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‘अपने जन्म से पहले बच्चे को जन्म दे चुकी थी महिला’, जब कोर्ट पहुंचा ये मामला

Sun, 05 Feb 2017 05:14 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ Updated Sun, 05 Feb 2017 05:14 PM IST
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 judiciary officer conference in lucknow
डेमो प‌िक - फोटो : file photo

‘लड़की जब आठ वर्ष की थी, उसने तीसरे बच्चे को जन्म दिया, छह वर्ष की उम्र में दूसरे बच्चे को जन्म दिया और पहले बच्चे को तो उसने अपने जन्म से पहले ही जन्म दे दिया था।’ 

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वारिसाना हक के करीब तीन दशक तक चले एक मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा दिए गए निर्णय में सामने आए तथ्यों के आधार पर बने इस वाक्य को देश के विधि आयोग के अध्यक्ष जस्टिस बलबीर सिंह चौहान ने शनिवार को लखनऊ में आयोजित राज्य स्तरीय न्यायिक अधिकारी कॉन्फ्रेंस में सामने रखा। उन्होंने बताया कि उन्होंने 2010 को बतौर सुप्रीम कोर्ट जस्टिस इस मामले में अंतिम निर्णय दिया था।
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जस्टिस चौहान ने कहा कि चार अदालतों से होता हुआ यह मामला उनके पास आया था। जमींदार की दो पत्नियों से जन्मे बच्चों के बीच के इस विवाद में 1955 के हिंदू मैरिज एक्ट से बचने के लिए एक पक्ष ने ऐसे तथ्य प्रस्तुत किए थे, जिनसे यही साबित हो रहा था कि उनकी मां ने पहले बच्चे को अपने जन्म से पहले जन्म दे दिया था।
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दोनों पक्ष बड़े-बड़े वकील लेकर आए थे, जो बहुत महंगे थे। हाईकोर्ट से आए मामले में जो तथ्य और साक्ष्य सामने आए थे, उन्हें कालानुक्रम में रखने पर ऐसे अनोखे निष्कर्ष सामने आए। ऐसा तब होता है जब कोर्ट मामलों के संवैधानिक पक्ष पर उलझा हो और वकील दस्तावेजों को बिना गहराई से पढ़े, सुबूत के तौर पर प्रस्तुत करते जाएं।

बिना होमवर्क किए जज कोर्ट रूम कैसे जाएं?

 judiciary officer conference in lucknow
डेमो प‌िक - फोटो : file photo

जस्टिस चौहान ने कहा कि अगर अदालतें इस तरह के निर्णय देंगी, तो लोगों के मन में सवाल उठेगा कि इस देश में हमें न्याय व्यवस्था चाहिए भी या नहीं। हमारी साख दांव पर है। हम कैसे मामलों पर किस तरह निर्णय ले रहे हैं और किस क्वालिटी के निर्णय दे रहे हैं, इस पर बहुत कुछ निर्भर है। हम समाज के लिए जवाबदेह हैं।

जस्टिस चौहान ने यूपी के जिला जजों से कहा कि हमारे बच्चे अगर होमवर्क पूरा न हो तो स्कूल नहीं जाते, तो जज बिना होमवर्क किए कैसे कोर्ट रूम जाएं? हमें पूरी ईमानदारी से बताना होगा कि केस क्यों लंबित हैं, निर्णय में देर क्यों लग रही है।  

जब अदालत ने कहा, पति को है पत्नी को बेचने का हक 
जस्टिस चौहान ने एक और केस का उदाहरण दिया, जिसमें अदालत ने बिना सोचे निर्णय दिया। यह मामला एक पति के अपनी पत्नी को बेचने का था। 26 जनवरी 1810 को अंग्रेज जज के सामने यह केस आया। वह निर्णय नहीं कर पा रहा था। 

उसने केस दो जजों की पीठ में भेजा। वे भी निर्णय नहीं ले पाए, उन्हाेंने तीन जजों की पीठ में मामला भेजा। फुल बेंच ने निर्णय करने के बजाय आला अदालत से सुझाव मांगा। यहां उच्च स्तर के पंडितों और हिंदू धर्मशास्त्र ज्ञाताओं की समिति के जरिए मामले पर राय ली गई। द्रौपदी और तारामती के उदाहरण दिए गए। आला अदालत ने समिति को अपने सुझाव भेज दिए। निचली अदालत का निर्णय आया कि पति द्वारा अपनी पत्नी को बेचना कानूनी रूप से सही था।  

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