लगभग 200 साल पहले लखनऊ में ही नवाबों के जमाने में कहानी-किस्सों से निकलकर आई थीं गुलाबो-सिताबो। कठपुतली कहानियों की रानी बनी गुलाबो-सिताबो की हंसाती गुदगुदाती चुहल भरी तकरार लखनऊ से अमेरिका भी जा पहुंची। घर गृहस्थी में एक आदमी की दो घरैतिन की आपसी तकरार को दर्शाती कठपुतलियों की महारानी के ‘गुलाबो-सिताबो’ के नाम पर अब बॉलीवुड फिल्म की शूटिंग भी लखनऊ में शुरू हो चुकी है। शूजीत सरकार निर्देशित फिल्म गुलाबो-सिताबो में बिग बी अमिताभ बच्चन के साथ आयुष्मान खुराना और लखनऊ के कई सीनियर आर्टिस्ट आने वाले समय में पर्दे पर दिखेंगे। अगस्त के पहले पखवाड़े तक शहर की दो दर्जन से अधिक लोकेशन पर शूटिंग होनी है।
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'गुलाबो-सिताबो' की असली कहानी भी जान लीजिए, कैसे लखनऊ से शुरू होकर अमेरिका पहुंची
Tue, 25 Jun 2019 08:19 PM IST
ishwar ashish
न्यूज डेस्क/अमर उजाला, लखनऊ
न्यूज डेस्क/अमर उजाला, लखनऊ
Published by: ishwar ashish
Updated Tue, 25 Jun 2019 08:19 PM IST
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कठपुतली कलाकार प्रदीप त्रिपाठी
- फोटो : अमर उजाला
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प्रतीकात्मक तस्वीर
- फोटो : अमर उजाला
दो सौतनों की कहानी है
कठपुतली गुलाबो-सिताबो पर रिसर्च फेलोशिप कर चुके कठपुतली कलाकार प्रदीप नाथ त्रिपाठी ने बताया कि आम धारणा है कि गुलाबो-सिताबो पड़ोसन हैं या सहेलियां हैं, बहनें हैं, लेकिन इसके विपरीत वे दोनों सौतन हैं। एक आदमी की एक ब्याहता पत्नी हैं सिताबो और सिताबो की सौतन है गुलाबो...। उन्हीं के बीच आए दिन घर-गृहस्थी की छोटी-छोटी किचकिच, कलह, उलाहने कहानियों में उभरकर आए थे। किस्से बने और कठपुतलियों के माध्यम से एक ऐसी प्रस्तुति तैयार हुई कि दशकों तक लोगों के दिल और जुबान पर राज कर रही है।
कठपुतली गुलाबो-सिताबो पर रिसर्च फेलोशिप कर चुके कठपुतली कलाकार प्रदीप नाथ त्रिपाठी ने बताया कि आम धारणा है कि गुलाबो-सिताबो पड़ोसन हैं या सहेलियां हैं, बहनें हैं, लेकिन इसके विपरीत वे दोनों सौतन हैं। एक आदमी की एक ब्याहता पत्नी हैं सिताबो और सिताबो की सौतन है गुलाबो...। उन्हीं के बीच आए दिन घर-गृहस्थी की छोटी-छोटी किचकिच, कलह, उलाहने कहानियों में उभरकर आए थे। किस्से बने और कठपुतलियों के माध्यम से एक ऐसी प्रस्तुति तैयार हुई कि दशकों तक लोगों के दिल और जुबान पर राज कर रही है।
कठपुतली
- फोटो : अमर उजाला
प्रदीप नाथ ने बताया कि अपने शोध के दौरान 1991 में उन्होंने कठपुतली के दिग्गज कलाकार भूरे मास्टर से भी तमाम जानकारियां ली थीं। वे खुद 1920 से कठपुतली गुलाबो-सिताबो का संचालन करते आ रहे थे। तब भूरे मास्टर ने उन्हें बताया था कि उनके बाप-दादा और परदादा नवाब वाजिद अली शाह के समय और उससे भी पहले से कठपुतलियों का खेल पहले दरबारों में किया करते थे। अंग्रेज आ गए तो कला दरबारों के साथ बाहर आने पर लोगों के मनोरंजन का हिस्सा बन गई। गुलाबो-सिताबो कठपुतलियों की प्रदर्शनी कुछ समय पहले अमेरिका में लगातार एक साल तक कई जगहों पर भी लग चुकी हैं।
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कठपुतली
- फोटो : अमर उजाला
गुलाबो-सिताबो और कैसरबाग का संयोग
ये महज संयोग ही है कि जिस कैसरबाग और वहां बसे परीखाने में कभी नवाब वाजिद अली शाह अपने शासनकाल में नृत्य इंदरसभा सजाते थे। उनके कार्यकाल में कलाओं की प्रस्तुति का वो केंद्र था, उसी कैसरबाग में गुलाबो-सिताबो नाम से बन रही फिल्म की शूटिंग की शुरुआत हुई है। शूटिंग अगस्त तक लानी है जिसका काफी हिस्सा यहीं कैसरबाग के तमाम इलाकों मे शूट किया जाना है
ये महज संयोग ही है कि जिस कैसरबाग और वहां बसे परीखाने में कभी नवाब वाजिद अली शाह अपने शासनकाल में नृत्य इंदरसभा सजाते थे। उनके कार्यकाल में कलाओं की प्रस्तुति का वो केंद्र था, उसी कैसरबाग में गुलाबो-सिताबो नाम से बन रही फिल्म की शूटिंग की शुरुआत हुई है। शूटिंग अगस्त तक लानी है जिसका काफी हिस्सा यहीं कैसरबाग के तमाम इलाकों मे शूट किया जाना है
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कठपुतली कलाकार प्रदीप त्रिपाठी
- फोटो : amar ujala
गुलाबो सिताबो की तकरार की एक झलक
कलाकार प्रदीप नाथ त्रिपाठी ने बताया कि कठपुतली गुलाबो-सिताबो की चुहलबाजी तकरार का एक प्रदर्शन लगभग 12 से 20 मिनट का बनता है। इसे समय की मांग के अनुसार घटाया बढ़ाया जाता है। जिस चुहलबाजी के साथ एक दूजे से उलझती हैं गुलाबो-सिताबो, पेश है उसकी एक झलक :
साग लाई पात लाई और लाई चौलईयां
सास बहू छौंकन बैंठी, नाक लईगा कौव्वा...
गुलाबो खूब लड़ीं, सिताबो खूब लड़ीं..।
चार बुलाए चौदह आए, हर शहर की रीत..
बाहर वाले खाय गये जब घर के गावैं गीत.
गुलाबो खूब लड़ीं, सिताबो खूब लड़ीं..।
एक अचंभा हमने देखा, कुएं में लागी आग
और पानी-पानी जल गया रे, मछली खेलै फाग..
गुलाबो खूब लड़ीं, सिताबो खूब लड़ीं..।
चुटकी भर आटा, चवन्नी भर घिउ
खाये ले बुढऊना, जुड़ाय जाए जिउ
गुलाबो खूब लड़ीं, सिताबो खूब लड़ीं..।
लीपि आई पोति आई बैठी मन मार
और चार चूल्हे झांकि आई आज है त्यौहार
सईयां की लाडली मेला देखे जायें
सिलकी चादर बेच के मथुरा के पेड़े खांय
गुलाबो खूब लड़ीं, सिताबो खूब लड़ीं..।
कलाकार प्रदीप नाथ त्रिपाठी ने बताया कि कठपुतली गुलाबो-सिताबो की चुहलबाजी तकरार का एक प्रदर्शन लगभग 12 से 20 मिनट का बनता है। इसे समय की मांग के अनुसार घटाया बढ़ाया जाता है। जिस चुहलबाजी के साथ एक दूजे से उलझती हैं गुलाबो-सिताबो, पेश है उसकी एक झलक :
साग लाई पात लाई और लाई चौलईयां
सास बहू छौंकन बैंठी, नाक लईगा कौव्वा...
गुलाबो खूब लड़ीं, सिताबो खूब लड़ीं..।
चार बुलाए चौदह आए, हर शहर की रीत..
बाहर वाले खाय गये जब घर के गावैं गीत.
गुलाबो खूब लड़ीं, सिताबो खूब लड़ीं..।
एक अचंभा हमने देखा, कुएं में लागी आग
और पानी-पानी जल गया रे, मछली खेलै फाग..
गुलाबो खूब लड़ीं, सिताबो खूब लड़ीं..।
चुटकी भर आटा, चवन्नी भर घिउ
खाये ले बुढऊना, जुड़ाय जाए जिउ
गुलाबो खूब लड़ीं, सिताबो खूब लड़ीं..।
लीपि आई पोति आई बैठी मन मार
और चार चूल्हे झांकि आई आज है त्यौहार
सईयां की लाडली मेला देखे जायें
सिलकी चादर बेच के मथुरा के पेड़े खांय
गुलाबो खूब लड़ीं, सिताबो खूब लड़ीं..।