उपचुनाव: कैराना में होगी कर्नाटक के समीकरणों की परीक्षा, 2019 के लिए निकलेंगे संदेश
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जाने-अनजाने ही पर कैराना उपचुनाव 2019 के लिए उत्तर प्रदेश में गैर भाजपाई दलों के गठजोड़ की एक बड़े सियासी संभावना की प्रयोगशाला बन गया है। इसके सरोकार कर्नाटक के समीकरणों से भी जुड़े दिखाई दे रहे हैं। उत्तर प्रदेश की 80 संसदीय सीटों में से इस एक सीट का चुनाव भले ही गणितीय आधार पर बहुत महत्वपूर्ण न हो। पर, इससे कई सियासी समीकरणों का भविष्य जुड़ा है।
खासतौर से कर्नाटक में भाजपा की सरकार रोकने के लिए जिस तरह अधिकतर गैर भाजपाई दल एक मंच पर आए। गोरखपुर और फूलपुर उप चुनाव में एक-दूसरे के सहयोग को आगे बढ़े अखिलेश और मायावती कर्नाटक में जिस गर्मजोशी के साथ एक-दूसरे से मिलते दिखाई दिए।
रालोद नेता चौधरी अजित सिंह के साथ सोनिया गांधी और राहुल गांधी के खिले चेहरे दिखे, उसके चलते भी कैराना अब कर्नाटक के समीकरणों की परीक्षास्थली सा बनता दिख रहा है। यहां के नतीजों से साफ हो जाएगा कि दलों और नेताओं के दिलों के मेल की आगे क्या संभावनाएं हैं।
इसकी वजह यह है कि भले ही कैराना में सपा मुखिया अखिलेश यादव अभी तक प्रचार करने न गए हों। मायावती ने गोरखपुर और फूलपुर की तरह समर्थकों को कोई सियासी संदेश न दिया हो, कांग्रेस ने भी कैराना में अपनी भूमिका को सिर्फ अपना प्रत्याशी न खड़ा करने तक सीमित कर लिया हो। बावजूद इसके कैराना जाने-अनजाने एकजुट विपक्ष की सियासी ताकत की परीक्षा का केंद्र बन गया है। यहां के नतीजा भाजपा बनाम एकजुट विपक्ष की ताकत का एहसास कराएगा।
विपक्षी एकता की संभावनाओं की दिशा तय करेगा कैराना
इससे यह पता चलेगा कि लोकसभा चुनाव के लिए विपक्षी एकजुटता की संभावनाएं किस दिशा में आगे बढ़ेंगी और किसके हिस्से में क्या आएगा। खासतौर से रालोद के लिए तो यह चुनाव काफी अहम है। उसका तो इस चुनाव पर ही आगे की संभावनाओं का पूरा दारोमदार टिका है। शायद यही वजह है कि चौधरी अजित सिंह और उनके पुत्र जयंत चौधरी लगातार वहीं डटे हैं।
अन्य कुछ सवाल जो बनेंगे परीक्षा
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सपा या बसपा अथवा कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्षों में भले ही कोई अभी तक कैराना में प्रचार के लिए न गया हो लेकिन कैराना में जीत होती है तो उसे साझा विपक्ष की ताकत का पैमाना माना जाएगा।
जाहिर है कि कम से कम उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनाव के लिए गैर भाजपाई दलों की सियासी तैयारी में कैराना का नतीजा अहम भूमिका निभाने वाला है।
विपक्षी दलों के बीच नेतृत्व का सवाल अब कोई मुद्दा नहीं
हालांकि इन सवालों का उत्तर तो आगे पता चलेगा कि कर्नाटक में कुमार स्वामी के शपथग्रहण में दिल खोलकर एक-दूसरे से मिलने का संदेश देने वाले माया, अखिलेश, सोनिया-राहुल तथा अजित सिंह भविष्य के लिहाज से एक-दूसरे के लिए अपने दिल में कितनी जगह रखते हैं। इनके बीच नेतृत्व का सवाल अब कोई बड़ा मुद्दा है या नहीं।
बावजूद इसके कर्नाटक का प्रयोग कम से कम उत्तर प्रदेश में आगे बढ़ने की संभावनाएं काफी हद तक कैराना के नतीजों पर ही टिकी हैं। कैराना का नतीजा ही विपक्षी महागठबंधन की संभावनाओं को दिशा देगा और दलों की हिस्सेदारी तय करने में अहम भूमिका निभाएगा।