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लखनऊ में 1971 की बाढ़ के दौरान नगर प्रमुख ने अटैची में बंद किया जहरीला सांप

Sat, 18 Nov 2017 10:48 AM IST
अखिलेश वाजपेयी/ अमर उजाला ब्यूरो
अखिलेश वाजपेयी/ अमर उजाला ब्यूरो Updated Sat, 18 Nov 2017 10:48 AM IST
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Historical stories of Lucknow local body election by Akhilesh vajpai
सांप को पकड़े दाऊजी गुप्ता।

राजनेता आज भले ही आपदा में खुद की भूमिका निरीक्षण, निर्देश और सरकारी मशीनरी को हिदायत तक सीमित रखते हों लेकिन एक वक्त ऐसा भी था जब नेता खुद आपदा में फंसे लोगों को बचाने और उन्हें मदद पहुंचाने के काम में आगे रहते थे।

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राजधानी के नगर प्रमुख रहे डॉ. दाऊजी गुप्त अतीत के जो प्रसंग बताते हैं उससे यही पता चलता है। उनके अनुसार, 1971 में गोमती में जबरदस्त बाढ़ आई थी। हजरतगंज तक नावें चल रही थीं। गोमती किनारे स्थित आज की मोतीमहल बिल्डिंग का आधे से ज्यादा हिस्सा बाढ़ के पानी में डूब गया था।
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उसी दौरान एक वक्त ऐसा भी आया कि जब लगा कि लखनऊ डूबने से अब नहीं बचेगा। पर, इलाहाबाद के गांव में रहने वाले एक मिस्त्री ने तमाम काबिल इंजीनियरों की बुद्धि को अंगूठा दिखाते हुए अपने हुनर से लखनऊ को बाढ़ में तबाह होने से बचा लिया। एक बार तो उन्होंने खुद करैत जैसे विषैले सांप को पकड़कर लोगों को जान बचाई।

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न जाने फिर क्या होता

Historical stories of Lucknow local body election by Akhilesh vajpai
flood - फोटो : amarujala
डॉ. दाऊ जी बताते हैं कि बाढ़ के दौरान एक दिन वह गऊघाट (ठाकुरगंज के पास) की तरफ बाढ़ में घिरे लोगों को निकालने और मदद पहुंचाने जा रहे थे। नदी के किनारे पहुंचे तो अचानक लोग चिल्लाए, सांप-सांप! बकौल दाऊ जी, ‘देखा, करैत सांप है और हमारे पैर के पास ही है। अगल-बगल भी नदी का पानी उफान मार रहा था और सामने भी पानी ही पानी था। नदी में एक नाव भी किनारे पर आ चुकी थी।

उस पर कई लोगों के साथ बाढ़ में घिरे लोगों को निकालकर ला रहे पूर्व मंत्री कैलाश प्रकाश भी बैठे थे। किसी के लिए इधर-उधर जाने का कोई मौका नहीं था। लोग पीछे भागते तो सांप दौड़ाता और अगल-बगल जा नहीं सकते थे। उधर, सामने नाव पर बैठे लोग भी डर के कारण चीख-पुकार मचाने लगे। नाव डगमगा रही थी। चिल्लाकर सभी को चुप रहने को कहा। कोबरा से ज्यादा विषैला सांप हम लोगों के सामने मौत बनकर आ गया था। 

पढ़ाई के दौरान सीखी विधा आई काम 

Historical stories of Lucknow local body election by Akhilesh vajpai
snake
पर, सांप को पकड़ने के लिए पढ़ाई के दिनों की विधा हमारे काम आई। लखनऊ विश्वविद्यालय में बी.काम और एम.काम की पढ़ाई के दौरान मैं भी ‘एंथ्रोपोलॉजी’ के छात्रों के साथ एक महीने के कैंप पर झरिया, वाल्दा, सिंह भूमि, रांची, शिमोगा, झुमरी तलैया के आदिवासी इलाकों में जाया करता था। चूंकि इन आदिवासी इलाकों में सांप की एक से एक जहरीली प्रजातियां पाई जाती हैं। इसलिए वहां आदिवासियों के बीच इन्हें पकड़ने की कला भी सीख ली थी।’

दाऊ जी चुटकी लेते हुए बताते हैं कि करैत सांप काफी विषधर होने के बावजूद काइंयां नहीं बल्कि काफी मासूम होते हैं। बकौल दाऊ जी, ’मैने सांप की नजरों से नजर मिलाईं और जैसे ही वह मेरी तरफ बढ़ा तो मैं बाईं तरफ चला गया। यहां बता दें कि सांप के लिए बाईं तरफ घूमना थोड़ा मुश्किल होता है। वह सुस्त पड़ जाता है। जैसे ही सुस्त हुआ वैसे ही मैने तेजी से उसकी गरदन पकड़ी और अंगूठे से टेटुआ (मुंह से नीचे और गरदन के बीच का हिस्सा) दबा दिया। वह निढाल हुआ तो उसे साथ में कागज रखने वाली अटैची में डालकर बंद कर दिया। अगले दिन उसे चिड़ियाघर को सौंप दिया। वह करैत सांप काफी दिनों तक चिड़ियाघर में रहा।’

तमाम इंजीनियर भी नहीं खोल सके बैराज का गेट

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गोमती ‌नदी - फोटो : demo pic
दाऊ जी ही बताते हैं कि बाढ़ में गोमती का जलस्तर तेजी से बढ़ रहा था। हजरतगंज, राणा प्रताप मार्ग, स्टेडियम और डालीबाग के इलाके में घरों की एक-एक मंजिल डूबी हुई थी। नावें चल रही थीं। एक ही उपाय था कि गोमती बैराज को पूरी तरह खोल दिया जाए जिससे गोमती का जलस्तर घटे। तमाम विभागों से लेकर सेना के तमाम इंजीनियर प्रयास कर चुके थे। पर, गेट खोले नहीं जा सके थे। इंजीनियर परेशान, उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि कहां से और कैसे बैराज के गेटों को खोला जाए।

दाऊ जी बताते हैं, ‘मैने वाटर वर्क्स के इंजीनियरों से पूछा कि गेट कौन खोलता और बंद करता था। बताया गया कि एक मिस्त्री था। वही यह काम करता था। पर, तीन महीने पहले वह रिटायर हो चुका है। एक कर्मचारी ने बताया कि वह इस समय इलाहाबाद के झूंसी के पास एक गांव में रहता है। मैने तय किया कि उसे लाया जाए। उसे पहचानने वाले कर्मचारी को गाड़ी में बैठाया और साथ लेकर इलाहाबाद गया। दिन भर गाड़ी से चलकर वहां पहुंचा। गांव तलाशा और उसे ढूंढा गया। 

तब एक मिस्त्री ने लखनऊ को डूबने से बचाया 

Historical stories of Lucknow local body election by Akhilesh vajpai
गोमती र‌िवर फ्रंट - फोटो : amar ujala
रात हो गई थी। पर, संकट यह था कि जल्द ही बैराज न खुला तो लखनऊ तबाह हो जाएगा। मिस्त्री का नाम संभवत: मो. नदीम था। उसे साथ बैठाया और सुबह होते-होते फिर लखनऊ पहुंचा। उसे लेकर बैराज पर गए। सेना के गोताखोरों ने उसे गोताखोरी वाले कपड़े पहनाए। उसने दो-तीन हथौड़ी अपने शरीर से मजबूती के साथ बांधी। गोताखोरों को ऊपर से वह जगह दिखाई जहां पहुंचना था।’ बकौल दाऊ जी, हमारी सांस ऊपर की ऊपर और नीचे की नीचे। स्वीमिंग और रोविंग में मैं हालांकि विश्वविद्यालय के दिनों में कैप्टन रह चुका था। पर, गोमती का विकराल रूप हमें भी डरा रहा था कि इतनी विकराल स्थिति में अगर मिस्त्री के साथ कोई अनहोनी हो गई तो क्या होगा? पर, मिस्त्री ने शायद मेरे चेहरे का भाव पढ़ लिया था। वह बोला, ‘परेशान न होइए, अभी थोड़ी देर में सब ठीक हो जाएगा। ऊपर वाला सबका मालिक है।’ फिर गोताखोर उसे साथ लेकर नदी में गए और पानी के नीचे उसे ले जाकर उस जगह पर पहुंचाया जहां ताले लगे हुए थे। नदीम ने हथौड़ी से ताले तोड़ दिए। गेट खुले और गोमती का पानी शहर की सीमा से बाहर निकला।

पूर्व महापौर को बाढ़ से बचाया था महापौर ने

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गोमती र‌िवर फ्रंट - फोटो : amar ujala
नगर निगम के एक पूर्व अधिकारी बताते हैं कि राजधानी के छठे नगर प्रमुख ओम नारायण बंसल, राणा प्रताप मार्ग के बगल में ‘वे’ रोड पर रहते थे। बाढ़ का पानी उनके घर की एक मंजिल तक पहुंच चुका था। इसकी खबर उस समय के नगर प्रमुख डॉ. दाऊ जी को चली। डॉ. दाऊ जी ने बंसल जी के घर चलने को कहा। उस समय कोई नाव चलाने वाला नहीं था। कहा गया कि कोई मल्लाह आ जाए तो चलिये। उन्होंने कहा कि वह खुद भी अच्छी तरह से नाव चलाना जानते हैं। हजरतगंज पहुंचकर खुद नाव संभाली और उसे चलाकर बंसल के घर पर पहुंचे। उन्होंने उनके परिवार के लोगों को नाव पर बैठाया और जरूरी सामान रखा तथा सबको साथ लेकर निकालकर लाए और बेनी प्रसाद हलवासिया के घर पर पहुंचाया। हलवासिया उनके रिश्तेदार थे। 
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