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कहानी में खुद चुनती हूं अपना शहर, लोग और गली-मोहल्ले : नासिरा शर्मा

Mon, 16 Dec 2024 02:39 AM IST
लखनऊ ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, लखनऊ
संवाद न्यूज एजेंसी, लखनऊ Updated Mon, 16 Dec 2024 02:39 AM IST
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I choose my own city, people and streets in my story: Nasira Sharma
मेटाफर में बोलतीं नासिरा शर्मा।
लखनऊ। जलसा लॉन में आयोजित एक सत्र ‘नासिरा का पारिजात’ में मशहूर लेखिका नासिरा शर्मा से प्रीति चौधरी ने बातचीत की। 2016 में साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त उपन्यास पारिजात के बारे में लेखिका ने खुलकर अपनी बात रखी।
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उन्होंने बताया कि हुसैनी ब्राह्मण रोहन दत्त इस कहानी का नायक है और इसमें इलाहाबाद व लखनऊ के दृश्यों के साथ ही यहां की रिवायत, त्योहाराें व इमारतों के माध्यम से संस्कृति की झलक भी दिखती है। बातचीत के दौरान नासिरा शर्मा ने बताया कि मैं अपनी कहानी के लिए अपना शहर खुद चुनती हूं, वहां के लोगों, इमारतों, गली-मोहल्लों का चुनाव भी खुद करती हूं। हंसते हुए बोलीं, वस्तुत: मैं बहुत अच्छी आर्किटेक्ट हूं। कहानी में पुरुष प्रधान पात्र पर नासिरा शर्मा ने कहा कि साहित्यकार जब कहानी लिखता है तो वह पीड़ित के साथ ही खड़ा होता है, इस कहानी में भी ऐसा ही है।
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इस्लाम में मुताह पर भी उन्होंने खुलकर अपनी बात कही। कहा, इस्लाम को वे ही बदनाम करते हैं जो इसे जानते नहीं हैं। उन्होंने अरब के कानूनों और संस्कृति के साथ ही भारतीयों के साथ वहां पर व्यवहार को लेकर भी अपनी राय रखी। उन्होंने कहा कि जब पिछली बार लखनऊ आई थी तो यहां रास्ते में हाथी ही हाथी दिखते थे, लेकिन अब शहर बहुत बदल गया है। बोलीं - मेरे लिए इलाहाबाद यथार्थ है तो लखनऊ एक ख्वाब।
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पासवर्ड तो याद रखते हैं, पड़ोसी को भूल रहे हैं...
लखनऊ। व्यंग्य को समर्पित सत्र छींटाकशी में के. कांत अस्थाना, पंकज प्रसून, इंद्रजीत कौर और अलंकार रस्तोगी ने अपने हास्य-व्यंग्य से श्रोताओं को खूब हंसाया और चिंतन पर भी मजबूर किया। अलंकार रस्तोगी ने लोकतंत्र में गधे की भूमिका पर व्यंग्य सुनाया तो वहीं कौए की कहानी के जरिये वर्तमान राजनीति पर भी कटाक्ष किया। के. कांत अस्थाना ने अपने व्यंग्य के जरिये स्वास्थ्य सेवाओं पर कटाक्ष किया। कहा- जूनियर डॉक्टर की लापरवाही से मरीज मर जाता है, नर्स सीधे मुंह बात नहीं करती और सीनियर डॉक्टर सिर्फ जांचें लिखता है। इंद्रजीत कौर ने सुनाया - जाड़ा, गर्मी, बरसात के अलावा भी एक मौसम होता है और वह है चुनावी मौसम। संचालन कर रहे पंकज प्रसून ने वर्तमान परिदृश्य पर पढ़ा-

सोशल मीडिया के झूले में हम इस तरह झूल रहे हैं।
पासवर्ड तो याद रखते हैं, पड़ोसी को भूल रहे हैं।



जीवन और साहित्य में निरर्थक हास्य पर चर्चा
लखनऊ। एक सत्र के दौरान साहित्य और जीवन में थोड़ा सा निरर्थक हास्य को लेकर नीलम सरन गौर, जेरी पिंटो और कार्लाइल ए. मैक्फॉलैंड ने चर्चा की। वक्ताओं ने कहा कि चाहे जीवन में हो या साहित्य और सोशल मीडिया पर लेकिन हास्य ऐसा होना चाहिए जिससे किसी का मन न दुखे और न ही उसे कोई ठेस पहुंचे।
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