बहू को अनुकंपा नियुक्ति न देने पर हाईकोर्ट की कड़ी टिप्पणी, 'बहू के मुकाबले बेटी का हक ज्यादा कैसे?'
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‘अनुकंपा नियुक्ति परिवार की वित्तीय जरूरतों को पूरा करने के लिए दी जाती है। पति की मृत्यु के बाद बहू परिवार का हिस्सा न रहे, ऐसा नहीं होता। पति की मृत्यु के बाद बहू का अपने माता-पिता के साथ रहने चले जाना हमारे सभ्य समाज में घृणित माना गया है। ऐसी बहुओं को पूरा अधिकार है कि उन्हें परिवार का हिस्सा मानते हुए अनुकंपा पर नियुक्ति के लिए विचार में रखा जाए जहां वे अपनी पति के परिवार के साथ रह रही हैं।’
इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने ये महत्वपूर्ण निष्कर्ष एक ऐसी याचिका की सुनवाई के दौरान दिए, जिसमें परिवार के तीन पुरुषों की मृत्यु हो चुकी थी। हाईकोर्ट ने सरकार से अपेक्षा जताई कि वह विधवा बहू और विधवा बेटी को अनुकंपा में नौकरी के लिए बराबर मानने के लिए उचित कदम उठाए।
यह मामला पूर्वोत्तर रेलवे के लखनऊ मंडल में टेक्नीशियन ग्रेड 3 कर्मचारी मुन्नालाल बाजपेयी से जुड़ा है, जिनकी सेवाकाल के दौरान 8 जनवरी 2012 को मृत्यु हो गई थी। उनके दो बेटे थे, दोनों की भी मौत हो चुकी थी। परिवार में उनकी पत्नी सुशीला बाजपेयी, बड़े बेटे स्व. संतोष की पत्नी अनामिका और छोटे बेटे स्व. अखिलेश की पत्नी रंजीता बाजपेयी हैं। चूंकि परिवार में कोई रोजी-रोटी कमाने वाला नहीं बचा, इसलिए मुन्नालाल के स्थान पर नौकरी के लिए रंजीता ने आवेदन किया।
अप्रैल 2012 में पूर्वोत्तर रेलवे के मंडल कार्मिक अधिकारी ने इस आवेदन को खारिज कर दिया। इसके बाद रंजीता ने सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (कैट) में अपील की। कैट ने 18 मार्च 2016 को अपील स्वीकार करते हुए कार्मिक अधिकारी के आदेश को रद्द कर दिया। साथ ही आदेश दिया कि अपनी अगली चयन समिति बैठक में रंजीता को अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति देने पर विचार किया जाए। कैट के इस आदेश के खिलाफ पूर्वोत्तर रेलवे के जीएम ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर दी।
कैट के आदेश का पालन क्यों नहीं करते : हाईकोर्ट
सुनवाई के दौरान जस्टिस अनिल कुमार और जस्टिस रेखा दीक्षित ने कहा कि पूर्वोत्तर रेलवे ने ट्रिब्यूनल के निर्णय का बिना पालन किए उसे याचिका में चुनौती दी है। याचिका लंबित रहने के दौरान भी जब तक कोर्ट कोई निर्णय न करे, ऐसी कोई वजह नहीं है कि रेलवे आदेश का पालन न करे।
पूर्वोत्तर रेलवे का तर्क : पति-पत्नी या पुत्र-पुत्री ही नौकरी के हकदार
पूर्वोत्तर रेलवे ने अपने तर्क में कहा कि उसकी नियुक्ति समिति ने अगस्त 2016 में रेलवे बोर्ड के निदेशक स्थापना को उचित कार्रवाई के लिए निर्देश दिए थे, जिन्होंने दिसंबर 2016 में आगे आदेश जारी किए। चयन समिति ने मार्च 2017 में इस पर निर्णय लिया। मंडल कार्मिक अधिकारी लखनऊ ने यह निर्णय संबंधित परिवार को बताया। उन्होंने बताया कि महालेखाकार से जुड़े एक मामले में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व में दिए निर्णय के अनुसार पति-पत्नी या पुत्र-पुत्री के अलावा कर्मचारी के अन्य आश्रितों को अनुकंपा पर नौकरी नहीं दी जा सकती।
मौजूदा मामले में रेलवे बोर्ड और समिति ने विचार किया है, लेकिन वे नियमों को नहीं बदल सकते, न ही इसे अपवाद मानते हुए रंजीता को नौकरी दी जा सकती है। मंडल स्तर पर नियमों से हटकर अनुकंपा पर नौकरी नहीं दी जा सकती है। नियमों के तहत रंजीता नौकरी की हकदार नहीं है क्योंकि वह मृत कर्मचारी की ‘करीबी रिश्तेदार’ है, विधवा या पुत्र-पुत्री नहीं।
‘बहू के मुकाबले बेटी का हक ज्यादा कैसे?’
हाईकोर्ट ने रेलवे का तर्क सुनने के बाद कहा कि सुप्रीम कोर्ट के जिस निर्णय का हवाला दिया गया है, उसमें ‘करीबी रिश्तेदार’ विस्तृत रूप से परिभाषित नहीं है। यह समझ से परे है कि कैसे एक विधवा बेटी जो अपने पिता के साथ रह रही है, उसका अनुकंपा पर नौकरी का अधिकार अपने ससुर के साथ रह रही विधवा बहू से अधिक हो सकता है।
अनुकंपा पर नौकरी में विधवा बहू को विधवा बेटी के बराबर मानने को कदम उठाए सरकार
हाईकोर्ट ने इस मामले में परिवार में बहू को शामिल न करने पर कहा, ‘यह मनमानी आज भी जारी है, इसे रोका जाना चाहिए, इसके लिए बहू को ‘परिवार’ की परिभाषा में शामिल करना होगा। वरना परिवार की यह परिभाषा अतार्किक लगेगी। सरकार इस बारे में विचार करे और उचित कदम उठाए ताकि विधवा बहू को भी अनुकंपा पर नियुक्ति में विधवा बेटी के बराबर माना जा सके।’
बहू परिवार की उत्तराधिकारी भी
अदालत ने यह भी कहा कि ‘परिवार शब्द की कानूनी परिभाषा में उदारता बरतने की जरूरत है। इसमें परिवार के सदस्यों का उपयुक्त समावेश होना चाहिए। मौजूदा मामले में बहू परिवार की उत्तराधिकारी भी है। उसे एक परिवार के सदस्य के तौर पर अपने परिवार को चलाना है। उसे परिवार की परिभाषा में शामिल करना ही चाहिए।’
चार हफ्ते में निर्णय ले रेलवे
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि रंजीता बाजपेयी रेलवे को तीन हफ्ते में ताजा प्रस्ताव दें। इस पर अगले चार हफ्ते में रेलवे निर्णय लेगा। रेलवे अपने निर्णय में मौजूदा याचिका में सामने आए तथ्यों का ध्यान रखे।