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यूपी: महागठबंधन हुआ तो बसपा, भाजपा के लिए बढ़ेगी चुनौती

Tue, 08 Nov 2016 02:31 AM IST
महेंद्र तिवारी/अमर उजाला, लखनऊ
महेंद्र तिवारी/अमर उजाला, लखनऊ Updated Tue, 08 Nov 2016 02:31 AM IST
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Grand alliance will create challenges for BSP and BJP.
भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह व बसपा सुप्रीमो मायावती - फोटो : amar ujala

सूबे में यदि सपा, कांग्रेस व अन्य क्षेत्रीय दलों में महागठबंधन हुआ तो बसपा और भाजपा को भी अपनी रणनीति में बदलाव करना पड़ सकता है। विभिन्न दलों के घोषित प्रत्याशियों व टिकट के दावेदारों की चुनौती और बढ़ सकती है। कई घोषित प्रत्याशियों का पत्ता भी कट सकता है। इससे सपा के घोषित प्रत्याशियों के भी कान खड़े हो गए हैं।

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कांग्रेस के रणनीतिकार प्रशांत किशोर (पीके) की सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव से दो बार मुलाकात और अब मुख्यमंत्री अखिलेश यादव द्वारा सपा-कांग्रेस के गठबंधन के लिए राजी होने पर दूसरे क्या कर लेंगे, जैसे बयान से गठबंधन की अटकलों को और बल मिला है। अगर यह कवायद परवान चढ़ती है तो बसपा को नए सिरे से सीटवार समीकरण देखने पड़ेंगे।
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जानकारी के मुताबिक बसपा लगभग सभी सीटों पर प्रभारी के रूप में अपने प्रत्याशी का एलान कर चुकी है। बसपा सुप्रीमो मायावती लगातार घोषित प्रत्याशियों की गतिविधि पर नजर रखती हैं। वह समय-समय पर कहती रही हैं कि घोषित प्रत्याशियों के टिकट नहीं बदले जाएंगे।
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इसके बावजूद वह प्रत्याशी की सक्रियता, चुनाव में उसके जीत की संभावना और दूसरे दल द्वारा घोषित प्रत्याशी के सामने आने पर सीट के जातीय समीकरण पर पड़ रहे असर जैसे विभिन्न कारणों के आधार पर बड़े पैमाने पर प्रत्याशियों में बदलाव कर चुकी हैं। पिछले कुछ महीनों में अपर कास्ट के कई प्रत्याशी बदलकर मुस्लिम प्रत्याशी उतारे गए हैं। फैजाबाद, बाराबंकी सहित कई जिलों में पिछले महीने ही कई प्रत्याशी बदले गए हैं।

कई सीटें होंगी इधर से उधर

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जानकार बताते हैं कि यदि सपा, कांग्रेस व अन्य छोटे दलों के बीच गठबंधन होता है तो इन दलों के बीच सीट बंटवारे में कई सीटें इधर से उधर होंगी। संभावित गठबंधन में जिन दलों के शामिल होने की अटकलें हैं, उनमें से सपा ज्यादातर हारी सीटों पर प्रत्याशी घोषित कर चुकी है। कांग्रेस व रालोद जैसे दलों ने अभी प्रत्याशी घोषित नहीं किए हैं।

गठबंधन होने पर तमाम विधानसभा क्षेत्रों में नए चेहरे मैदान में आ सकते हैं। नई कवायद के बीच सपा के घोषित प्रत्याशियों की बेचैनी बढ़ गई है। नए प्रत्याशी सामने आने से सीटों के मौजूदा समीकरण में बदलाव की पूरी संभावना है।

ऐसे हालात में बसपा नेतृत्व द्वारा घोषित प्रत्याशियों की हार-जीत के समीकरण का फिर से आकलन तय माना जा रहा है। नए समीकरण में जहां भी प्रत्याशी कमजोर नजर आएंगे, उनके बदले जाने की संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता है।

बसपा के एक जिम्मेदार नेता ने बताया कि पार्टी नेतृत्व सपा व कांग्रेस के बीच पक रही खिचड़ी पर नजर रखे हुए है। सपा की हार तय है और कांग्रेस का सूबे में कोई जनाधार नहीं है। ऐसे में इस गठबंधन से कोई खास फर्क नहीं पड़ना है, पर गठबंधन होने के पहले कुछ नहीं कहा जा सकता।

भाजपा को पूरब से पश्चिम तक बदलनी पड़ेगी रणनीति

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भाजपा अभी तक प्रदेश में बहुकोणीय चुनाव मानते हुए चुनावी रणनीति तैयार कर रही थी। इसमें दो प्रमुख कोणों, सपा-बसपा से मुख्य चुनावी जंग की संभावना लग रही थी। दो माह से सपा में चल रहे पारिवारिक घमासान से भाजपा उत्साहित थी।

उसे मुस्लिम वोटों के बंटवारे के साथ ही सपा के परंपरागत यादव वोटों के एक हिस्से में संभावना दिख रही थी। सपा, कांग्रेस, रालोद और अन्य दलों का महागठबंधन हो जाने पर भाजपा की चुनौती बढ़ेगी।

महागठबंधन में लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार जैसे चेहरे भी रहेंगे। यह बात अलग है कि लालू की पार्टी विधानसभा चुनाव में सीट नहीं मांगेगी और नीतीश का जद यू चुनिंदा सीटों पर सांकेतिक चुनाव लड़ सकता है। इन सभी के एक मंच पर आने से भाजपा को पिछड़ों ही नहीं, सवर्णों के एक वर्ग में घाटा हो सकता है। सपा अपने परंपरागत वोट बैंक को सहेजे रख सकती है। कांग्रेस, रालोद का वोट बैंक पूरी तरह तो नहीं, आंशिक तौर पर सपा के पक्ष में ट्रांसफर हो सकता है।

नहीं हो पाएगा वोटों का ध्रुवीकरण

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अजित सिंह के महागठबंधन में शामिल होने से मुजफ्फरनगर और कैराना को मुद्दा बनाना भाजपा के लिए आसान नहीं रहेगा। पश्चिमी यूपी के कई जिलों में उसे वोटों के ध्रुवीकरण में दिक्कत हो सकती है।

वहीं, पूर्वी यूपी में पिछड़ों को लुभाने में जुटी भाजपा को और ज्यादा मेहनत करनी पड़ेगी। कांग्रेस ने पिछले कुछ महीनों में ब्राह्मणों के बीच काम किया है। महागठबंधन में शामिल होने पर उसे इसका लाभ मिल सकता है। भाजपा को इस दिशा में नए सिरे से सोचना होगा।

मुलायम, लालू, नीतीश व सोनिया जैसे कई बड़े चेहरों की वजह से मुसलमानों का बड़ा हिस्सा महागठबंधन को भाजपा के विकल्प के रूप में स्वीकार कर सकता है। यह स्थिति भाजपा के लिए नुकसानदेह हो सकती है।

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