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Lucknow News: निजी अस्पतालों में मोटा वेतन और इंसेंटिव भी बन रहा सरकारी संस्थानों से मोहभंग की वजह

Sun, 26 Oct 2025 02:36 AM IST
Lucknow Bureau लखनऊ ब्यूरो
Updated Sun, 26 Oct 2025 02:36 AM IST
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High salaries and incentives in private hospitals are also leading to disillusionment with government institutions.
केजीएमयू।
लखनऊ। मोटे वेतन और सुविधाओं के बावजूद संजय गांधी पीजीआई, किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (केजीएमयू) और अन्य सरकारी संस्थानों से डॉक्टर लगातार इस्तीफा दे रहे हैं। इस्तीफे में भले ही कारण निजी बताया जाता हो, लेकिन कुछ ही समय बाद वही डॉक्टर निजी अस्पतालों में मोटे वेतन और इंसेंटिव पर दिखने लगते हैं।
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पिछले एक साल में केजीएमयू से करीब दस डॉक्टर इस्तीफा दे चुके हैं। सरकारी संस्थानों में जहां औसतन साढ़े दो लाख रुपये तक वेतन मिलता है। वहीं, निजी अस्पतालों में यह पांच से दस लाख रुपये तक पहुंच जाता है। इसके अलावा मरीजों की संख्या, ऑपरेशन और लिखी गई जांच के आधार पर अतिरिक्त इंसेंटिव भी मिलता है।
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शोध और शिक्षण छोड़कर करना पड़ता है मरीज जुटाने का जतन

केजीएमयू शिक्षक संघ के एक पदाधिकारी के अनुसार, सरकारी संस्थानों में डॉक्टरों की जिम्मेदारी मरीज देखने के साथ शिक्षण और शोध कार्य की भी होती है, जो उनके प्रमोशन में जुड़ता है, जबकि निजी अस्पतालों में ऊंचा वेतन पाने के लिए डॉक्टरों को काफी मशक्कत करनी पड़ती है। वहां ध्यान पूरी तरह मरीज जुटाने पर होता है। डॉक्टरों को सीएमई, स्वास्थ्य शिविर और रेफरल नेटवर्क के जरिये छोटे शहरों के डॉक्टरों से संपर्क बनाना पड़ता है, ताकि मरीजों का ट्रांसफर बड़े अस्पताल में हो सके। यहां तक कि जहां सरकारी संस्थानों में डॉक्टर सप्ताह में एक-दो बार ऑपरेशन करते हैं, वहीं निजी अस्पतालों में किसी भी समय सर्जरी करनी पड़ सकती है।
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विशेषज्ञता के बावजूद समान वेतन भी एक वजह
डॉक्टरों के सरकारी संस्थान से इस्तीफे की एक बड़ी वजह यह भी है कि सरकारी संस्थानों में विशेषज्ञता के बावजूद सभी का वेतन लगभग समान है। सरकारी चिकित्सा संस्थानों में तीन तरह के विभाग होते हैं। पहला - जहां केवल पढ़ाई और शोध होता है। दूसरा- जहां पढ़ाई के साथ ओपीडी भी चलती है और तीसरा - जहां पढ़ाई, ओपीडी के साथ सर्जरी भी होती है। इन तीनों विभागों के डॉक्टरों को समान वेतन और भत्ते मिलते हैं, जिससे असंतोष बढ़ता है।
सभी को मिलता है नॉन प्रैक्टिसिंग अलाउंस
शासनादेश के अनुसार, सभी एमबीबीएस डॉक्टरों को उनके मूल वेतन के निर्धारित प्रतिशत के अतिरिक्त भुगतान नॉन प्रैक्टिसिंग अलाउंस के रूप में किया जाता है। इसका मकसद उन्हें निजी प्रैक्टिस से रोकना है। यह अलाउंस एनॉटमी के साथ ही उन सभी विभागों के डॉक्टरों को भी मिलता है, जिनके यहां ओपीडी तक संचालित नहीं होती।

आम सभा में उठेगा डॉक्टरों के इस्तीफे का मुद्दा

केजीएमयू शिक्षक संघ के महामंत्री प्रो. संतोष कुमार ने बताया कि शिक्षकों को शासनादेश के बावजूद न तो ग्रेच्युटी का लाभ मिल रहा है और न ही अवकाश नकदीकरण का, जबकि नियमों के अनुसार केजीएमयू शिक्षकों को पीजीआई के समान वित्तीय लाभ मिलने चाहिए। उन्होंने कहा कि इसी असमानता से डॉक्टरों में निराशा है और वे संस्थान छोड़ रहे हैं।

केजीएमयू।

केजीएमयू।

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