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'हजारों सुनामी और भूंकप में मरते हैं और भगवान कुछ नहीं करता'

Tue, 09 Jun 2015 10:35 AM IST
Updated Tue, 09 Jun 2015 10:35 AM IST
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javed akhtar address lucknow people

हजारों लोग सुनामी और भूकंप में घुट-घुट कर मरते हैं और भगवान कुछ नहीं करता। मैं ऐसे भगवान को नहीं मानता। यह बात जावेद अख्तर ने धर्म और विश्वास से जुड़े एक प्रश्न के उत्तर में कही।

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पुस्तक लांच के एक कार्यक्रम में लखनऊ आए जावेद अख्तर सीधे ही लोगों के प्रश्नों से मुखातिब हुए। आस्था और विश्वास से जुड़े एक प्रश्न का जवाब देते हुए जावेद अख्तर ने कहा कि हर साल हजारों लोग सुनामी और भूंकप जैसी आपदाओं में मरते हैं और हमारा भगवान या खुदा या गॉड उनको तिल तिलकर मरने देता है। या तो भगवान है नहीं या फिर यदि  है तो फिर उसको लोगों से कोई मतलब नहीं। आप ऐसे भगवान को मानते हैं तो शौक से मानिए मैं ऐसे भगवान को नहीं मानता।
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जावेद अख्तर ने कहा कि लोगों की पहचान उनके काम से होनी चाहिए उनके धर्म की वजह से नहीं। यदि कोई क्रिकेट खेलता है तो वह पहले क्रिकेटर है बाद में हिंदु या मुसलमान। उन्होंने कहा कि विज्ञान के अनुसान 8 साल की उम्र तक बच्चा जिस तरह के संस्कारों में रह रहा होता है वह उसे पूरी जिंदगी बदल नहीं पता। दुर्भाग्य से इसी उम्र में हमारे अंदर धर्म के कीड़े लगा दिए जाते हैं।
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होना यह चाहिए कि बच्चे को 18 साल तक ऐसे ही छोड़ देना चाहिए। जब उसका दिमाग विकसित हो जाए तब उसे यह चुनने के लिए कहा जाना चाहिए तुम अपनी समझ से यह तय करों कि तुम्हें किस तरह का धर्म चाहिए।

रेडियो धीमे सुन‌िए आज मोहर्रम है

javed akhtar address lucknow people

लखनऊ में पले बढ़े जावेद ने यहां हिंदू और मुसलमानों के बीच किस तरह का आपसी समन्वय है इसका एक खाका खींचा। उन्होंने कहा कि मुझे कभी लगा ही नहीं कि होली और दीवाली हिंदुओं के त्योहार हैं।

जावेद कहते हैं‘लखनऊ की न्यू हैदराबाद की जिस सड़क पर रहता था वहां 10-12 घर थे। कुछ कायस्थ परिवार थे, कुछ ठाकुर। 2 मुस्लिम और क्रिश्चियन और कुछ ब्राह्मण थे। बचपन में मुझे ऐसा माहौल मिला कि मुझे कभी होली दूसरे समुदाय का त्यौहार नहीं लगी।

बचपन का सबसे बड़ा मलाल था कि मुझे पीतल की पिचकारी नहीं मिल पाई। मेरे चचेरे भाई जो मुझसे 20-20 साल बड़े थे, होली पर उनके दोस्त घर में घुस आते और उन्हें खींचकर बाहर ले जाकर रंग देते थे।

मोहर्रम होता तो कायस्थ परिवार अपना रेडियो धीमी आवाज में बजाते ताकि मुस्लिम परिवारों को परेशानी न हो। यही लखनऊ है और इसी लखनऊ ने मुझे तैयार किया है। उन्होंने कहा कि एक-दूजे की समझ ही है लखनवी सीरत। मैं अच्छा हूं, बुरा हूं, या जैसा भी हूं आप लखनऊ वालों को जिम्मेदार कहूंगा।’

भाषा को यूं समझा गए जावेद

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भाषा क्या है? इस सवाल पर जवाब में जावेद ने एक पैराग्राफ सुनाया, जो इस तरह था ‘एक मकान के कमरे में आदमी और बच्चा बाल्टी से नहाए। उन्होंने बावर्ची का बनाया टोस्ट और उड़द की दाल का नाश्ता किया। आदमी कमरे में लौटा दीवार से पिस्तौल उतारी और वहां से चला गया, बच्चा बेबस देखता रहा।’ उन्होंने कहा कि इन चंद पंक्तियों में मकान शब्द अरबी है, कमरा तो इतालवी, वहीं बाल्टी पुर्तगाली, उड़द तमिल, टोस्ट इंग्लिश, बावर्ची - तुर्की, पिस्तौल - इंग्लिश, दीवार - पर्शियन और बेबस - संस्कृत (विवश) शब्द हैं।

उन्होंने कहा कि इसी तरह 10-12 भाषाओं के शब्द हम इस्तेमाल कर रहे हैं। भाषा दरअसल व्याकरण है, उसे लिपी से तय नहीं किया जा सकता। लिपी को भाषा को माना जाए तो सारी यूरोपीय भाषाएं लैटिन हो जाएंगी। यह हिंदी है न उर्दू है, न कोई और , बल्कि हिंदुस्तानी है, जिसे हम सभी समझते हैं।

जावेद अख्तर यहां गोमतीनगर स्थित जयपुरिया संस्थान में भगवती चरण वर्मा के पौत्र चंद्रशेखर वर्मा के उपन्यास ‘कॉनर्स ऑफ अ स्ट्रेट लाइन’ के विमोचन का। लखनऊ एक्सप्रैशंस संस्था द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में जावेद अख्तर के विचारों और उनकी कविताओं को सुनने बड़ी संख्या में लखनवी उमड़े और जावेद ने भी किसी को निराश नहीं किया।

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