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कोरोना संक्रमण का ग्राफ तो गिरा पर खतरा बरकरार, बढ़ती रिकवरी दर दे रही पीक आने का संकेत
Mon, 05 Oct 2020 12:24 AM IST
लखनऊ ब्यूरो
चंद्रभान यादव/अमर उजाला, लखनऊ
चंद्रभान यादव/अमर उजाला, लखनऊ
Published by: लखनऊ ब्यूरो
Updated Mon, 05 Oct 2020 12:24 AM IST
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प्रतीकात्मक तस्वीर
- फोटो : अमर उजाला
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लखनऊ में कोरोना के संक्रमण का असर कमजोर हो रहा है। आंकड़े बताते हैं कि संक्रमण की दर 15.88 फीसदी से घटकर 5.29 फीसदी पर पहुंच गई है। यानी दर घटकर एक तिहाई रह गई। ये आंकड़े सुकून देते हैं। पर, खतरा अभी टला नहीं है। ये खतरा है वायरस के संक्रमण के सेकंड वेव का।
क्योंकि स्कूल-सिनेमा हॉल खुलने जा रहे हैं। ऐसे में अब और सावधानी बरतनी होगी ताकि सेकंड वेव से बचा जा सके। चिकित्सा विशेषज्ञों का भी यही कहना है कि अगर घटते आंकड़ों के आधार पर सावधानी छोड़ दी तो हालात फिर से बेकाबू हो सकते हैं। आंकड़ों के गिरने के पीछे वजहें क्या हैं, सेकंड वेव को लेकर कैसा खतरा है, बेहतरी के लिए चिकित्सा महकमे की रणनीतियां क्या हैं, पेश हैं चंद्रभान यादव की खास रिपोर्ट...
लखनऊ में संक्रमण की दर घटकर करीब एक तिहाई तक पहुंच गई है। यह चिकित्सा विशेषज्ञों के साथ ही आमजन के लिए बड़ी राहत की बात है। राजधानी में कोरोना केसेज के पीक की बात करें तो 18 सितंबर को 15.88 फीसदी मरीज पॉजिटिव पाए गए। यह एक दिन में लिए गए सैंपल में पॉजिटिव पाए जाने वालों की सबसे ज्यादा दर थी।
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अब पॉजिटिव मरीज मिलने का औसत 5.29 फीसदी पर पहुंच गया है। स्वास्थ्य महकमा 15 अक्तूबर तक इसे 5 फीसदी से नीचे लाने और 15 नवंबर तक 3 फीसदी से नीचे लाने की रणनीति पर काम कर रहा है। इसके लिए हर मरीजों की मॉनिटरिंग करने की योजना बनाई गई है। राजधानी में पहला मरीज 11 मार्च को मिला था। इसके बाद लगातार मरीजों की संख्या बढ़ती रही। पॉजिटिव मिलने वाले मरीजों की दर देखें तो मार्च में 6.9 फीसदी, अप्रैल में 5.59, मई में 3.79, जून में 1.88, जुलाई में 6.17, अगस्त में 10.48 फीसदी रही। लेकिन सितंबर में मरीजों की संख्या में बेतहाशा वृद्धि हुई।
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क्योंकि स्कूल-सिनेमा हॉल खुलने जा रहे हैं। ऐसे में अब और सावधानी बरतनी होगी ताकि सेकंड वेव से बचा जा सके। चिकित्सा विशेषज्ञों का भी यही कहना है कि अगर घटते आंकड़ों के आधार पर सावधानी छोड़ दी तो हालात फिर से बेकाबू हो सकते हैं। आंकड़ों के गिरने के पीछे वजहें क्या हैं, सेकंड वेव को लेकर कैसा खतरा है, बेहतरी के लिए चिकित्सा महकमे की रणनीतियां क्या हैं, पेश हैं चंद्रभान यादव की खास रिपोर्ट...
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लखनऊ में संक्रमण की दर घटकर करीब एक तिहाई तक पहुंच गई है। यह चिकित्सा विशेषज्ञों के साथ ही आमजन के लिए बड़ी राहत की बात है। राजधानी में कोरोना केसेज के पीक की बात करें तो 18 सितंबर को 15.88 फीसदी मरीज पॉजिटिव पाए गए। यह एक दिन में लिए गए सैंपल में पॉजिटिव पाए जाने वालों की सबसे ज्यादा दर थी।
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अब पॉजिटिव मरीज मिलने का औसत 5.29 फीसदी पर पहुंच गया है। स्वास्थ्य महकमा 15 अक्तूबर तक इसे 5 फीसदी से नीचे लाने और 15 नवंबर तक 3 फीसदी से नीचे लाने की रणनीति पर काम कर रहा है। इसके लिए हर मरीजों की मॉनिटरिंग करने की योजना बनाई गई है। राजधानी में पहला मरीज 11 मार्च को मिला था। इसके बाद लगातार मरीजों की संख्या बढ़ती रही। पॉजिटिव मिलने वाले मरीजों की दर देखें तो मार्च में 6.9 फीसदी, अप्रैल में 5.59, मई में 3.79, जून में 1.88, जुलाई में 6.17, अगस्त में 10.48 फीसदी रही। लेकिन सितंबर में मरीजों की संख्या में बेतहाशा वृद्धि हुई।
..तो क्या सितंबर को संक्रमण का पीक माना जा सकता है
प्रतीकात्मक तस्वीर
- फोटो : ANI
राजधानी में लिए गए कुल सैंपल और मरीजों की संख्या का आकलन किया जाए तो 18 सितंबर को पीक माना जा सकता है। हालांकि 10-10 दिन के पैटर्न को देखें तो कहानी थोड़ा अलग नजर आती है। क्योंकि लगातार दस दिन संक्रमण की दर ऊंची रही। विभागीय आंकड़ों के मुताबिक 1 से 10 सितंबर के बीच लिए गए सैंपल में पॉजिटिव केसेज मिलने का औसत 13.74 फीसदी रहा। 11 से 20 सितंबर के बीच औसत दर 11.31 फीसदी पहुंच गई। यानी 18 सितंबर को छोड़ दिया जाए तो अन्य दिन मरीजों के मिलने की संख्या घटी, जिससे औसत नीचे आया।
...और घटने लगी दर
21 सितंबर के बाद मरीजों की संख्या में लगातार गिरावट होनी शुरू हुई। 21 से 30 सितंबर के बीच लिए गए कुल सैंपल में औसतन 6.70 फीसदी पॉजिटिव पाए गए। वहीं अक्तूबर के 3 दिन का आंकड़ा देखें तो औसत दर घटकर 5 फीसदी के आसपास आ गई।
दावा : स्वास्थ्य विभाग की सक्रियता से ग्राफ नीचे आया
गिरते आंकड़ों को लेकर स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी उत्साहित हैं। उनका तर्क है कि वायरस का असर कमजोर हुआ है। एसीएमओ डॉ. केपी त्रिपाठी कहते हैं कि हालात ऐसे ही रहे तो 15 अक्तूबर तक 5 फीसदी से भी नीचे ग्राफ आ जाएगा। संक्रमण की घटती रफ्तार के पीछे वह स्वास्थ्य विभाग की सक्रियता को श्रेय देते हैं। उनका तर्क है कि हर स्तर पर बरती गई सावधानी, एक्टिव मरीजों की तत्काल जांच होने और उनकी निगरानी की वजह से संक्रमण का असर कम हुआ है। कुछ हद तक हर्ड इम्युनिटी भी अहम भूमिका निभा रही है।
...और घटने लगी दर
21 सितंबर के बाद मरीजों की संख्या में लगातार गिरावट होनी शुरू हुई। 21 से 30 सितंबर के बीच लिए गए कुल सैंपल में औसतन 6.70 फीसदी पॉजिटिव पाए गए। वहीं अक्तूबर के 3 दिन का आंकड़ा देखें तो औसत दर घटकर 5 फीसदी के आसपास आ गई।
दावा : स्वास्थ्य विभाग की सक्रियता से ग्राफ नीचे आया
गिरते आंकड़ों को लेकर स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी उत्साहित हैं। उनका तर्क है कि वायरस का असर कमजोर हुआ है। एसीएमओ डॉ. केपी त्रिपाठी कहते हैं कि हालात ऐसे ही रहे तो 15 अक्तूबर तक 5 फीसदी से भी नीचे ग्राफ आ जाएगा। संक्रमण की घटती रफ्तार के पीछे वह स्वास्थ्य विभाग की सक्रियता को श्रेय देते हैं। उनका तर्क है कि हर स्तर पर बरती गई सावधानी, एक्टिव मरीजों की तत्काल जांच होने और उनकी निगरानी की वजह से संक्रमण का असर कम हुआ है। कुछ हद तक हर्ड इम्युनिटी भी अहम भूमिका निभा रही है।
...तो क्या हर्ड इम्युनिटी कर रही है वायरस को कमजोर
प्रतीकात्मक तस्वीर
- फोटो : सोशल मीडिया
क्या संक्रमण की रफ्तार कमजोर होने के पीछे हर्ड इम्युनिटी है? यकीनी तौर पर इसे अभी नहीं कहा जा सकता। क्योंकि सीरो सर्वे के अभी नतीजे नहीं आए हैं। हालांकि स्वास्थ्य विभाग संक्रमण की रफ्तार कमजोर पड़ने के पीछे हर्ड इम्युनिटी को भी एक बड़ा कारण मान रहा है।
अमर उजाला से अनौपचारिक बातचीत में स्वास्थ्य विभाग के कई अधिकारियों ने तर्क दिया कि किसी भी वायरल संक्रमण की दर घटने के पीछे हर्ड इम्युनिटी का बड़ा रोल होता है। कोरोना की गिरती संक्रमण दर में भी इससे इनकार नहीं किया जा सकता। अधिकारी तर्क देते हैं कि अप्रैल में सदर क्षेत्र, मई में ऐशबाग क्षेत्र में सर्वाधिक मरीज पाए गए थे।
जुलाई और अगस्त में इस इलाके में मरीज नहीं पाए गए। इसी तरह अगस्त में गोमती नगर, टुड़ियागंज, इंदिरा नगर जैसे इलाके में सर्वाधिक मरीज पाए जा रहे थे। इन इलाकों में 15 सितंबर के बाद मरीजों की संख्या में गिरावट होने लगी। अक्तूबर के पहले सप्ताह में गोमती नगर, इंदिरा नगर जैसे इलाकों में मरीजों की संख्या गिरी है।
अब अलीगंज और उससे लगे विकास नगर जैसे इलाकों में संक्रमितों की संख्या बढ़ रही है। स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी अनौपचारिक बातचीत में इससे भी इनकार नहीं करते कि तमाम ऐसे लोग जाने-अनजाने पॉजिटिव हो चुके हैं जिनकी जांच नहीं की गई। ऐसे में करीब 40 से 50 फीसदी तक आबादी पॉजिटिव हो चुकी है। जो हर्ड इम्युनिटी लाने में कारगर साबित हो रही है। हालांकि सीरो सर्वे के जब तक नतीजे नहीं जारी हो जाते तब तक इस दिशा में यकीनी तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता।
अमर उजाला से अनौपचारिक बातचीत में स्वास्थ्य विभाग के कई अधिकारियों ने तर्क दिया कि किसी भी वायरल संक्रमण की दर घटने के पीछे हर्ड इम्युनिटी का बड़ा रोल होता है। कोरोना की गिरती संक्रमण दर में भी इससे इनकार नहीं किया जा सकता। अधिकारी तर्क देते हैं कि अप्रैल में सदर क्षेत्र, मई में ऐशबाग क्षेत्र में सर्वाधिक मरीज पाए गए थे।
जुलाई और अगस्त में इस इलाके में मरीज नहीं पाए गए। इसी तरह अगस्त में गोमती नगर, टुड़ियागंज, इंदिरा नगर जैसे इलाके में सर्वाधिक मरीज पाए जा रहे थे। इन इलाकों में 15 सितंबर के बाद मरीजों की संख्या में गिरावट होने लगी। अक्तूबर के पहले सप्ताह में गोमती नगर, इंदिरा नगर जैसे इलाकों में मरीजों की संख्या गिरी है।
अब अलीगंज और उससे लगे विकास नगर जैसे इलाकों में संक्रमितों की संख्या बढ़ रही है। स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी अनौपचारिक बातचीत में इससे भी इनकार नहीं करते कि तमाम ऐसे लोग जाने-अनजाने पॉजिटिव हो चुके हैं जिनकी जांच नहीं की गई। ऐसे में करीब 40 से 50 फीसदी तक आबादी पॉजिटिव हो चुकी है। जो हर्ड इम्युनिटी लाने में कारगर साबित हो रही है। हालांकि सीरो सर्वे के जब तक नतीजे नहीं जारी हो जाते तब तक इस दिशा में यकीनी तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता।
विशेषज्ञों का तर्क
प्रतीकात्मक तस्वीर
- फोटो : Pixabay
पीक पर पहुंचने पर रिकवरी दर बढ़ती है और मरीजों की संख्या में स्थिरता आती है
राजधानी में एक तरफ मरीजों के मिलने की दर में स्थिरता आई है तो दूसरी तरफ रिकवरी की दर में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। तो क्या इस लिहाज से भी इस दौर को संक्रमण का पीक माना जा सकता है? बहरहाल चिकित्सा विशेषज्ञ ऐसा ही मान रहे हैं। ऐसे में एक सवाल सबके मन में उठ रहा है कि वायरस से मुक्त होने में कितना समय लगेगा। बहरहाल विशेषज्ञों का कहना है कि इस पर अभी पुख्ता तौर पर कुछ भी नहीं कहा जा सकता है।
राजधानी में रिकवरी की दर में भी लगातार बढ़ोतरी होने को चिकित्सा विशेषज्ञ सकारात्मक रूप में लेते हुए पीक सीजन मान रहे हैं। रिकवरी दर देखें तो 30 अगस्त को रिकवरी दर 71.48 फीसदी थी। यह 10 सितंबर को 73.91 फीसदी, 20 सितंबर को 78.72 फीसदी और 30 सितंबर को 87.09 फीसदी पर पहुंच गई।
आखिर पीक है क्या...
लोहिया संस्थान के कोविड हॉस्पिटल के नोडल प्रभारी डॉक्टर पीके दास इस सवाल पर कहते हैं कि जब मरीजों के मिलने की दर गिरने लगती है और रिकवरी दर बढ़ जाती है तो उसे पीक माना जाता है। पीक का मतलब होता है कि नए मामलों में स्थिरता आ जाना। नए मामलों के मिलने का सिलसिला लगातार गिरता रहे तो उसे पीक की श्रेणी में लिया जाता है। पिछले कुछ दिनों के आंकड़ों को देखें तो लगातार पॉजिटिव मरीजों की संख्या में गिरावट आई है।
राजधानी में एक तरफ मरीजों के मिलने की दर में स्थिरता आई है तो दूसरी तरफ रिकवरी की दर में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। तो क्या इस लिहाज से भी इस दौर को संक्रमण का पीक माना जा सकता है? बहरहाल चिकित्सा विशेषज्ञ ऐसा ही मान रहे हैं। ऐसे में एक सवाल सबके मन में उठ रहा है कि वायरस से मुक्त होने में कितना समय लगेगा। बहरहाल विशेषज्ञों का कहना है कि इस पर अभी पुख्ता तौर पर कुछ भी नहीं कहा जा सकता है।
राजधानी में रिकवरी की दर में भी लगातार बढ़ोतरी होने को चिकित्सा विशेषज्ञ सकारात्मक रूप में लेते हुए पीक सीजन मान रहे हैं। रिकवरी दर देखें तो 30 अगस्त को रिकवरी दर 71.48 फीसदी थी। यह 10 सितंबर को 73.91 फीसदी, 20 सितंबर को 78.72 फीसदी और 30 सितंबर को 87.09 फीसदी पर पहुंच गई।
आखिर पीक है क्या...
लोहिया संस्थान के कोविड हॉस्पिटल के नोडल प्रभारी डॉक्टर पीके दास इस सवाल पर कहते हैं कि जब मरीजों के मिलने की दर गिरने लगती है और रिकवरी दर बढ़ जाती है तो उसे पीक माना जाता है। पीक का मतलब होता है कि नए मामलों में स्थिरता आ जाना। नए मामलों के मिलने का सिलसिला लगातार गिरता रहे तो उसे पीक की श्रेणी में लिया जाता है। पिछले कुछ दिनों के आंकड़ों को देखें तो लगातार पॉजिटिव मरीजों की संख्या में गिरावट आई है।
इस तरह बढ़ता रहा ग्राफ
कोरोना वायरस (प्रतीकात्मक तस्वीर)
- फोटो : PTI
राजधानी की स्थिति देखें तो यहां 1 जून तक 429 मरीज थे। करीब 20 दिन बाद यह संख्या बढ़कर 800 पहुंच गई। इसी तरह लगातार मरीजों के दोगुना होने का ग्राफ 20 दिन के अंदर रहा, लेकिन 29 अगस्त के बाद आंकड़े दोगुना होने में पूरे 30 दिन लग गए। इस तरह कुल संक्रमितों का आंकड़ा 52 हजार के पार पहुंचा
01 जून : 429
21 जून : 863
7 जुलाई : 1648
17 जुलाई : 3299
27 जुलाई : 6612
10 अगस्त : 13391
29 अगस्त : 26034
30 सितंबर : 52025
एंटीजन हो या आरटीपीसीआर, सभी तरह की जांचों में गिरी दर
कोरोना की जांच पद्धतियों के नजरिए से भी देखें तो संक्रमण की दर गिरी है। पद्धति के हिसाब से आकलन करना इसलिए जरूरी है कि तर्क दिए जा रहे थे कि वायरल लोड कम होने पर एंटीजन पद्धति में संक्रमित पकड़ में नहीं आ पाते।
इन दिनों राजधानी में 70 फीसदी जांचें एंटीजन विधि से हो रही हैं। बची 30 फीसदी में ट्रूूनेट और आरटीपीसीआर पद्धतियां शामिल हैं।
इन पद्धतियों से हुई जांचों के आंकड़ों को देखें तो 29 जुलाई को एंटीजन से हुई जांच में पॉजिटिव मरीजों के मिलने का औसत 5.28 फीसदी था। 15 सितंबर को 2.85 फीसदी तो 29 सितंबर को यह दर गिरकर 1.89 फीसदी पर पहुंच गई। इसी तरह आरटीपीसीआर पद्धति से की गई जांचों में मरीजों के मिलने की दर अगस्त में जहां औसत 10.48 फीसदी थी वह सितंबर में घटकर 5.8 फीसदी पर पहुंच गई।
01 जून : 429
21 जून : 863
7 जुलाई : 1648
17 जुलाई : 3299
27 जुलाई : 6612
10 अगस्त : 13391
29 अगस्त : 26034
30 सितंबर : 52025
एंटीजन हो या आरटीपीसीआर, सभी तरह की जांचों में गिरी दर
कोरोना की जांच पद्धतियों के नजरिए से भी देखें तो संक्रमण की दर गिरी है। पद्धति के हिसाब से आकलन करना इसलिए जरूरी है कि तर्क दिए जा रहे थे कि वायरल लोड कम होने पर एंटीजन पद्धति में संक्रमित पकड़ में नहीं आ पाते।
इन दिनों राजधानी में 70 फीसदी जांचें एंटीजन विधि से हो रही हैं। बची 30 फीसदी में ट्रूूनेट और आरटीपीसीआर पद्धतियां शामिल हैं।
इन पद्धतियों से हुई जांचों के आंकड़ों को देखें तो 29 जुलाई को एंटीजन से हुई जांच में पॉजिटिव मरीजों के मिलने का औसत 5.28 फीसदी था। 15 सितंबर को 2.85 फीसदी तो 29 सितंबर को यह दर गिरकर 1.89 फीसदी पर पहुंच गई। इसी तरह आरटीपीसीआर पद्धति से की गई जांचों में मरीजों के मिलने की दर अगस्त में जहां औसत 10.48 फीसदी थी वह सितंबर में घटकर 5.8 फीसदी पर पहुंच गई।