कोर्ट ही नहीं सरकार भी है न्याय न मिलने की जिम्मेदार, देखें एक रिपोर्ट
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झगड़े, बवाल, हत्या और जमीन-जायदाद के तमाम मुकदमे तो अदालतों के सिरदर्द बने ही हैं। मुकदमों के अंबार और उनके निस्तारण में देरी के लिए सरकारी महकमे भी कम जिम्मेदार नहीं हैं। सरकार अफसरों से यदि अपनी ही मुकदमा नीति पर अमल करा ले तो काफी मुकदमे कम हो सकते हैं। बड़े पैमाने पर न्यायालयों में मुकदमे दाखिल होने से बचाए जा सकते हैं।
प्रदेश में इलाहाबाद हाईकोर्ट व इसकी लखनऊ पीठ में वर्तमान में 9.13 लाख से ज्यादा मुकदमे लंबित हैं। इनमें 4.83 लाख सरकारी विभागों से जुड़े हैं। गृह, राजस्व, शिक्षा, शहरी विकास, पंचायतीराज, खाद्य रसद, स्वास्थ्य व सिंचाई महकमे तो मुकदमेबाज बनकर उभरे हैं।
इनका कोई न कोई अधिकारी हर दूसरे-तीसरे दिन अदालतों में खड़ा नजर आता है। गृह विभाग इससे भी आगे है। इससे जुड़े 2.82 लाख मुकदमे हाईकोर्ट में विचाराधीन हैं। रोज ही बड़ी संख्या में पैरोकार कोर्ट-कचहरी में हाजिरी लगाते हैं। पर, सरकार चाहे तो यह स्थिति बदल सकती है।
शासन के एक जिम्मेदार अधिकारी बताते हैं कि प्रदेश सरकार ने एक अच्छी मुकदमा नीति बनाई थी। इसमें लंबित वादों के निस्तारण और अनावश्यक मामले दाखिल होने से बचाने के लिए कई अहम दिशानिर्देश शामिल किए गए थे।
तमाम प्रयासों के बाद भी नहीं हासिल हो सका है लक्ष्य
सरकार ने उस पर अमल के लिए समय-समय पर आदेश भी जारी किए लेकिन तमाम प्रयासों के बाद भी लक्ष्य प्राप्त नहीं किया जा सका है। अब भी तमाम मुकदमे इस नीति को नजरंदाज कर दाखिल हो रहे हैं। नतीजा ये है कि जज इन्हें निस्तारित करने में दम लगा रहे हैं और केस कम होने की जगह बढ़ते जा रहे हैं।
प्रमुख विभाग और उनमें लंबित मामलों की संख्या
विभागीय मामले गृह--421828
गृह--282390
राजस्व--60185
माध्यमिक शिक्षा--20960
बेसिक शिक्षा--17540
शहरी विकास--10897
पंचायतीराज--7710
खाद्य एवं रसद--6738
उच्च शिक्षा--5958
चिकित्सा स्वास्थ्य--4802
सिंचाई--4648
(स्रोत- सरकारी मुकदमों की अनुश्रवण प्रणाली की वेबसाइट से)
मुकदमा नीति के अहम निर्देश
- न्यायालयों में मुकदमों के विचाराधीन होने की समयावधि 15 साल से घटाकर तीन वर्ष की जाए।
- एक साधारण वादी की तरह सरकार किसी भी कीमत पर मुकदमे न करे।
- राज्य के विरुद्ध दाखिल सिविल मुकदमों में एक नोटिस दी जाती है। यदि नोटिस पाने पर संबंधित विभाग वादी के दावों की जांच कर ले और सही दावों को स्वीकार कर ले तो आगे के विवादों से बचा जा सकेगा।
- सेवा संबंधी मामलों में प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा छोटे-छोटे विवादों में कर्मचारी के पक्ष में अनुकंपा वाली दृष्टि अपनाई जाए। कोर्ट को निर्णय करने दो, इसदृष्टिकोण को हतोत्साहित किया जाए।
- न्यायालयों में छोटे-छोटे आपराधिक मामले बड़ी संख्या में लंबित हैं। इनके अभियोजन का समाज के लिए कोई उपयोग नहीं है। ऐसे मामलों को चिह्नित करके उन्हें वापस लेने या छोड़ देने की कार्यवाही करनी चाहिए।
- एक पक्षीय व अंतरिम आदेशों के खिलाफ अपील नहीं की जाएगी। पहले प्रयास हो कि आदेश रद्द किया जाए। किसी मामले में अपील तभी दाखिल हो जब आदेश रद्द न हो और ऐसे आदेश के बने रहने से प्रतिकूल प्रभाव पड़ता हो।
- सबसे पहले कोर्ट के भीतर ही अपील दाखिल की जानी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट में असाधारण स्थिति के सिवाय अपील नहीं की जानी चाहिए।