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कभी जंग का मैदान था, आज फूलों का गुलिस्तां
लखनऊ/इंटरनेट डेस्क
Updated Sat, 03 Aug 2013 01:11 PM IST
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कब बनी रेजिडेंसी: सन् 1800
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रेजिडेंसी भवनों का एक समूह है जिसका निर्माण सन् 1800 में अवध के नवाब सादत अली खान ने कराया था।
इसे अंग्रेजी सेना के वरिष्ठ अधिकारी ब्रिटिश रेजिडेंट जनरल के निवास के लिए बनाया गया था जो कोर्ट में नवाब के पैरोकार हुआ करते थे। 1857 में रेजिडेंसी लंबी लड़ाई का गवाह बना जिसे ‘सिज ऑफ लखनऊ’ कहा जाता है।
रेजिडेंसी की दीवारें आज भी गोलियों और गोलों के छेद से पटी पड़ी हैं। हालांकि आज के समय में बड़े-बड़े लॉन और फूलों की क्यारी रेजिडेंसी की खूबसूरती में चार चांद लगाकर पर्यटकों के बीच आकर्षण का केंद्र बनी हुई है।
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रेजिडेंसी में मौजूद चर्च के पास करीब 2000 अंग्रेज अधिकारियों और उनके परिवार की कब्रगाह है। वहीं पर मौजूद सर लॉरेंस की कब्र पर लिखा है ‘यहां पर सत्ता का वो पुत्र दफन है जिसने अपनी ड्यूटी के लिए अपनी जान कुर्बान कर दी थी’।
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इसी कब्रगाह के पास मौजूद एक दूसरी कब्र पर लिखा है ‘रो मत मेरे बेटे, मैं मरा नहीं हूं, मैं यहां सो रहा हूं’। रेजिडेंसी में उसके इतिहास को प्रदर्शित करती है। लखनऊ रेजिडेन्सी के अवशेष ब्रिटिश शासन की स्पष्ट तस्वीर पेश करते हैं।
रेजिडेंसी अवध प्रांत की राजधानी लखनऊ में रह रहे ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारियों का निवास स्थान हुआ करती थी। जिसके प्रमुख भवनों में बैंक्वेट हॉल, डॉक्टर फेयरर का घर, बेगम कोठी, और उसके पास मौजूद एक मस्जिद जो आज भी अस्तित्व में है जहां आज भी नमाज अदा होती है।