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Lucknow News: लाइसेंस निरस्त, फिर भी चल रहे अवैध अस्पताल
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लखनऊ। राजधानी में अस्पताल अब इलाज नहीं, मौत का सौदा कर रहे हैं। तीन अस्पतालों के लाइसेंस रद्द हो चुके हैं, लेकिन अफसरों की शह पर वे अब भी धड़ल्ले से मरीज भर्ती कर रहे हैं। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि जब अस्पताल बेनकाब हो चुके हैं, इनके लाइसेंस निरस्त हो चुके हैं तो फिर बंद न कराने के पीछे कैसी मजबूरी है। जवाब साफ है- विभागीय अफसर और अस्पताल माफिया की सांठगांठ। यही वजह है कि मौत और लूट का यह खेल रुकने का नाम नहीं ले रहा।
जनता हॉस्पिटल : बिना पंजीकरण ऑपरेशन थिएटर
गुडंबा का जनता हॉस्पिटल तो कानून और इंसानियत दोनों की धज्जियां उड़ाता रहा। बीते महीने सिजेरियन के दौरान यहां गर्भवती की मौत हो गई थी। जांच में सामने आया कि अस्पताल का पंजीकरण ही नहीं है। केवल ऑनलाइन आवेदन डालकर अस्पताल चलाया जा रहा था। अपर निदेशक ने सीएमओ को संचालन रोकने का आदेश दिया था, पर इस आदेश को कागजों में दबा दिया गया। ऐसे में अस्पताल आज भी चालू है। यह सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि खुलेआम अपराध है।
विनोद हॉस्पिटल : डीएम के आदेश की भी हंसी उड़ाई
विनोद हॉस्पिटल, गोमतीनगर का लाइसेंस 18 जुलाई को रद्द हुआ। यहां जांच में नीरज मिश्रा नाम के मरीज के इलाज में लापरवाही साबित हुई थी। आदेश हुआ कि अस्पताल बंद किया जाए, मगर पांच दिन बाद ही अस्पताल फिर से खुल गया। इस पर नीरज ने डीएम से गुहार लगाई। डीएम ने एक सितंबर को सीएमओ को व्हाट्सएप पर पत्र भेजकर अस्पताल बंद करने के आदेश दिए, लेकिन विभाग ने आदेश को ठेंगा दिखा दिया। जब डीएम का आदेश ही कचरे की टोकरी में फेंक दिया जाए, तो फिर मरीज किस पर भरोसा करें।
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पीड़ित मरीज नीरज मिश्रा ने बताया डीएम-सीएमओ के आदेश बाद भी अस्पताल का संचालन होता रहा। काफी दबाव आने बाद अस्पताल में भर्ती बंद कर दी गई है, मगर ओपीडी का संचालन हो रहा है।
ओम सांई हॉस्पिटल : पहला लाइसेंस निरस्त, दूसरे का आवेदन
माल स्थित ओम सांई हॉस्पिटल तो गुंडागर्दी की मिसाल है। यहां महिला का अवैध गर्भपात कराकर मोटी रकम वसूली गई। आरोप साबित हुए, लाइसेंस रद्द हुआ। टीम अस्पताल सील करने गई तो संचालक के गुर्गों ने घेर लिया। इससे अफसर बैकफुट पर आकर लौट आए। तब से चार महीने से यह अस्पताल बिना लाइसेंस मरीज भर्ती कर रहा है। अब नए लाइसेंस के लिए आवेदन डाल दिया है और आरोप है कि अफसर जुगाड़ में लगे हैं। यह है सिस्टम की असलियत।
अफसरों का बहाना- हमारे पास अधिकार नहीं
स्वास्थ्य विभाग का तर्क है कि हम लाइसेंस रद्द कर सकते हैं, लेकिन भवन बंद कराना मजिस्ट्रेट का काम है। यही बहाना बनाकर अस्पतालों को खुला छोड़ दिया जाता है और अस्पताल मरीजों की भर्ती जारी रखते हैं। सवाल है कि मरीजों की जान का सौदा रोकने के लिए और कितने आदेशों की जरूरत है?
जिले में एक हजार से अधिक निजी अस्पताल
राजधानी में एक हजार से अधिक निजी अस्पतालों का संचालन हो रहा है। इस साल पांच से छह अस्पतालों का लाइसेंस निरस्त हुआ था। जिसमें तीन-चार अस्पताल अब भी अवैध तरीके से संचालित हो रहे हैं।
50 हजार रुपये जुर्माने का प्रावधान
क्लीनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट के तहत 50 हजार रुपये जुर्माने का प्रावधान है। इसमें बिना पंजीकरण अस्पताल व क्लीनिक का संचालन मिलने पर जुर्माना लगाया जाता है। स्वास्थ्य विभाग के अफसरों का दावा है कि पांच से छह अस्पतालों पर जुर्माना लगाया गया है।
दो अस्पतालों के खिलाफ दर्ज हुआ था मुकदमा
राजधानी के दो अस्पतालों पर इस साल मुकदमा भी दर्ज हुआ है। इसमें एक एमजे हॉस्पिटल और दूसरा केडी हाॅस्पिटल है। घटना के बाद से केडी हॉस्पिटल संचालक गायब है। वहीं, एमजे हॉस्पिटल के खिलाफ मुकदमा दर्ज होने बाद भी पुलिस की ओर से आगे कोई कार्रवाई नहीं की गई।
Iजिन अस्पतालों का लाइसेंस निरस्त है, अगर वहां मरीज भर्ती मिलते हैं तो कार्रवाई की जाएगी। मजिस्ट्रेट की मौजूदगी में अस्पताल को बंद कराया जाएगा।I
I- डॉ. एनबी सिंह, सीएमओI
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जनता हॉस्पिटल : बिना पंजीकरण ऑपरेशन थिएटर
गुडंबा का जनता हॉस्पिटल तो कानून और इंसानियत दोनों की धज्जियां उड़ाता रहा। बीते महीने सिजेरियन के दौरान यहां गर्भवती की मौत हो गई थी। जांच में सामने आया कि अस्पताल का पंजीकरण ही नहीं है। केवल ऑनलाइन आवेदन डालकर अस्पताल चलाया जा रहा था। अपर निदेशक ने सीएमओ को संचालन रोकने का आदेश दिया था, पर इस आदेश को कागजों में दबा दिया गया। ऐसे में अस्पताल आज भी चालू है। यह सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि खुलेआम अपराध है।
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विनोद हॉस्पिटल : डीएम के आदेश की भी हंसी उड़ाई
विनोद हॉस्पिटल, गोमतीनगर का लाइसेंस 18 जुलाई को रद्द हुआ। यहां जांच में नीरज मिश्रा नाम के मरीज के इलाज में लापरवाही साबित हुई थी। आदेश हुआ कि अस्पताल बंद किया जाए, मगर पांच दिन बाद ही अस्पताल फिर से खुल गया। इस पर नीरज ने डीएम से गुहार लगाई। डीएम ने एक सितंबर को सीएमओ को व्हाट्सएप पर पत्र भेजकर अस्पताल बंद करने के आदेश दिए, लेकिन विभाग ने आदेश को ठेंगा दिखा दिया। जब डीएम का आदेश ही कचरे की टोकरी में फेंक दिया जाए, तो फिर मरीज किस पर भरोसा करें।
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पीड़ित मरीज नीरज मिश्रा ने बताया डीएम-सीएमओ के आदेश बाद भी अस्पताल का संचालन होता रहा। काफी दबाव आने बाद अस्पताल में भर्ती बंद कर दी गई है, मगर ओपीडी का संचालन हो रहा है।
ओम सांई हॉस्पिटल : पहला लाइसेंस निरस्त, दूसरे का आवेदन
माल स्थित ओम सांई हॉस्पिटल तो गुंडागर्दी की मिसाल है। यहां महिला का अवैध गर्भपात कराकर मोटी रकम वसूली गई। आरोप साबित हुए, लाइसेंस रद्द हुआ। टीम अस्पताल सील करने गई तो संचालक के गुर्गों ने घेर लिया। इससे अफसर बैकफुट पर आकर लौट आए। तब से चार महीने से यह अस्पताल बिना लाइसेंस मरीज भर्ती कर रहा है। अब नए लाइसेंस के लिए आवेदन डाल दिया है और आरोप है कि अफसर जुगाड़ में लगे हैं। यह है सिस्टम की असलियत।
अफसरों का बहाना- हमारे पास अधिकार नहीं
स्वास्थ्य विभाग का तर्क है कि हम लाइसेंस रद्द कर सकते हैं, लेकिन भवन बंद कराना मजिस्ट्रेट का काम है। यही बहाना बनाकर अस्पतालों को खुला छोड़ दिया जाता है और अस्पताल मरीजों की भर्ती जारी रखते हैं। सवाल है कि मरीजों की जान का सौदा रोकने के लिए और कितने आदेशों की जरूरत है?
जिले में एक हजार से अधिक निजी अस्पताल
राजधानी में एक हजार से अधिक निजी अस्पतालों का संचालन हो रहा है। इस साल पांच से छह अस्पतालों का लाइसेंस निरस्त हुआ था। जिसमें तीन-चार अस्पताल अब भी अवैध तरीके से संचालित हो रहे हैं।
50 हजार रुपये जुर्माने का प्रावधान
क्लीनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट के तहत 50 हजार रुपये जुर्माने का प्रावधान है। इसमें बिना पंजीकरण अस्पताल व क्लीनिक का संचालन मिलने पर जुर्माना लगाया जाता है। स्वास्थ्य विभाग के अफसरों का दावा है कि पांच से छह अस्पतालों पर जुर्माना लगाया गया है।
दो अस्पतालों के खिलाफ दर्ज हुआ था मुकदमा
राजधानी के दो अस्पतालों पर इस साल मुकदमा भी दर्ज हुआ है। इसमें एक एमजे हॉस्पिटल और दूसरा केडी हाॅस्पिटल है। घटना के बाद से केडी हॉस्पिटल संचालक गायब है। वहीं, एमजे हॉस्पिटल के खिलाफ मुकदमा दर्ज होने बाद भी पुलिस की ओर से आगे कोई कार्रवाई नहीं की गई।
Iजिन अस्पतालों का लाइसेंस निरस्त है, अगर वहां मरीज भर्ती मिलते हैं तो कार्रवाई की जाएगी। मजिस्ट्रेट की मौजूदगी में अस्पताल को बंद कराया जाएगा।I
I- डॉ. एनबी सिंह, सीएमओI