'दुष्कर्म और हत्या की सुध नहीं लेती सरकार'
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
छोटे मामलों में अभियुक्तों को बरी किए जाने के खिलाफ या उनकी सजा बढ़ाए जाने के लिए स्टेट अपीलों को लेकर हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने सख्त रुख अख्तियार किया है।
कोर्ट ने कहा कि हत्या व दुष्कर्म के गंभीर मामलों में तो अपील दाखिल नहीं की जाती जबकि कम सजा वाले मामलों में सजा बढ़ाने के लिए स्टेट अपील दाखिल कर दी जाती है। सरकार की तरफ से ‘रूटीन’ की तरह अपीलें दाखिल नहीं की जानी चाहिए।
हाईकोर्ट ने यह तल्ख टिप्पणी लखीमपुरी खीरी जिले के एक मामले में राज्य सरकार की तरफ से दायर की गई अपील पर किया। इसमें अभियुक्तों को सुनाई गई सजा बढ़ाए जाने की गुजारिश की गई थी।
लखीमपुर खीरी की सत्र अदालत ने 16 जुलाई 2014 को गंभीर चोट पहुंचाने के आरोप में अभियुक्तों श्रीधर व अन्य को दो-दो साल के कठोर कारावास के साथ एक-एक हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी।
इसमें सरकार की तरफ से अधिवक्ता ने कहा कि यह हत्या के प्रयास का मामला बनता है और सुनाई गई सजा पर्याप्त नहीं हैं लिहाजा इसे बढ़ाया जाना चाहिए।
अदालत ने कहा कि ट्रायल कोर्ट की ऐसी कोई ‘फाइंडिंग्स’ नहीं हैं कि अभियुक्तों द्वारा पहुंचाई गईं चोटें जानलेवा थीं। घटना 9 अप्रैल 2008 की है, जिसमें दो साल की सजा सुनाई गई है।
अदालत ने जताया आश्चर्य
कोर्ट ने कहा कि पहले ही अदालत दो अन्य मामलों में स्टेट अपील दाखिल करने की प्रक्रिया को संशोधित करने के निर्देश दे चुकी है। कोर्ट को बताया गया कि इससे संबंधित आदेश जारी हो चुके हैं और इलाहाबाद हाईकोर्ट में इनका पालन हो रहा है।
अदालत ने इस पर आश्चर्य जताया कि लखनऊ बेंच में अब तक इसे लागू नहीं किया गया है। कोर्ट ने इस आदेश को प्रमुख सचिव (विधि) और प्रमुख सचिव गृह को भेजने के निर्देश दिए हैं, जो इसकी पालन रिपोर्ट पेश करेंगे।
सरकारी वकीलों के मेरिट पर पूरी तरह से गौर करने और उनकी मंजूरी के बाद ही अपील करने का फैसला किया जाना चाहिए। इससे कोर्ट का कीमती समय बर्बाद होने से बचेगा साथ ही हाईकोर्ट में लंबित अपीलों को बड़ी तादात में कमी आएगी।
लखनऊ बेंच में शासकीय अधिवक्ता रिशाद मुर्तजा ने अदालत को बताया कि ‘स्टेट अपीलें’ दाखिल करते समय इस आदेश का पालन किया जा रहा है।
इसके प्रकाश में संबंधित सरकारी वकीलों को निर्देश दिए गए हैं। प्रस्तावित स्टेट अपीलों पर सम्यक् गौर करने के बाद ही दाखिल करने का निर्णय लिया जाएगा।