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केजरी बोले, हम पर हमला मोदी के समर्थकों की करतूत

Mon, 12 May 2014 09:57 PM IST
मनोज श्रीवास्तव/अमर उजाला, लखनऊ
मनोज श्रीवास्तव/अमर उजाला, लखनऊ Updated Mon, 12 May 2014 09:57 PM IST
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interview of arvind kejriwal

चुनाव पूरा हो गया। सियासी सूरमा थकान उतारने के मूड में हैं। पर भारतीय राजनीति की नई हलचल अरविंद केजरीवाल न थका महसूस कर रहे हैं न चुनावी नतीजों को लेकर उनके चेहरे पर कोई चिंता के भाव।

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भ्रष्टाचार विरोधी अभियान के प्रति उनका इरादा पहले जैसा ही तरोताजा है। हां, काशी से उनका प्रथम साक्षात्कार इतना प्रभावी रहा है कि अब उन्होंने काशी की राजनीति न छोड़ने का मन बना लिया है।
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बकौल केजरीवाल, काशी का अनुभव भी बेहद दिलचस्प रहा है। ‘छोटी-छोटी अड़ियों पर चलने वाली बहसों ने मन मोह लिया। आखिर यही तो भारतीय लोकतंत्र का मूल मंत्र है।’
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पर उन्हें मलाल इस बात का है कि शास्त्रार्थ की परंपरा वाले इस शहर में बहस के लिए न नरेंद्र मोदी ने उनकी चुनौती स्वीकारी न उनके किसी सपोर्टर ने।

गंगा के बहाने मोदी पर बरसे

interview of arvind kejriwal

केजरीवाल का यह भी मानना है कि चुनावी घमासान के दौरान आप कार्यकर्ताओं पर हमले काशी के भाजपाई ने नहीं बल्कि बाहर के लोगों ने किए थे।

बनारस के भाजपा कार्यकर्ता तो ऐसी किसी घटना के खिलाफ भी थे और क्षुब्ध भी। हां, इस छोटी सी मुलाकात में वह प्रतीकों के सहारे से अपने विरोधी पर निशाना साधना नहीं भूले। कहते हैं कि गंगा स्नान और गंगा आरती हर किसी को नसीब नहीं होती। केजरीवाल से बातचीत के कुछ अंश....।

सवाल-काशी में कैसा अनुभव रहा?

जवाब-अद्भुत, अनिवर्चनीय। लाल बहादुरशास्त्री, प्रेमचंद, भारतेन्दु हरिश्चंद्र, बिस्मिल्लाह खां जैसे नामचीन हस्तियों को जन्म देने वाला शहर। बेमिसाल तो यह कि हर किस्म की विचारधारा को यहां स्थान मिलता रहा। मैंने गंगा स्नान किया, संकटमोचन मंदिर गया, कालभैरव के दर्शन किए, गंगा आरती में भी हिस्सा लिया।

सब जगहों के अलग-अलग अनुभव। कुल मिलाकर काशी से प्रथम साक्षात्कार से ऐसा लगा, मानो यहां से जन्म-जन्मांतर का रिश्ता है। अब काशी छूटने वाली नहीं। गंगा व गंगा आरती सबको नसीब नहीं होती। शायद गंगा भी पवित्र मन के लोगों को ही हाथ लगाने देती है।

'आप' का केंद्र रहेगी काशी

interview of arvind kejriwal
सवाल- काशी से आगे के रिश्ते कैसे रहेंगे।
जवाब-
मैं जीतू या हारूं, तय कर लिया है कि अब आम आदमी पार्टी की राजनीति का केंद्र काशी ही होगी। ‘आप’ यहां हर मसले पर मुखर और सक्रिय रहेगी।

नगर पालिका से लेकर विधानसभा तक का चुनाव लड़ेगी। न केवल चुनाव लड़ेगी बल्कि आप ने यहां के विकास के लिए जो घोषणापत्र जारी किया है, उसको अमली जामा पहनाने की दिशा में भी पहल होगी।

सवाल-यहां की किसी खास परंपरा या व्यक्ति ने प्रभावित किया?
जवाब-
मंडन मिश्र के जमाने से काशी में शास्त्रार्थ की परंपरा रही है। जो अब चाय की अड़ियों में होने वाली बहसों में तब्दील हो गई है। इन अड़ियों में हर तरह के विचारों वाले लोग होते हैं, सबके अपने-अपने तर्क होते हैं। एक-दूसरे को कोई स्वीकार नहीं करता पर दूसरे दिन फिर गर्मजोशी के साथ मिलते हैं।

मेरा मानना है कि अड़ियों की इन बहसों में लोकतंत्र की मूल आत्मा बसती है। यहां काशी विश्वनाथ मंदिर है, बगल में ज्ञानवापी मस्जिद, पर कहीं कोई टकराव नहीं। नतीजा यही निकलता है कि धार्मिक नगरी होने के बावजूद कट्टरवाद यहां की संस्कृति में नहीं।

मोदी के समर्थकों का हमला

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सवाल-आप लोगों पर स्याही फेंकी गई, मारपीट की गई और प्रचार सामग्री फाड़ी गई।
जवाब-
मेरी अपनी जानकारी है कि यह हरकत स्थानीय भाजपाइयों की नहीं थी। बाहर से आए मोदी समर्थकों की करतूत थी।

यहां के भाजपाइयों ने तो इसका विरोध तक किया। पर ऐसे हमले बताते हैं कि मोदी और उनके सर्मथकों के पास मेरे सवालों के जवाब नहीं हैं।

सवाल-चुनाव बाद की राजनीति क्या?
जवाब-
राजनीति में मेरा अंतिम लक्ष्य एमपी-पीएम बनना नहीं। मूल भ्रष्टाचार विरोध है। उसके खिलाफ जंग जारी रहेगी। पूरे जज्बे और जोश के साथ। कोशिश यह भी रहेगी कि अच्छे लोग राजनीति में आएं और सत्ता का विकेंद्रीकरण हो।

पूंजीपतियों के खिलाफ नहीं

interview of arvind kejriwal
सवाल-आप राजनेताओं की तरह कुर्ता-पायजामा नहीं पहनते?
जवाब-
निजी जीवन में जैसा हूं, वैसा ही सार्वजनिक जीवन में हूं। महज दिखावे के लिए कुछ भी नहीं करता।

सवाल-कॉरपोरेट घरानों के खिलाफ जंग का क्या होगा?
जवाब-
वह भी जारी रहेगी। मेरी सुनिश्चित राय है कि इस देश को सबसे बड़ा खतरा भ्रष्ट नेताओं- अफसरों व पूंजीपतियों के नेक्सस (गठजोड़) से है। जब तक इस तंत्र को तोड़ा नहीं जाता, कोई सिस्टम जनता के प्रति कारगर और कल्याणकारी नहीं हो सकता।

सवाल-जब बनारस से चुनाव लड़ने की घोषणा की थी तो यहां के कितने लोगों को जानते थे?
जवाब-
(हंसते हुए) जब चुनाव लड़ने की घोषणा की तो मैं बनारस के बमुश्किल तीन चार लोगों को जानता था। पर शुक्रवार को रोड शो के दौरान गाड़ी पर खड़े होकर भीड़ की तरफ नजर दौड़ाई तो आंखों से आंसू छलक आए। दरअसल ताकत मेरी नहीं मेरे एजेंडे की थी। एक शेर बेसाख्ता मेरे जेहन में घूमा।
मैं अकेला ही चला था जानिबे मंजिल मगर
लोग साथ आते गए, कारवां बनता गया।
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