{"_id":"ebbb25db1d1eba16c7a4a46c9c077ce6","slug":"lal-baradari-in-lucknow","type":"story","status":"publish","title_hn":"आपको पता है, लाल बारादरी का असली नाम?","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
आपको पता है, लाल बारादरी का असली नाम?
टीम डिजिटल/अमर उजाला, लखनऊ
Updated Sun, 02 Feb 2014 11:24 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
लाल बारादरी, यानी एक खूबसूरत इमारत। वैसे इसका असली नाम कस्त्र-उल-सुल्तान है।
विज्ञापन
18वीं सदी के अंत में नवाब सआदत अली खां ने अपनी कोठी फरहत बख्श के ठीक सामने इस बारगाहे सल्तनत को बनवाया था।
उत्तर की तरफ से इसमें दो रास्ते हैं, जो दरबार हॉल में खुलते हैं। इस इमारत के नीचे तहखाने बने हैं, जिनमें जालियां लगी हुईं हैं। इनकी कारीगारी देखते ही बनती है।
यहां, चारों ओर से लंबी-लंबी शाहजहानी मेहराबों का सिलसिला है, जो सामने के रुख से बड़ा खूबसूरत लगता है क्योंकि दोनों सदर मेहराबों की ऊंचाई दोनों मंजिलों की ऊंचाई के बराबर है।
विज्ञापन
नवाब ने इस इमारत के दरबार हॉल में तख्त और मसनद के साथ नवाबी दरबार की शुरुआत की थी।
नवाबी की कलगी, तो उनके दादा हजरत नवाब सफदरगंज के वक्त से ही पगड़ी को हासिल हो चुकी थी, लेकिन पगड़ी को ताज में बदलने का रुतबा उनके बेटे गाजीउद्दीन हैदर को मिला था। गाजीउद्दीन हैदर की ताजपोशी इसी खूबसूरत इमारत में हुई थी।
विज्ञापन
उस वक्त बारादरी में गायकों, ज्ञानी लोग और अंग्रेज चमचों का ही हुजूम लगा रहता था मगर औरतों के नाम पर सिर्फ दरबारी तवायफों या महल की कनीजों का ही आना होता था।
लाल बारादरी ने अवध के भाग्य के कई पड़ाव देखे। इसी इमारत में नवाब वाजिद अली शाह तक की ताजपोशी हुई थी।
कह सकते हैं कि लखनऊ के इतिहास में इस लाल बारादरी का बड़ा महत्व रहा है। बाद में मुद्दतों इसमें मुर्दा अजायबघर रहा। फिर इसमें ललित कला अकादमी का शुभारंभ किया गया।