जानें, अयोध्या मामले पर लड़ते-लड़ते कैसे 'अमनदूत' बन गए हाशिम अंसारी
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पिछले साल 5 दिसंबर की ही बात है। ढांचा विध्वंस के 23 साल पूरे होने की पूर्व संध्या पर हाशिम अंसारी ने कहा था- ‘चाहत है कि मौत से पहले बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि मुद्दे का फैसला हो जाए।’
उनकी इच्छा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलने की भी थी। पर, देश को हिला देने और दुनिया के कई देशों तक चर्चा में आ जाने वाले श्रीराम जन्मभूमि मंदिर बनाम बाबरी मस्जिद विवाद के प्रमुख किरदार हाशिम अंसारी ‘चचा’ दोनों चाहत लिए ही दुनिया से चले गए।
न मंदिर-मस्जिद विवाद का हल देख पाए और न मोदी से उनकी मुलाकात हो पाई। हाशिम के साथ एक और ऐसा किरदार दुनिया से और चला गया जो शुरू से ही इस विवाद का न सिर्फ पैरोकार था बल्कि विवाद की शुआती कालखंड का चश्मदीद भी था।
हाशिम के समकालीन लोगों में अब सिर्फ निर्मोही अखाड़ा के महंत भास्कर दास ही जीवित बचे हैं। वैसे अस्वस्थ वे भी बहुत हैं। भविष्य में जब-जब मंदिर-मस्जिद या अयोध्या मुद्दे की चर्चा होगी, तो किसी न किसी रूप में वे चर्चा में आए बिना नहीं रहेंगे।
महंत रामचंद्र परमहंस के मुख्य विरोधी थे, पर होली-दिवाली साथ ही बीतती
वर्ष 1921 में बेहद गरीब परिवार में अयोध्या में पैदा हुए चचा, जिंदगी भर भले ही यह साबित करने में जुटे रहे हों कि विवादित स्थल पर पहले से मस्जिद ही थी। जिसमें जबरन मूर्तियां रखकर मंदिर का रूप दिया गया। पर, ‘चचा’ को कभी किसी हिंदू ने दुश्मन नहीं समझा।
अपने शुरुआती दिनों में कपड़ों की सिलाई करने वाले चचा रिश्तों की मजबूत सिलाई करने के भी हुनरमंद थे। तभी तो तमाम तनावों के बावजूद उन्हें अयोध्या के हिंदुओं ने कभी अपने से अलग करके नहीं देखा। ईद पर अयोध्या के तमाम संत-महात्मा हाशिम के घर मिलने जाते थे तो हाशिम के लिए भी होली-दिवाली घर के त्योहार थे।
लोग बताते हैं कि मंदिर-मस्जिद मामले में दिगंबर अखाड़े के महंत रामचंद्र परमहंस हाशिम के मुख्य विरोधी थे, लेकिन होली व दिवाली दोनों की साथ-साथ ही बीतती थी। होली पर तो हाशिम सुबह से दिगंबर अखाड़े पर ही मिलते थे।
हाशिम ने एक बार खुद बताया था कि उन्हें ‘चचा’ उपनाम भी उनके दोस्त हिंदू परिवारों के बच्चों ने ही दिया था। जो बाद में उनकी पहचान बन गया। अयोध्या के ज्यादातर हिंदू परिवारों के यहां चचा का खूब आना-जाना था। शादी-ब्याह हो या कोई गम का मौका।
दोस्त चला गया...अब लड़ने में मजा नहीं आएगा
महंत रामचंद्र परमहंस से उनकी दोस्ती का आलम यह था कि जब तक परमहंस जीवित रहे तब तक मुकदमे की पैरोकारी के लिए भी हाशिम व परमहंस साथ-साथ एक ही एक तांगे से कचहरी जाते थे। लखनऊ भी एक ही गाड़ी से आते-जाते थे।
पुराने लोग तो यहां तक बताते हैं कि जब इन दो दोस्तों की शतरंज की बाजी जमती थी तो खेल देखने वाला होता था। अयोध्या में तो परमहंस व हाशिम ऐसी जोड़ी के रूप में चर्चित थे कि दिन में जब तक दो-तीन घंटे साथ बैठ नहीं लेते थे, शतरंज या ताश खेल नहीं लेते थे, तब तक दोनों लोगों को चैन नहीं मिलता था।
शायद यही वजह थी कि परमहंस की मौत पर सबसे ज्यादा बिलखने वाले चंद लोगों में चचा भी थे। उन्होंने कहा भी था, ‘दोस्त ....चला गया। अब लड़ने में मजा नहीं आएगा।’ हाशिम ने कहा था, उनकी परमहंस से दोस्ती पहले से थी मुकदमा बाद में शुरू हुआ।
कहा था- अब रामलला को तिरपाल में नहीं देख सकता
हाशिम 1949 में इस मामले में मुद्दई बने थे। तब से वे लगातार बाबरी मस्जिद की तरफ से पक्षकार रहे। चचा की स्कूली शिक्षा तो सिर्फ दर्जा दो थी। पर, दिमागी तालीम ऐसी कि सवाल कितने भी कर लो, लेकिन जवाब उतना ही मिलता जितना ‘चचा’ चाहते थे।
कई ऐसे मौके आए जब ‘चचा’ के बयान चर्चा बने और मुस्लिम पक्ष में बेचैनी बढ़ाने वाले भी। मरते दम तक बाबरी मस्जिद के लिए पैरवी करने का दावा करने वाले चचा ने 6 दिसंबर 2014 से पहले यह बोलकर, ‘अब रामलला को तिरपाल में नहीं देख सकता। इसलिए अब इस मामले की पैरवी नहीं करूंगा।
राम के नाम और बाबरी मस्जिद के मुद्दे पर राजनीति करने वाले नेता और मंत्री बन गए। पर, मंदिर व मस्जिद का कुछ नहीं हुआ।’ अपने इस बयान से उन्होंने सियासी चाय की प्याली में तूफान ला दिया था। मो. आजम खां से लेकर तमाम मुस्लिम नेता यह साबित करने और बताने में लग गए थे कि हाशिम ही इस मामले में अंतिम पैरोकार नहीं हैं।
कुछ की तरफ से चचा को हाशिए पर डालने की कोशिश शुरू हो गई थी तो समाजवादी पार्टी के कई नेता हाशिम की चौखट पर पहुंचकर उन्हें मनाने लग गए थे। मुलायम सिंह यादव व अखिलेश यादव तक के फोन हाशिम के पास पहुंच गए। हाशिम तो ठहरे हाशिम, कहा, ‘आजम सियासत करें। अयोध्या का मामला हम अयोध्या वाले ही सुलझा लेंगे।
रामलला के बिना अयोध्या का क्या मतलब
हाशिम की साफगोई ही थी जो वे लगातार यह कहते थे कि बाबरी मस्जिद की तरफ से लड़ने का मतलब यह नहीं है कि उन्हें रामलला से बैर है। कहा करते थे, ‘रामलला के बगैर तो अयोध्या का कोई मतलब ही नहीं है। रामलला तो हम लोगों के घर के हैं। हमारे परिवार के हैं। वे हिंदू-मुसलमानों के नहीं बल्कि अयोध्या के हैं।
मुकदमा तो सिर्फ इस बात का है कि संबंधित स्थल मंदिर था या मस्जिद।’ हमेशा बच्चों जैसे उत्साह से लबरेज दिखने वाले चचा पिछले साल 5 दिसंबर को जरूर कुछ व्यथित दिखे थे। कहा था, ‘ पहले अमन चाहिए। मस्जिद की बात तो बाद में है। ले जाए जिसे मस्जिद चाहिए। हमें तो अयोध्या का अमन चाहिए।
सोचता था कि दुनिया से जाऊंगा तो अपने दोस्त परमहंस के लिए यह पैगाम लेकर कि विवाद को हल कराकर आया हूं। पर, अब उम्र जिस तरह शरीर को तोड़ रही है, ऊपर से अब इस मामले में जिस तरह राजनीति और लोगों के स्वार्थ जुड़ गए हैं, उससे कभी-कभी लगता है कि शायद ही मैं कोई पैगाम ले जा सकूं।’
घर तो जला पर रिश्ते नहीं
ढांचा ढहने के बाद हुए उपद्रव में कुछ लोगों ने उनके छोटे से घर में भी आग लगा दी। कुछ लोगों ने उनसे अयोध्या छोड़ने की बात कही तो बोले, ‘घर जलने से रिश्ते नहीं जला करते।’ वही हुआ, अयोध्या के हिंदुओं ने ही आगे आकर चचा का घर बनवाया।
हाशिम ने ही एक बार बताया था, ‘घर जलने की सूचना मिलते ही परमहंस भी उन लोगों को गरियाया था, जिन्होंने यह हरकत की। यही नहीं, परमहंस ने घर बनवाने में काफी मदद की।’ हाशिम यह बताना नहीं भूलते थे कि एक बार बाहर से आए कुछ मुस्लिम नेताओं ने उनसे अयोध्या से अलग चलकर बसने की बात कही थी।
उन्होंने एक बार ‘अमर उजाला’ को भी बताया था कि कुछ लोगों ने आकर हमसे कहा, ‘यहां आपकी जिंदगी को खतरा हो सकता है। तब मैंने उन्हें जवाब दिया, ‘ मियां! अपनी चिंता करो मैं तो अपनी अयोध्या में पूरी तरह सुरक्षित हूं।
बड़ा हुआ हूं यही के खाक में तो मौत के बाद भी मिलूंगा यहीं की खाक में।’ एक बार उन्हें एक पार्टी के नेता ने कुछ बोलने के लिए पेट्रोल पंप तक का प्रस्ताव दिया था। हाशिम ने उससे चाय की प्याली छीनकर उसे घर से भगा दिया था।
विरोधियों की भी तारीफ से नहीं चूकते थे चचा
वे भले ही बाबरी मस्जिद के पैरोकार थे। पर, विरोधियों की प्रशंसा करने में भी संकोच नहीं करते थे। अशोक सिंहल की मौत के बाद हाशिम ने कहा कि तोगड़िया कभी सिंहल नहीं बन पाएंगे।
सिंहल थे तो विरोधी, लेकिन उस जैसा जानकार आदमी तलाश कर पाना विश्व हिंदू परिषद के लिए काफी मुश्किल है। इसी 6 दिसंबर को मौके पर जब मोदी की बात चली तो हाशिम ने यह टिप्पणी करने में देरी नहीं लगाई कि मोदी अच्छा काम कर रहे हैं। वे सबको साथ लेकर चलना चाहते हैं।
उनके इस बयान पर भी कुछ लोगों ने नाक-भौं सिकोड़ा। पर, हाशिम तो हाशिम ही ठहरे। बोले, ‘मोदी हमें अच्छे आदमी लगते हैं, इसलिए अच्छा ही बोलूंगा। जिसे नाराज होना है, हो जाए।’
पिछले साल की ही बात है, उन्होंने यह कहकर फिर हलचल मचाई कि वे अमन चाहते हैं, मस्जिद तो बाद की बात है। कुछ वर्ष पहले उन्होंने यह भी कहा था, ‘मुकदमा जीत भी जाऊं तो तब तक मस्जिद नहीं बनवाऊंगा जब तक हिंदू भाई उससे सहमत नहीं हो जाते।’
आपातकाल में जेल भी गए थे
हाशिम मंदिर-मस्जिद विवाद में तो शांति भंग की आशंका में जेल गए ही, पर यह कम लोगों को ही मालूम होगा कि वे आपातकाल के दौरान भी जेल में रहे। एक बार हाशिम ने खुद कहा था कि वे शुरू से ही कांग्रेस के विरोधी रहे। इसलिए आपातकाल का भी विरोध किया। इसी में उनकी गिरफ्तारी हुई। कई महीने जेल में रहे।
उनकी इच्छा थी कि उनकी जिंदगी में ही यह मामला सुलट जाए। जिससे अयोध्या की भावी पीढ़ियां हिंदू-मुसलमान बनकर नहीं, सिर्फ अयोध्या वाली बनकर रह सकें। पर, चचा भले चले गए हैं लेकिन हर साल छह दिसंबर के आसपास वे जरूर याद आएंगे।
यह बात अलग है कि अब शायद ही कभी 6 दिसंबर के आसपास विवादित स्थल के पास बने उनके उस छोटे घर के सामने मीडिया व चैनल वालों की भीड़ दिखे, जिस पर एक छोटा सा बोर्ड लगा है, ‘बाबरी मस्जिद पुनर्निर्माण समिति।’
इस घर का बाहरी कमरा और उसमें पडे़ दो तख्त कई बार हाशिम की बातों को अखबार और मीडिया की सुर्खियां बनाने वाले शब्दों के साक्षी बने थे।