‘प्लूरल एम्पायमा’ यानी फेफड़े में मवाद भरने की बीमारी का खतरा उन लोगों में भी होने लगा है, जो टीबी की दवा बीच में छोड़ देते हैं। इस बीमारी में फेफड़े की सर्जरी तक करनी पड़ती है। शुरुआती दौर में इलाज शुरू नहीं होने पर मरीज की जान जाने का भी खतरा रहता है। केजीएमयू के सर्जरी विभाग में पूरे यूपी के मरीज आते हैं। पल्मोनरी सर्जन प्रो. सुरेश कुमार की हर सप्ताह की ओपीडी में क रीब 500 मरीज आते हैं। इसमें 70 फीसदी से ज्यादा प्लूरल एम्पायमा के मरीज होते हैं। इन मरीजों में टीबी से प्रभावित होकर प्लूरल एम्पायमा से ग्रसित होने वाले मरीजों की संख्या करीब 40 फीसदी से ज्यादा होती है।ज्यादातर मरीज ऐसे होते हैं, जिन्हें दवा से बचाना मुश्किल होता है। ऐसे में उनकी सर्जरी करनी पड़ती है। प्रो. सुरेश कुमार के मुताबिक, टीबी से ग्रसित होने वाले मरीजों में ज्यादातर गरीब होते हैं, जिनता कुपोषण का स्तर काफी गंभीर होता है। ऐसे में इनकी रिकवरी बहुत धीमी रहती है।
टीबी के इलाज के दौरान बीच में न छोड़े दवाई, हो सकता है खतरनाक
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टीबी में लापरवाही से हुई दूसरी बीमारी
जौनपुर निवासी हाईस्कूल में पढ़ने वाले किशोर को टीबी होने पर चार माह दवा दी गई। फिर छोड़ दिया। कभी कभार खांसी आने पर परिवार ने सोचा सर्दी-जुकाम है। सीने में दर्द की भी अनदेखी की। एक दिन स्कूल में खेलते वक्त वह गिरा और सीने में तेज दर्द उठा। खांसने पर कफ के साथ खून निकला। जिला अस्पताल में फेफडे़ में पस होने का पता चला। वे किशोर को लेकर करीब 180 किमी. दूर केजीएमयू आए। यहां करीब माहभर भर्ती रहा। नली लगाकर पस निकाली गई। अब फिर से टीबी के साथ ही एम्पायमा की दवाएं चलाई जा रही हैं। समय से केजीएमयू आने की वजह से बिना सर्जरी वह ठीक हो गया। लेकिन उसकी पढ़ाई प्रभावित हुई और परिवार की आर्थिक स्थिति पर भी बुरा असर पड़ा।
चित्रकूट निवासी 60 साल के वृद्ध पत्थर तोड़ने वाले क्रेशर में काम करते थे। उन्हें एमडीआर टीबी हो गई। दवाएं चल रही थी। अचानक बुखार रखने लगा। सीने में दर्द के साथ ही सांस लेने में दिक्कत हुई। वजन घटने के साथ ही खांसी के साथ खून निकलने लगा। जिला अस्पताल से रेफर होकर करीब 300 किमी दूर केजीएमयू पहुंचे। फेफड़े में नली लगाकर पस निकाली गई, लेकिन सर्जरी करनी पड़ी। अब सुधार है। अभी उन्हें अस्पताल में ही रखा गया है। यहां एम्पायमा के साथ ही टीबी की दवाएं भी चलाई जा रही हैं। इलाज की वजह से उनके परिवार की आर्थिक स्थिति प्रभावित हुई।
एमडीआर टीबी के मरीजों को ज्यादा खतरा
प्रो. सुरेश कुमार ने बताया कि प्लूरल एम्पायमा की प्रमुख वजह निमोनिया है, टीबी दूसरे नंबर पर है। इसके अलावा फेफड़े में चोट लगने पर संक्रमण होने से भी होता है। तीनों तरह से प्लूरल एम्पायमा में अलग-अलग इलाज किया जाता है। मल्टी ड्रग रेजिस्टेंट (एमडीआर) टीबी वाले मरीजों को एम्पायमा का खतरा ज्यादा होता है। ऐसे में टीबी की दवाओं के साथ ही एम्पायमा की दवाएं भी जोड़ दी जाती हैं। गंभीर मरीजों की सर्जरी होती है। शुरुआती दौर में इसका इलाज जिला अस्पताल और टीबी अस्पताल में हो सकता है, लेकिन गंभीर मरीजों को केजीएमयू रेफर किया जाता है। टीबी के साथ एम्पायमा हो गया है तो स्थिति गंभीर है। ऐसे में हाई प्रोटीन डाइट लेने की जरूरत होती है। सब्जी, दालें, सलाद, फलाहार, दूध और इससे बनी चीजें, अंडे, मांस का भरपूर सेवन करना होता है।
शुरुआती चरण में दूरबीन से होती है सर्जरी
सर्जरी विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. संजीव कुमार ने बताया कि फेफड़े की झिल्ली में पानी भर गया है तो उसे सफाई से निकाला जाए। फ्लूड का एनालिसिस जरूरी है ताकि पता चल सके कि टीबी, कैंसर या अन्य कोई बीमारी तो नहीं है। दवा के साथ मरीज को स्वच्छ वातावरण में रखना जरूरी है। यदि एम्पायमा छह हफ्ते से आठ हफ्ते के बीच है तो दूरबिन से सर्जरी हो जाती है, लेकिन इससे ज्यादा वक्त होने पर ओपेन सर्जरी (छाती खोलकर) करनी पड़ती है। ग्रामीण इलाके के मरीज विशेषज्ञ तक देर से पहुंचते हैं। वे झोलाछाप या फिजीशियन से इलाज कराते रहते हैं। कुछ तो झाड़-फूंक में फंसे रहते हैं। ऐसे में मर्ज बढ़ता रहता है। फेफड़ा खोखला हो जाता है। मरीज जल्दी आ जाएं तो एंटीबायोटिक्स व अन्य दवाओं से उन्हें ठीक किया जा सकता है।