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जन्म से तय होती है जाति, क्षेत्र से नहीं : हाईकोर्ट

Thu, 07 Jan 2016 12:16 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ Updated Thu, 07 Jan 2016 12:16 AM IST
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High Court gives decision on caste.

‘किसी की जाति का निर्धारण उसके जन्म के अनुसार होता है, वह किस क्षेत्र में रह रहा इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।’ यह बात हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने इलाहाबाद निवासी विजय कुमार की याचिका को सुनवाई के लिए स्वीकार करते हुए कही।

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बता दें अनुसूचित जाति की सीट से पार्षद चुने गए विजय को सिंधी होने की वजह से अनुसूचित जाति का नहीं मानकर उनका निर्वाचन खारिज कर दिया गया था। हाईकोर्ट ने जाति की पहचान के इस मामले में गहन जांच की जरूरत बताई है।
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न्यायाधीश अमरेश्वर प्रताप साही व न्यायाधीश अताउर रहमान मसूदी ने कहा कि फिलहाल याचिकाकर्ता के लिए कोई उपाय नहीं है, लेकिन उन्हें साक्ष्य प्रस्तुत करने का मौका देते हुए याचिका को सुनवाई के लिए स्वीकार किया जाता है।
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इस मामले परिवादी भारत सरकार, विदेश मंत्रालय व अन्य के वकील अतिरिक्त महाधिवक्ता को तीन सप्ताह में काउंटर एफिडेविट दाखिल करने के लिए कहा है।

देश बदले, पर कानून समान

High Court gives decision on caste.

विजय की याचिका सुनवाई के लिए स्वीकार करते हुए जजों की बेंच ने कहा, जब भारतीय साक्ष्य अधिनियम 1872 बना था, उस वक्त सिंध प्रांत भी ब्रिटिश इंडिया का हिस्सा था।

विजय के पिता का जन्मप्रमाण पत्र वर्ष 1936 का है। पाकिस्तान में मौजूद साक्ष्य अधिनियम 1984 में कानून-ए-शहादत के तौर पर बदला गया लेकिन यह भारतीय साक्ष्य अधिनियम के प्रावधानों के अनुरूप ही है। लिहाजा दोनों ही साक्ष्यों का भी समान महत्व है।

यह है मामला

याचिका के मुताबिक विजय ने 2012 में इलाहाबाद के झूलेलाल नगर में वार्ड 20 से पार्षद का चुनाव लड़ा। यह सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित थी। उन्होंने 31 मई 2012 में जारी जाति प्रमाणपत्र प्रस्तुत किया। उनके प्रतिद्वंद्वी ने जाति प्रमाणपत्र को जाली बताते हुए जिलाधिकारी को शिकायत की।

एसडीएम व तहसीलदार ने जांच की। इसके बाद तहसीलदार ने 17 जुलाई 2012 को उनका जाति प्रमाण पत्र खारिज कर दिया। नतीजतन उसका पार्षद पद पर निर्वाचन रद्द कर दिया गया।

पाकिस्तानी में कोरी, भारत में सिंधी

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विजय का कहना है कि उनके पिता सिंघ (वर्तमान में पाकिस्तान का प्रांत) के सक्कर जिले में पैदा हुए थे। विभाजन के बाद इलाहाबाद में बस गए। वे सिंध से आए थे, इसलिए सिंधी कहलाए।

वर्ष 2004 में उनके पिता पाकिस्तान में स्थित अपने पैतृक गांव गए थे, तभी पता चला कि वे कोरी जाति से हैं। यह जाति भारत में अनुसूचित जाति है। इसी आधार पर विजय ने जाति प्रमाण पत्र बनवाया था।

कोरी होने के साक्ष्य का अभाव, जाति प्रमाण पत्र खारिज

विजय की जाति मामले को जिला स्तर पर जांच समिति बनाई गई। इसमें विजय ने अपने पिता का जन्म प्रमाण पत्र प्रस्तुत किया। लेकिन उसमें जाति का कॉलम नहीं था, महज धर्म सिंधी बताया गया था। लिहाजा जांच समिति ने इसे नकार दिया।

विजय ने फिर अपील की, जिस पर जन्म प्रमाण पत्र को सत्यापित करवाने के लिए पाकिस्तान दूतावास भेजा गया। पर, वहां से कोई जवाब नहीं आया। जनवरी 2015 में जांच समिति ने अपील खारिज कर दी।

सिंधी हिंदू धर्म का एक सुमदाय, जाति नहीं

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मामला प्रदेश स्तरी जांच समिति में पहुंचा, जहां शैक्षिक दस्तावेज में सिंधी शब्द होने की बात उठी। साथ ही कहा गया, सिंधी हिंदू धर्म का एक समुदाय है जाति नहीं।

वहीं कोरी होने के लिए साक्ष्यों का अभाव बताते हुए जाति प्रमाण पत्र खारिज कर दिया गया। इस पर विजय ने हाईकोर्ट में याचिका की है।

देश बदले, पर कानून समान
विजय की याचिका सुनवाई के लिए स्वीकार करते हुए जजों की बेंच ने कहा, जब भारतीय साक्ष्य अधिनियम 1872 बना था, उस वक्त सिंध प्रांत भी ब्रिटिश इंडिया का हिस्सा था। विजय के पिता का जन्मप्रमाण पत्र वर्ष 1936 का है।

पाकिस्तान में मौजूद साक्ष्य अधिनियम 1984 में कानून-ए-शहादत के तौर पर बदला गया लेकिन यह भारतीय साक्ष्य अधिनियम के प्रावधानों के अनुरूप ही है। लिहाजा दोनों ही साक्ष्यों का भी समान महत्व है।

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