4 वजहें, नमो-नमो पर क्यों भड़के थे भागवत
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भाजपा के भीतर कलह की चिंगारी पर पानी डालने के लिए काफी सोच-समझकर कर स्वयंसेवक संघ ने एक सलाह दी है।
भाजपा नेता भले ही मोदी की लहर की बात कर रहे हों और 272 प्लस का आंकड़ा पाने के दावे कर रहे हों, पर संघ प्रमुख की बातों से यह साफ हो गया है कि भाजपा के कुछ नेताओं की भूमिका ने उनकी पेशानी पर बल डाल दिया है।
उनका यह बयान इसी चिंता को दिखाता है। साथ ही भाजपा नेतृत्व के कामकाज से जो लोग खुद को आहत महसूस कर रहे थे, उनके जख्मों पर मरहम लगाने का प्रयास भी है।
हिदायत: फैसलों में वरिष्ठों से की जाए बातचीत
सूत्रों के अनुसार, भाजपा में हर मुद्दे पर उभर रहे विवादों पर संघ ने राजनाथ से पूछा था कि क्या फैसलों में प्रमुख लोगों से सलाह-मशविरा नहीं किया जाता।
इस पर भाजपा अध्यक्ष ने सफाई दी कि नरेंद्र मोदी से उनकी बराबर बातचीत होती है। संघ ने साफ हिदायत दी है, ‘फैसलों में अन्य वरिष्ठ लोगों से भी बातचीत की जाए।
हमारे लिए विचारधारा सर्वोपरि है और व्यक्ति उसके बाद आता है। नेतृत्व करने और नीतियों पर चलने में अंतर है। नीतियों से समझौता नहीं हो सकता।’
सिंह ने भरोसा दिलाया कि नीति से कोई समझौता नहीं किया जाएगा। जो लोग पार्टी में आ रहे हैं, वह रणनीति के तहत है।
किसी को कोई आश्वासन नहीं दिया गया है। आगे से वह और सावधानी बरतेंगे। भाजपा के महामंत्री (संगठन) रामलाल ने भी अपनी बात रखी।
इसलिए देनी पड़ी सफाई
क्षेत्र प्रचारक स्तर पर काम चुके एक प्रचारक का कहना है कि संघ ने भले ही पहले मोदी को प्रधानमंत्री का उम्मीदवार बनाकर चुनाव मैदान में उतारने की हरी झंडी दी हो, पर बैठक के मुक्त सत्र में संघ प्रमुख के सामने आए सवालों ने उन्हें स्थिति साफ करने के लिए मजबूर कर दिया।
एक प्रतिनिधि ने जिज्ञासा जताई कि विचारधारा संगठन को व्यक्तिवादी बनाने की विरोधी है, फिर इस बार एक व्यक्ति (मोदी) को आगे करके चुनाव लड़ने का फैसला क्यों किया गया?
एक सवाल आया कि ‘नमो-नमो’ करके क्या हम किसी व्यक्ति को संगठन से बड़ा नहीं बना रहे हैं? एक प्रतिभागी ने सवाल उठाया कि संगठन की जड़ें जमाने वालों को नेपथ्य में जाने के लिए मजबूर करने की वजह क्या है?
इसीलिए भागवत को ‘नमो-नमो’ न करने की बात कहनी पड़ी, क्योंकि वह व्यक्तिवाद का समर्थन कर ही नहीं सकते थे।
कहीं यह वजह तो नहीं
संघ के पुराने लोगों की मानें तो तमाम दावों के बावजूद संघ आगे के लिए विकल्प खुला रखना चाहता है।
साथ ही अपनी प्रतिष्ठा भी बचाए रखना चाहता है, जिससे कल कोई स्थिति बने तो भाजपा के सत्ता में आने का रास्ता बंद न हो।
इन लोगों की मानें तो जब मोदी तीसरी बार गुजरात में जीते तो संघ को भी लगा कि सफलता को प्रचारित करके भाजपा के लिए संभावनाएं बनाई जा सकती हैं, पर पिछले दिनों के घटनाक्रम से संघ को यह चिंता सताने लगी है कि कहीं उस पर व्यक्तिवाद का पैरोकार होने का संदेश न चला जाए।
इसीलिए संघ प्रमुख को कहना पड़ा कि नीति में कोई बदलाव नहीं हुआ है। संघ का मानना है कि परिवार के वरिष्ठ लोगों का सम्मान सर्वोपरि है।