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कोर्ट ने नाबालिग को पति के साथ जाने की दी अनुमति, जानें- क्यों हुआ ऐसा

Mon, 26 Feb 2018 09:42 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ Updated Mon, 26 Feb 2018 09:42 AM IST
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high court decision on a minor girl.
- फोटो : amar ujala

स्कूली रिकॉर्ड में वह पिछले हफ्ते ही 16 साल की हुई है, ऑसिफिकेशन टेस्ट उसे 17 साल की बताते हैं, उसकी गोद में दो महीने का बच्चा भी है। सामने पति है जिसके साथ अपने परिवार के खिलाफ जाकर उसने शादी की, और पूरा जीवन है, जो कानूनी प्रावधानों के चलते बाराबंकी बाल कल्याण समिति के आदेश पर बीते तीन महीनों से एक जिले के महिला शरणालय में कट रहा था। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने इन तमाम स्थितियों को देखते हुए उसे शरणालय की कस्टडी से आजाद करने और अपनी मर्जी से जहां वह जाना चाहे, वहां जाने देने का निर्णय सुनाया है।

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मामले में उसके पति ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की थी। इसमें उसने लड़की द्वारा अपनी मर्जी से अंतर-धार्मिक विवाह करने और उसके बाद उसके खिलाफ दर्ज करवाई एफआईआर की जानकारी दी थी। उसने बताया था कि बाल कल्याण समिति बाराबंकी के दिसंबर 2017 में दिए आदेश के बाद उसकी पत्नी को पास के जिले के राजकीय महिला शरणालय भेज दिया गया। याचिका में उसके पति ने इस आदेश को रद्द करने की प्रार्थना की थी। सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने 13 फरवरी 2018 को आदेश दिए थे कि लड़की को कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत किया जाए।
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लड़की ने कहा, माता-पिता के साथ नहीं जाना
जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस दिनेश कुमार सिंह के समक्ष नाबालिग और उसके पति को पेश किया गया। नाबालिग से प्रश्न पूछे गए, जिस पर उसने बताया कि वह अपने पति के साथ जाना चाहती है, उसके साथ उसने शादी की है। वह अपने माता-पिता के साथ नहीं जाना चाहती। लड़की की गोद में उसका दो महीने का बच्चा भी था। वहीं लड़की की मां उसे साथ ले जाने को तैयार थी, लेकिन लड़की ने इससे साफ इन्कार कर दिया।

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दस्तावेजों में नाबालिग, कक्षा पांच की टीसी देकर प्रस्तुत किया गया सुबूत

high court decision on a minor girl.

हाईकोर्ट के समक्ष लड़की की कक्षा पांच की टीसी प्रस्तुत की गई, जिसमें उसका जन्म फरवरी 2002 में दर्शाया गया था। यही वजह थी कि बाल कल्याण समिति ने दिसंबर 2017 में उसे 15 वर्ष और नौ महीने की मानते हुए महिला शरणालय भेजने का आदेश दिया था।

इसी दौरान उसने एक बच्चे को जन्म दिया, जो अब दो महीने का हो चुका है। नाबालिग मां व उसका बेटा इस समय महिला शरणालय में ही रह रहे हैं। वहीं उसके ऑसिफिकेशन टेस्ट की रिपोर्ट प्रस्तुत की गई, जिसमें सीएमओ बाराबंकी ने लड़की की उम्र 17 वर्ष बताई।

‘लेकिन विवेक का उपयोग करने में वयस्क’
मामले को सुनने के बाद हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि उसे नाबालिग लड़की और उसके नवजात बच्चे के हितों के बारे में सोचना होगा जिन्हें ऑसिफिकेशन रिपोर्ट के आधार पर महिला शरणालय में एक वर्ष और जीना पड़ सकता है। लेकिन कोर्ट का यह मानना है कि व्यक्ति की कस्टडी व उसे बंदी रखने की दशा के निर्णय लेते समय जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार को सर्वोपरि रखा जाना चाहिए।

ऑसिफिकेशन टेस्ट में 2 से 3 वर्ष का मार्जिन माना जाता है। इस लिहाज से उसकी उम्र अधिकतम 19-20 वर्ष भी हो सकती है। उससे बातचीत के दौरान कोर्ट ने पाया है कि वह अपने विवेक का इस्तेमाल करने लायक वयस्क है। ऐसे ही मामलों में सुप्रीम कोर्ट भी लड़की की इच्छा को महत्व देने संबंधी निर्णय दे चुका है। उसके बयानों, हालात और लड़की व उसके बच्चे के हित को देखते हुए बाल कल्याण समिति का आदेश खारिज किया जाता है। लड़की को रिहा करने व उसे उसकी मर्जी के अनुसार जाने देने के निर्देश दिए जाते हैं।

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