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हाईकोर्ट ने व्हाट्सएप मेसेज के लिए अधिकारी का निलंबन रोका, कहा-इसकी जरूरत नहीं
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
Updated Fri, 29 Jun 2018 12:43 AM IST
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इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने लखनऊ के जिला कार्यक्रम अधिकारी (डीपीओ) अखिलेंद्र दूबे के निलंबन पर अगली सुनवाई तक रोक लगा दी है। दुबे ने बाल विकास सेवा एवं पुष्टाहार विभाग द्वारा बच्चों के दिए जाने वाले पोषाहार की खराब गुणवत्ता को लेकर व्हाट्सएप पर सवाल उठाए थे।
कोर्ट ने कहा, प्रथम दृष्टया ऐसा नहीं लगता कि व्हाट्सएप पर मेसेज पोस्ट करने के लिए निलंबन करने की जरूरत थी। साथ ही यह निर्देश भी दिया कि याची पर चल रही विभागीय कार्यवाही जारी रहेगी और इसे जल्द पूरा किया जाए।
दुबे ने याचिका दायर कर कोर्ट को बताया कि राज्य सरकार ने उप्र लोकसेवक आचरण (अनुशासन एवं अपील) नियमावली 1999 के तहत उनका निलंबन किया है। उन्होंने इसे चुनौती देने दो वजहें बताई। पहली, जिन आरोपों के आधार पर उनका निलंबन किया गया है, वे इतने गंभीर स्तर के नहीं हैं कि अगर साबित हो भी जाएं, तब भी उन्हें निलंबन या पदानवत जैसी बड़ी सजा दी जाए।
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दूसरी, जो व्हाट्सएप मेसेज उन्होंने आधिकारिक ग्रुप पर किया था, वह किसी भी रूप में लोक सेवक आचरण नियमावली 1956 के नियम सात के तहत मिस-कंडक्ट के तौर पर नहीं गिना जा सकता है।
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कोर्ट ने कहा, प्रथम दृष्टया ऐसा नहीं लगता कि व्हाट्सएप पर मेसेज पोस्ट करने के लिए निलंबन करने की जरूरत थी। साथ ही यह निर्देश भी दिया कि याची पर चल रही विभागीय कार्यवाही जारी रहेगी और इसे जल्द पूरा किया जाए।
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दुबे ने याचिका दायर कर कोर्ट को बताया कि राज्य सरकार ने उप्र लोकसेवक आचरण (अनुशासन एवं अपील) नियमावली 1999 के तहत उनका निलंबन किया है। उन्होंने इसे चुनौती देने दो वजहें बताई। पहली, जिन आरोपों के आधार पर उनका निलंबन किया गया है, वे इतने गंभीर स्तर के नहीं हैं कि अगर साबित हो भी जाएं, तब भी उन्हें निलंबन या पदानवत जैसी बड़ी सजा दी जाए।
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दूसरी, जो व्हाट्सएप मेसेज उन्होंने आधिकारिक ग्रुप पर किया था, वह किसी भी रूप में लोक सेवक आचरण नियमावली 1956 के नियम सात के तहत मिस-कंडक्ट के तौर पर नहीं गिना जा सकता है।
सरकारी नीति की आलोचना पर निलंबन : सरकार
कोर्ट
- फोटो : amar ujala
राज्य सरकार के स्थायी अधिवक्ता ने निलंबन रद्द करने के लिए मांगी गई अंतरिम राहत का विरोध किया। उनकी ओर से कहा गया कि व्हाट्सएप मेसेज पोस्ट करते हुए याची ने सरकार की नीतियों की आलोचना की है। इसी वजह से निलंबन किया गया।
मेसेज से गलत आचरण साबित नहीं होता : हाईकोर्ट
दोनों पक्षों को सुनने के बाद जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय व जस्टिस इरशाद अली ने कहा कि प्रथम दृष्टया याची के निलंबन की जरूरत नहीं थी। याची के मेसेज को देखने पर ऐसा नहीं लगता है कि गलत आचरण को लेकर बनी नियमावली के नियम सात के अनुसार सरकार की आलोचना होती है। साथ ही उन पर जो आरोप लगे हैं, उनकी गंभीरता और वजन कोई बड़ी सजा की वजह हो सकते हैं, इसमें भी शक है।
ये था मामला
लखनऊ डीपीओ अखिलेंद्र दूबे ने अपने ही विभाग के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए विभागीय व्हाट्सएप ग्रुप में मैसेज पोस्ट किया था। इसमें आरोप लगाया था कि आंगनबाड़ी केंद्रों पर बच्चों को दिए जाने वाले पोषाहार की गुणवत्ता अच्छी नहीं है। उन्हाेंने पोषाहार की आपूर्ति कर रही कंपनी केप्रतिनिधियों द्वारा खराब पोषाहार को खपाने के लिए रिश्वत की पेशकश की बात लिखी थी। यह सुझाव भी दिया था पोषाहार का वितरण बंद कर देना चाहिए। और अगर उनकी बात पर ध्यान नहीं दिया गया तो वह इस्तीफा दे सकते हैं। साथ ही चेताया भी था कि वे सीएम व पीएम को मामले की शिकायत करेंगे। उनकी पोस्ट से निदेशालय तक में हड़कंप मच गया था और शासन ने दूबे के साफगोई को सरकारी नीतियों की आलोचना मानते हुए उन्हें निलंबित कर दिया था।
मेसेज से गलत आचरण साबित नहीं होता : हाईकोर्ट
दोनों पक्षों को सुनने के बाद जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय व जस्टिस इरशाद अली ने कहा कि प्रथम दृष्टया याची के निलंबन की जरूरत नहीं थी। याची के मेसेज को देखने पर ऐसा नहीं लगता है कि गलत आचरण को लेकर बनी नियमावली के नियम सात के अनुसार सरकार की आलोचना होती है। साथ ही उन पर जो आरोप लगे हैं, उनकी गंभीरता और वजन कोई बड़ी सजा की वजह हो सकते हैं, इसमें भी शक है।
ये था मामला
लखनऊ डीपीओ अखिलेंद्र दूबे ने अपने ही विभाग के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए विभागीय व्हाट्सएप ग्रुप में मैसेज पोस्ट किया था। इसमें आरोप लगाया था कि आंगनबाड़ी केंद्रों पर बच्चों को दिए जाने वाले पोषाहार की गुणवत्ता अच्छी नहीं है। उन्हाेंने पोषाहार की आपूर्ति कर रही कंपनी केप्रतिनिधियों द्वारा खराब पोषाहार को खपाने के लिए रिश्वत की पेशकश की बात लिखी थी। यह सुझाव भी दिया था पोषाहार का वितरण बंद कर देना चाहिए। और अगर उनकी बात पर ध्यान नहीं दिया गया तो वह इस्तीफा दे सकते हैं। साथ ही चेताया भी था कि वे सीएम व पीएम को मामले की शिकायत करेंगे। उनकी पोस्ट से निदेशालय तक में हड़कंप मच गया था और शासन ने दूबे के साफगोई को सरकारी नीतियों की आलोचना मानते हुए उन्हें निलंबित कर दिया था।