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सपा का 'दंगल': पिता के नक्शेकदम पर ही चल रहे अखिलेश
महेंद्र तिवारी/अमर उजाला, लखनऊ।
Updated Tue, 03 Jan 2017 10:41 AM IST
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मुलायम सिंह यादव
- फोटो : amar ujala
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यूपी में सपा की महाभारत में पिता मुलायम के साथ अखिलेश का 'दंगल' जारी है। हैरान मत हों, बेटा अपने पिता के ही नक्शेकदम पर है।
मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने अपने पिता मुलायम सिंह यादव को जिस तरह से हटाकर उनकी कुर्सी पाने की चाल चली है, दरअसल मुलायम भी अपने सियासी कॅरिअर में वैसा ही करते आए हैं। मुलायम पहलवान रहे हैं और इसे सियासत का चरखा दांव बताते हैं। अखिलेश आज पिता का इतिहास ही दोहरा रहे हैं।
वरिष्ठ पत्रकार वीर विक्रम बहादुर मिश्र कहते हैं कि जिस भी नेता ने मुलायम की मदद की, उन्होंने सभी को दांव दिया। पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह से लेकर वीपी सिंह, चंद्रशेखर और राजीव गांधी से हाथ मिलाया और उन्हें दांव देकर खुद आगे बढ़ गए। बाद में इन सभी को सियासत में अस्तित्व के संकट का सामना करना पड़ा।
मिश्र बताते हैं कि 1989 के चुनाव में जनता दल पूर्ण बहुमत से सत्ता में आया था। अजित सिंह और मुलायम सिंह मुख्यमंत्री के दावेदार थे। मुलायम ने वीपी सिंह की मदद ली और मुख्यमंत्री बन गए। जिन चौधरी चरण सिंह ने उन्हें आगे बढ़ाया था, मुलायम ने उनके बेटे को दांव देने में गुरेज नहीं किया। दूसरी ओर वीपी सिंह को भी सूबे में पांव जमाने का मौका नहीं दिया। शादी के एक कार्यक्रम को छोड़ दें तो वीपी प्रधानमंत्री रहते हुए कभी यूपी नहीं आ सके।
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मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने अपने पिता मुलायम सिंह यादव को जिस तरह से हटाकर उनकी कुर्सी पाने की चाल चली है, दरअसल मुलायम भी अपने सियासी कॅरिअर में वैसा ही करते आए हैं। मुलायम पहलवान रहे हैं और इसे सियासत का चरखा दांव बताते हैं। अखिलेश आज पिता का इतिहास ही दोहरा रहे हैं।
वरिष्ठ पत्रकार वीर विक्रम बहादुर मिश्र कहते हैं कि जिस भी नेता ने मुलायम की मदद की, उन्होंने सभी को दांव दिया। पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह से लेकर वीपी सिंह, चंद्रशेखर और राजीव गांधी से हाथ मिलाया और उन्हें दांव देकर खुद आगे बढ़ गए। बाद में इन सभी को सियासत में अस्तित्व के संकट का सामना करना पड़ा।
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मिश्र बताते हैं कि 1989 के चुनाव में जनता दल पूर्ण बहुमत से सत्ता में आया था। अजित सिंह और मुलायम सिंह मुख्यमंत्री के दावेदार थे। मुलायम ने वीपी सिंह की मदद ली और मुख्यमंत्री बन गए। जिन चौधरी चरण सिंह ने उन्हें आगे बढ़ाया था, मुलायम ने उनके बेटे को दांव देने में गुरेज नहीं किया। दूसरी ओर वीपी सिंह को भी सूबे में पांव जमाने का मौका नहीं दिया। शादी के एक कार्यक्रम को छोड़ दें तो वीपी प्रधानमंत्री रहते हुए कभी यूपी नहीं आ सके।
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...जब मुलायम के खिलाफ था जबर्दस्त आक्रोश
मुलायम सिंह यादव
मिश्र बताते हैं कि 1990 में अयोध्या में कारसेवकों पर गोली चली। मुलायम के खिलाफ जबर्दस्त आक्रोश था। अजित सिंह जनता दल से अलग हो गए और जनता दल ‘ए’ बना लिया। मुलायम की सरकार अल्पमत में आ गई। मुलायम दिल्ली पहुंचे और धर्मनिरपेक्षता के खतरे में पड़ने की दुहाई देकर राजीव गांधी से मदद मांगी। राजीव ने साथ दे दिया। इसका असर ये हुआ कि मुलायम तो आगे चलकर मुसलमानों के रहनुमा बन गए और कांग्रेस यूपी से विदा हो गई।
1991 में जब चुनाव का मौका आया तो मुलायम के पास सिंबल नहीं था। उन्होंने चंद्रशेखर की समाजवादी जनता पार्टी के सिंबल पर चुनाव लड़ा और करीब तीन दर्जन सीटें जीतीं। इसके बावजूद मुलायम ने कभी चंद्रशेखर को नेता नहीं माना और 1992 में ही समाजवादी पार्टी बना ली। मुलायम ने आगे चलकर बसपा के साथ मिलकर सरकार बनाई। उन्होंने 1995 में वही दांव मायावती के साथ भी चलने की कोशिश की, लेकिन भाजपा ने मायावती का साथ दे दिया। अखिलेश आज मुलायम का चरखा दांव उन्हीं पर चला रहे हैं।
1991 में जब चुनाव का मौका आया तो मुलायम के पास सिंबल नहीं था। उन्होंने चंद्रशेखर की समाजवादी जनता पार्टी के सिंबल पर चुनाव लड़ा और करीब तीन दर्जन सीटें जीतीं। इसके बावजूद मुलायम ने कभी चंद्रशेखर को नेता नहीं माना और 1992 में ही समाजवादी पार्टी बना ली। मुलायम ने आगे चलकर बसपा के साथ मिलकर सरकार बनाई। उन्होंने 1995 में वही दांव मायावती के साथ भी चलने की कोशिश की, लेकिन भाजपा ने मायावती का साथ दे दिया। अखिलेश आज मुलायम का चरखा दांव उन्हीं पर चला रहे हैं।
अखिलेश के सामने कोई चुनौती नहीं
मुलायम सिंह यादव
- फोटो : amar ujala
वरिष्ठ पत्रकार रतनमणि लाल भी कहते हैं, मुलायम अपनी जमीन तलाशने के लिए दूसरी पार्टियों के नेताओं के साथ जुड़ते और फिर उनके लोगों को मिलाकर अपना रास्ता अलग कर लेते थे। एक समय था जब कोई नेता मुलायम से मिलता था तो लोग कहना शुरू कर देते थे कि मुलायम उनके साथ हैं, उनकी पार्टी में टूट होनी ही है।
रतनमणि कहते हैं, मुलायम 2012 में ममता बनर्जी व अन्य नेताओं के साथ मिलकर डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम को दोबारा राष्ट्रपति बनाने की रणनीति पर काम कर रहे थे, मगर थोडे़ ही दिन बाद पीछे हट गए। ममता बनर्जी आज भी मुलायम को इसके लिए दोषी मानती हैं। इस बार लगता है कि इतिहास खुद को दुहरा रहा है। अखिलेश ने अपनी जगह बनाने के लिए मुख्यमंत्री बनने का जो मौका मिला, उसका भरपूर लाभ उठाया। जब देखा कि पिता के साथ रहकर एक सीमा तक ही पार्टी चला सकते हैं और पार्टी के अधिकतर लोग उनके साथ हैं, तो उन्होंने पार्टी पर अधिकार जमा लिया। आज अखिलेश के सामने कोई चुनौती नहीं है। उनके सामने उनके पिता हैं जो एक सीमा के बाद कुछ नहीं करेंगे, चुप हो जाएंगे।
रतनमणि कहते हैं, मुलायम 2012 में ममता बनर्जी व अन्य नेताओं के साथ मिलकर डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम को दोबारा राष्ट्रपति बनाने की रणनीति पर काम कर रहे थे, मगर थोडे़ ही दिन बाद पीछे हट गए। ममता बनर्जी आज भी मुलायम को इसके लिए दोषी मानती हैं। इस बार लगता है कि इतिहास खुद को दुहरा रहा है। अखिलेश ने अपनी जगह बनाने के लिए मुख्यमंत्री बनने का जो मौका मिला, उसका भरपूर लाभ उठाया। जब देखा कि पिता के साथ रहकर एक सीमा तक ही पार्टी चला सकते हैं और पार्टी के अधिकतर लोग उनके साथ हैं, तो उन्होंने पार्टी पर अधिकार जमा लिया। आज अखिलेश के सामने कोई चुनौती नहीं है। उनके सामने उनके पिता हैं जो एक सीमा के बाद कुछ नहीं करेंगे, चुप हो जाएंगे।