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सपा की रजत जयंती: संघर्ष और अंतर्विरोधों से आगे बढ़ी सपा

ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ Updated Sat, 05 Nov 2016 02:53 AM IST
समाजवादी पार्टी के स्थापना दिवस 5 नवंबर 1992 की दुर्लभ फोटो
समाजवादी पार्टी के स्‍थापना दिवस 5 नवंबर 1992 की दुर्लभ फोटो - फोटो : amar ujala
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बिखरे हुए समाजवादी आंदोलन को सहेजने के लिए 4-5 नवंबर 1992 को लखनऊ के बेगम हजरत महल पार्क में हुए दो दिवसीय अधिवेशन में प्रदेश ही नहीं, देश भर के समाजवादी नेता एकत्र हुए। उन्होंने समाजवादी पार्टी की स्थापना की और मुलायम सिंह को राष्ट्रीय अध्यक्ष चुना।



उनकी टीम में जनेश्वर मिश्र उपाध्यक्ष और बिहार के कपिल देव सिंह महासचिव चुने गए। तब से लेकर 24 सालों में  मुलायम की अगुवाई में सपा ने शानदार सियासी सफर तय किया है।


स्थापना के बाद हुए सभी विधानसभा चुनावों में सपा या तो सत्ता में आई या फिर मुख्य विपक्षी दल रही। दो-ढाई दशक के राजनीतिक पड़ाव में सिर्फ इतना फर्क आया है कि दूसरी पीढ़ी के नेता आगे बढ़ गए हैं। मुलायम सिंह के बाद अखिलेश यादव पार्टी का चेहरा बनकर उभरे हैं। खास बात ये है कि संघर्ष के साथ अंतर्विरोध सपा की पहचान बनते गए और पार्टी आगे बढ़ती रही।

सपा शनिवार को स्थापना के 25वें साल में प्रवेश कर रही है। इसकी शुरूआत शनिवार को जनेश्वर मिश्र पार्क में भव्य और विशाल रजत जयंती समारोह से होगी। मुलायम ने सपा की स्‍थापना एकाएक नहीं की। यह उनके संघर्षों की लंबी राजनीति का नया पड़ाव था।

सपा की स्‍थापना से पहले मुलायम के पास था तीन दशक का अनुभव

तस्वीर में मुलायम के साथ रामशरण दास, बेनी प्रसाद वर्मा, प्रभु नारायण सिंह, मौजूद कबीना मंत्री राजेंद्र सिंह व कल्याण जैन
तस्वीर में मुलायम के साथ रामशरण दास, बेनी प्रसाद वर्मा, प्रभु नारायण सिंह, मौजूद कबीना मंत्री राजेंद्र सिंह व कल्याण जैन - फोटो : amar ujala
सपा की स्थापना से पहले मुलायम के पास तीन दशक की सक्रिय व मुख्य धारा की राजनीति का अनुभव था। वे 1967 में पहली बार विधायक बने, 1977 में पहली बार मंत्री और 1989 में पहली बार मुख्यमंत्री बने।

चन्द्रशेखर की अगुवाई वाली समाजवादी जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष थे। उन्होंने अगस्त 1992 में ही समाजवादियों को इकट्ठा कर नया दल बनाने का मन बना लिया था। इसकी तैयारी भी शुरू हो गई थी।

इसी बीच सितंबर 92 के आखिर में रामकोला (देवरिया ) में किसानों पर गोली चल गई और दो लोगों की मौत हो गई। मुलायम लखनऊ से देवरिया के लिए रवाना हुए लेकिन उन्हें गिरफ्तार कर सेंट्रल जेल शिवपुर (वाराणसी) भेज दिया गया।

बीएचयू से पीएचडी करके अमेरिका में फैलोशिप पर जाने की तैयारी कर रहे युवा नेता डॉ. केपी यादव बताते हैं कि वह जेल में गए नेताजी (मुलायम सिंह) से मिलने गए तो वह किसानों पर अत्याचार से आहत थे।

जेल में ही पार्टी के गठन को दिया अंतिम रूप

मुलायम सिंह यादव
मुलायम ‌सिंह यादव - फोटो : amar ujala
उनकी पीड़ा थी किसानों के हक में कोई राजनीतिक दल मुखर आवाज नहीं उठा रहा है। डॉ. केपी यादव बताते हैं कि जेल में ही उन्होंने नई पार्टी के गठन की योजना को अंतिम रूप दिया।

अपने साथ जेल में बंद ईशदत्त यादव, बलराम यादव, वसीम अहमद व कुछ अन्य नेताओं से उन्होंने इस संबंध में विस्तार से चर्चा की। नेताजी की गिरफ्तारी का विरोध करने पर अगले दिन दिन केपी को भी 17 छात्र, युवाओं के साथ गिरफ्तार कर जिला कारागार भेज दिया गया।

रिहा होते ही मुलायम सिंह 16 अक्तूबर को जनेश्वर मिश्र की पत्नी के निधन की सूचना पर बलिया चले गए। वहां से लौटकर 4-5 नवंबर के राष्ट्रीय अधिवेशन की तैयारी में जुट गए।

इस सम्मेलन में प्रदेश के प्रमुख समाजवादी नेताओं के साथ ही पश्चिमी बंगाल में सोशलिस्ट पार्टी के अध्यक्ष व मंत्री किरनमय नंदा, हरियाणा में समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष व पूर्व मुख्यमंत्री हुकम सिंह, बिहार के पूर्व मंत्री कपिल देव सिंह समेत कुछ अन्य राज्यों के नेता भी शामिल हुए।

राम मंदिर आंदोलन के बाद भाजपा को दी पटखनी

सपा की स्थापना के एक माह बाद ही 6 दिसंबर 1992 में अयोध्या में विवादित ढांचा गिरा दिया गया। तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह की सरकार बर्खास्त कर दी गई। राष्ट्रपति शासन लग गया।

घटना से पांच दिन पहले ही मुलायम सिंह ने कई प्रमुख नेताओं के साथ राष्ट्रपति से मुलाकात कर बाबरी मस्जिद को गिराए जाने की आशंका जताई थी। उनकी यह आशंका सही साबित हुई। यह दौर राम जन्म भूमि आंदोलन के पूरे उभार का था। भाजपा को राम लहर का भरोसा था। 1993 के आखिर में विधानसभा चुनाव हुए।

मुलायम सिंह ने भाजपा की चुनौती को स्वीकारते हुए बसपा के अध्यक्ष कांशीराम से गठबंधन किया। उस समय ‘जय श्रीराम’ के जवाब में नारा लगता था 'मिले मुलायम-कांशीराम, हवा में उड़ गए जय श्री राम’। सपा की स्थापना के 11 माह बाद ही मुलायम सिंह सपा-बसपा गठबंधन सरकार के मुख्यमंत्री बन चुके थे। यह उनकी बड़ी राजनीतिक जीत थी।

1996 में सबसे बड़े दल के रूप में उभरे

वर्ष 1996 के विधानसभा चुनाव में सपा की सरकार नहीं बनी लेकिन वह सबसे बड़े दल के रूप में उभरी। यही स्थिति वर्ष 2002 के विधानसभा चुनाव में रही। 2003 में मुलायम जोड़तोड़ करके फिर मुख्यमंत्री बने।

2007 में बसपा की सरकार बनी लेकिन मुख्य विपक्षी दल सपा रही। सपा के बनने के बाद भाजपा प्रदेश में नंबर-1, नंबर-2 पार्टी बनने के लिए तरस रही है।

वर्ष 2012 में पहली बार सपा ने अपने दम पर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई। सपा को 2014 के लोकसभा चुनाव में जरूर झटका लगा जब उसके केवल 5 सांसद चुने गए। पार्टी की स्थापना के बाद से सपा के सबसे कम सांसद हैं।

अखिलेश बने चेहरा, बदली रीति-नीति

अखिलेश यादव 1999 में राजनीति में सक्रिय हुए। सबसे पहले वर्ष 2000 में वह कन्नौज सीट पर उपचुनाव जीतकर लोकसभा में पहुंचे। यह सीट मुलायम सिंह के दो जगह से जीतने के बाद कन्नौज सीट छोड़ने पर खाली हुई थी। इसी सीट से वे 2004 और 2009 में विजयी हुए।

अगस्त 2002 में सपा के भोपाल अधिवेशन में अखिलेश यादव को युवा संगठनों का प्रभारी बनाया गया था। यह जिम्मेदारी अभी तक उन्हीं के पास है। उन्हें जून 2009 में शिवपाल सिंह यादव की जगह प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया। 12 सितंबर 2016 तक वह इस पद पर रहे।

अखिलेश जब से सपा की मुख्य धारा की राजनीति में सक्रिय हुए तब से सपा की रीति-नीति में बदलाव आया है। युवाओं को ज्यादा तरजीह मिली है। उन्होंने डीपी यादव की सपा में एंट्री रोककर राजनीति के अपराधीकरण के खिलाफ चलने का संकेत दिया। कौमी एकता दल के सपा में विलय का विरोध करके उन्होंने इस छवि को और मजबूत किया।

जनेश्वर ने कहा था मैं खुद लगाऊंगा अखिलेश जिंदाबाद का नारा

अखिलेश जब पहली बार सपा अध्यक्ष बने तक वह जनेश्वर मिश्र से मिलने गए थे। जनेश्वर ने 35 साल के इस नेता से कहा था,  संभव है कि पार्टी के कुछ वरिष्ठ आपको आसानी से नेता न स्वीकार नहीं करे। वे विरोध करें, आपकी राह मुश्किल करें लेकिन इन हालातों से घबराना नहीं। अपना काम करते रहना होगा।

हो सकता है कि ये नेता अखिलेश जिंदाबाद न कहें, लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। जब मुझे इस बात का यकीन हो जाएगा कि आपने खुद को बतौर नेता स्थापित कर लिया है तो मै अखिलेश जिंदाबाद के नारे लगाऊंगा।

जनेश्वर मिश्र अब नहीं रहे लेकिन सपा का रजत जयंती वर्ष आते-आते अखिलेश ने खुद को स्थापित कर लिया है। जनेश्वर मिश्र ने उनसे यह भी कहा कि वह डॉ. लोहिया की सीट (कन्नौज) का प्रतिनिधित्व करते हैं। इसलिए लोहिया के विचारों व राजनीति को अपने भीतर उतार लें। उनके अध्यक्ष बनने पर ही पैर छूने की संस्कृति पर रोक लगाने के आदेश हुए थे।

समाज की सोच का राजनीति में रिफ्लेक्शन

पूर्व सांसद व पूर्व मंत्री भगवती सिंह सपा के संस्थापक नेताओं में हैं। वह कहते हैं कि 25 सालों में संगठन का दायरा बढ़ा है, सरकार ने बहुत काम किए हैं, इससे जनता आकर्षित हुई है। वे मानते हैं कि समाज की सोच ही राजनीति में रिफलेक्ट हो रही है।

भगवती सिंह ने कहा कि आपातकाल के बाद समाजवादी आंदोलन बिखर गया था। समाजवादी पार्टी की स्थापना लोहिया, जेपी, राजनारायण की धारा के लोगों को एक साथ खड़ा करने के लिए की गई थी। इसकी पहल मुलायम सिंह ने की। 24 सालों में यह प्रयोग सफल रहा है।

एक सवाल के जवाब में वह कहते हैं कि नई पीढ़ी और पुरानी पीढ़ी की सोच में अंतर है। नई पीढ़ी पढ़ना- लिखना नहीं चाहती है। यह बात सपा के लिए नहीं, वर्तमान राजनीति की सभी धाराओं पर लागू होता है। इसकी मूल वजह यह है कि राजनीति अब सेवा के बजाय भोग का क्षेत्र बन गई है। रजत जयंती वर्ष में सपा के विवाद पर वह बोलने से बचते हैं।

कहते हैं कि बुनियादी सोच बदल रही है। परिवार टूट रहे हैं, बुजुर्गों का सम्मान कम हो रहा है। समाज में जो होता है, राजनीति में उसका प्रतिबिंब दिखाई पड़ता है। यह किसी एक दल में नहीं है।
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