- भारतीय क्रांति दल
1970 -- (उपचुनाव) केदार नाथ सिंह -- कांग्रेस
1971 -- केदार नाथ सिंह -- कांग्रेस
1977 -- जुल्फिकार उल्ला -- जनता पार्टी
1980 -- गिरिराज सिंह -- कांग्रेस
1984 -- राज करन सिंह -- कांग्रेस
1989 -- राम सिंह -- जनता दल
1991 -- विश्वनाथ दास शास्त्री -- भाजपा
1996 -- देवेंद्र बहादुर राय -- भाजपा
1998 -- देवेंद्र बहादुर राय -- भाजपा
1999 -- जयभद्र सिंह -- बसपा
2004 -- मोहम्मद ताहिर -- बसपा
2009 -- डॉ. संजय सिंह -- कांग्रेस
2014 -- वरुण गांधी -- भाजपा
2019 -- मेनका गांधी -- भाजपा