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'बढ़ती आबादी रोकने के लिए कठोर कानून बनाएं'

Fri, 19 Sep 2014 01:08 AM IST
मोहित त्रिपाठी/अमर उजाला, लखनऊ
मोहित त्रिपाठी/अमर उजाला, लखनऊ Updated Fri, 19 Sep 2014 01:08 AM IST
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govt should make rule for family planning.

हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने ‘लिव इन’, तलाक व बढ़ती आबादी से उत्पन्न हो रही सामाजिक-आर्थिक समस्याओं का शिद्दत से संज्ञान लेते हुए कहा कि संसद व राज्य विधायिका को परिवार नियोजन के लिए तर्कसंगत कानून बनाना चाहिए।

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न्यायमूर्ति देवी प्रसाद सिंह व न्यायमूर्ति अरविंद कुमार त्रिपाठी की खंडपीठ ने यह अहम टिप्पणी वाला फैसला दो अलग-अलग याचिकाओं का एक साथ निपटारा करते हुए सुनाया।
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पहले मामले में याची करीब 18 साल के युवक मोहम्मद फैज के माता-पिता ने अलग होकर दुबारा अपनी-अपनी शादियां कर लीं।

इस पर याची ने खुद की परवरिश व जीवन यापन के लिए अदालत से गुहार लगाई थी। कोर्ट ने याची को गुजारे आदि के लिए सक्षम अदालत या प्राधिकारी को अप्रोच करने को कहा है।

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मां का ही दुश्मन बन गया बेटा

govt should make rule for family planning.

दूसरे मामले में 48 वर्षीय शाहनाज बानो ने याचिका दायर कर कहा कि उसके पति की मृत्यु हो गई है, उसके छह बच्चे हैं। इनमें बड़ा लड़का मोहम्मद मोहसिन गलत संगत में पड़कर उसकी जान का दुश्मन बन गया है।

साथ ही महिला का यह भी आरोप है कि एक लड़की के साथ संबंधों के कारण उसके उकसाने पर मोहसिन याची महिला का मकान भी हड़पना चाहता है।

इस पर कोर्ट ने प्रतापगढ़ के डीएम व एसपी को महिला की जान-माल की हिफाजत के सख्त निर्देश दिए हैं।

अदालत ने दोनों मामलों में उठाए गए मुद्दों को लेकर फैसले में कहा कि जब कोई भी पुरुष-स्त्री बच्चे को जन्म देते हैं और अगर उनके पास कोई संपत्ति नहीं है तो ऐसे दंपती के अलगाव पर बच्चों को गुजारा भत्ता दिलाने के लिए अदालत कैसे आदेश दे सकती है।

मामले में सिर्फ टिप्पणी ही कर सका कोर्ट

govt should make rule for family planning.

कोर्ट ने दूसरे मामले के संदर्भ में कहा कि जब परिवार में अधिक बच्चे होते हैं तो परिवार आर्थिक तंगी में आ जाता है और बच्चों की ठीक से देखभाल नहीं हो पाती।

इसके परिणामस्वरूप परिवार में आर्थिक-सामाजिक समस्याएं पैदा हो जाती हैं। ऐसे में संसद या राज्य विधायिका को परिवार नियोजन संबंधी कानून बनाने को आगे आना चाहिए, जिससे आने वाली पीढ़ियां बगैर अपनी किसी गलती के संसाधनों की कमी का दंश न झेलें।

कोर्ट ने इस टिप्पणी के साथ दोनों मामलों का निपटारा कर दिया।

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